Spirit of a Fighter152 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 152

7 min read November 5, 2026

माँ ने मेरा कंधा छुआ। उनका हाथ काँप रहा था, पर आँखें सूखी थीं।

"मीरा," मैंने कहा, "हमें सबूत जल्दी चाहिए। जो काग़ज़ रघुवीर ने दिए थे — उनमें सिर्फ़ इशारे हैं। हमें ठोस चीज़ चाहिए।"

"आज रात," मीरा ने कहा। "तहखाने के पास।"

"आज रात," मैंने दोहराया।

तभी टिंकू ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। "भाई, तेरी जेब से कुछ गिरा।"

मैंने नीचे देखा। पत्थरों पर एक काग़ज़ पड़ा था — मुड़ा हुआ, जैसे जल्दी में गिराया गया हो। मैंने उठाया।

वो वही काग़ज़ नहीं था जो दीवार के नीचे मिला था। ये दूसरा था। इस पर साफ़-साफ़ भैरव का पता लिखा था — पूरा पता, गली का नाम तक। और नीचे एक लाइन —

"आज रात दस बजे, तहखाने के पास।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने काग़ज़ देखा, फिर मेरी आँखों में। उसके होंठ हिले, पर कुछ नहीं बोली।

पुलिस वाले ने ये जानबूझकर गिराया था। वो मुझे बता रहा था कि वो खुद फँसा हुआ है — और जितना वो सीधे नहीं कह सकता था, उतना इस काग़ज़ से कह गया।

मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा। मेरी उँगलियाँ अब नहीं काँप रही थीं।

॥

काग़ज़ मेरी जेब में था, पर उसका वज़न मेरे पैरों में उतर रहा था। जैसे कोई पत्थर बाँधकर सीने पर रख दिया हो।

"दस बजे," टिंकू ने धीरे से दोहराया। उसकी आवाज़ में वो हल्की काँपन थी जो वो छिपाने की कोशिश करता है और हमेशा पकड़ा जाता है। "भाई, ये तो जाल है। साफ़ जाल है।"

"है," मैंने कहा। "पर जाल में चीज़ फँसती है, और जाल बिछाने वाला भी तो वहीं आता है।"

टिंकू ने मुँह बनाया। "ये तेरी बड़ी-बड़ी बातें मुझे समझ नहीं आतीं। सीधा बोल — हम जा रहे हैं या नहीं?"

माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। उन्होंने अपनी उँगली से माथे का टीका सहलाया, फिर बोलीं, "जाओ। पर एक बात सुन लो।"

हम सब रुके।

"जो आदमी औरत को, बच्चे को, चक्की को नहीं छोड़ता, वो तुम्हें नहीं छोड़ेगा। तुम उससे लड़ने जा रहे हो, उससे नहीं जो तुम्हारे सामने खड़ा होगा। समझे?"

मैंने सिर हिलाया। समझ गया था, पर उस वक़्त मैं ये नहीं जानता था कि वो कितनी सच बोल रही थीं।

मीरा ने अपना बैग खोला। उसमें से एक छोटी-सी थैली निकाली, जिसमें कुछ सूखी पत्तियाँ और एक चम्मच था। "ये सोंठ और काली मिर्च है। अगर कोई बेहोश लगे, तो ज़ुबान के नीचे रख देना। और ये —" उसने एक छोटी शीशी दी। "ये नींबू का रस है। ज़हर की गंध से पेट खराब हो, तो काम आएगा।"

टिंकू ने शीशी हाथ में ली और सूँघी। "इसमें तो अचार की गंध आ रही है।"

"वो तेरी नाक है," मीरा ने कहा, "जो हर चीज़ में खाना ढूँढ लेती है।"

टिंकू मुस्कुराया, पर मुस्कान उसके चेहरे पर टिकी नहीं। वो जानता था कि आज रात क्या है।

कालू काका दीवार के सहारे बैठे थे। उन्होंने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और बोले, "भैरव चालाक है। वो अकेला नहीं आएगा।"

"तो हमें भी अकेले नहीं जाना," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो अदालत में बहस करते वक़्त आती है। "अगर वो चार लाता है, तो हमें दस चाहिए।"

कालू काका ने अपना सफ़ेद सिर उठाया। "दस आदमी? कौन आएगा? गाँव वाले तो भैरव का नाम सुनकर दरवाज़ा बंद कर लेते हैं।"

"वो गाँव वाले जिनका कोई नहीं बचा," मैंने कहा।

मेरी आवाज़ सुनकर कालू काका ने मुझे देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो कभी-कभी सुबह की धुंध में दिखती है — कुछ उम्मीद, कुछ डर।

"मेरे पास ऐसे नाम हैं," मैंने कहा। "जिनके भाई अखाड़े में गए और लौटकर नहीं आए। जिनके बाप ने ज़हरीला पानी पिया और बिस्तर पर ही मर गए। उन सबको भैरव का नाम पता है, पर कोई सबूत नहीं था। आज सबूत है।"

"सबूत कहाँ है?" कालू काका ने पूछा। "तुम्हारे पास? अभी?"

मैं चुप हो गया। सच था। अभी मेरे हाथ में सिर्फ़ कुछ काग़ज़ थे, कुछ नाम, और एक थैली में भैरव की अंगूठी। सबूत तहखाने में था। और तहखाना अभी भैरव के हाथ में था।

"तो इसका मतलब," कालू काका ने कहा, "हम पहले लोगों को इकट्ठा करें, फिर सबूत निकालें। और सबूत निकालते वक़्त भैरव को पकड़ें।"

"तीन काम, एक रात," टिंकू ने कहा, और उसने अपने हाथ से हवा में हिसाब बनाया। "भाई, ये तो बहुत ज़्यादा है। मेरी दुकान जल गई, मेरे हाथ जले हैं, और अब मुझे तीन काम करने हैं।"

"तू सिर्फ़ एक काम कर," मैंने कहा। "तू रास्ते पर खड़ा रह जाना। जब हम अंदर हों, तो कोई आए, तो तू चिल्लाना — मीठे की दुकान में आग लग गई है।"

टिंकू एक पल रुका। फिर वो ज़ोर से हँसा। "भाई, तूने मेरा काम ऐसा बताया जो मैं ज़िंदगी में कभी नहीं कर पाता — झूठ बोलना। और वो भी अपनी ही दुकान के बारे में।"

"तेरी दुकान तो जल चुकी है," मीरा ने कहा।

"तो?" टिंकू ने कहा। "दुकान जल गई, नाम थोड़े जला। नाम से तो अभी भी आग लग सकती है।"

उसकी उस बात पर माँ ने भी मुस्कुराकर सिर हिलाया। मेरे अंदर कुछ ऐसा हुआ जो डर को थोड़ी देर के लिए पीछे धकेल गया।

मैं बाहर निकला। गाँव की गली में सन्नाटा था, पर वो सन्नाटा नहीं था जो सोने का होता है। वो सन्नाटा था जिसमें लोग दरवाज़ों के पीछे से झाँकते हैं और आवाज़ नहीं करते।

पहला घर रामू का था। उसका बड़ा भाई तीन साल पहले अखाड़े में गया था और एक महीने बाद बीमार पड़कर मर गया। रामू अब भी उसी घर में रहता है, पर दरवाज़े पर ज़ंजीर लगाए रहता है।

मैंने दरवाज़ा खटखटाया।

"कौन?" अंदर से आवाज़ आई।

"रामू, मैं वीर हूँ।"

"वीर?" दरवाज़ा थोड़ा खुला। रामू का चेहरा दिखा — पतला, आँखों में हमेशा वो उदासी जो बड़े भाई की मौत के बाद आई। "तू इतनी रात को? क्या हुआ?"

"तेरे भाई की मौत का सच जानना है?"

दरवाज़ा थोड़ा और खुला। उसके पीछे उसकी माँ खड़ी थीं। बुढ़िया, कमर झुकी हुई, हाथ में लाठी। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखें भर आईं।

"वो नहीं जाएगा," बुढ़िया ने कहा। "मेरा एक ही बेटा बचा है।"

रामू ने पीछे मुड़कर देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर ज़मीन की तरफ़।

"माँ," वो बोला, "मेरा भाई भी तेरा बेटा था।"

बुढ़िया की लाठी हिली, पर वो कुछ नहीं बोली। वो पलटकर अंदर चली गई। उसके कदमों की आवाज़ गई, फिर एक दरवाज़ा बंद हुआ।

रामू बाहर आया। उसने अपनी कमर पर थोड़ी रस्सी बाँधी थी, जैसे कोई बाहर जाने की तैयारी कर रहा हो। "बोल, क्या करना है?"

मैंने उसका कंधा थपथपाया। कुछ नहीं कहा। कहने को जो था, वो कह देता तो आवाज़ भर आती।

दूसरा घर बोला का था। बोला वो लड़का था जिसे मैंने एक दिन रोटी खिलाई थी — वो पागलों जैसा बोलता है, कुछ काम नहीं करता, गाँव के लोग उसे "आधा" कहकर बुलाते हैं। पर उसका बाप भी पहलवान था, और उसका बाप भी भैरव के ज़हर से मरा था।

बोला खाट पर बैठा था। मुझे देखकर उसने सीधा पूछा, "वीर, तू वो काम करने आया है ना जो सब करना चाहते हैं और कोई करता नहीं?"

मैं रुक गया। "तुझे कैसे पता?"

"मुझे पागल कहते हैं," बोला ने कहा। "पर पागल को भी पता होता है कि रात में कौन जागता है। तू रोज़ रात को अखाड़े के बाहर खड़ा रहता है। मैंने तुझे देखा है।"

वो उठा। उसकी आँखों में वो चमक थी जो आम तौर पर उसके चेहरे पर नहीं दिखती। "मेरे बाप ने मरने से पहले कहा था — 'बोला, भैरव से बदला लेना।' मैं तब नौ साल का था। मैंने कहा था — 'हाँ बापा।' आज तक वो वादा निभाया नहीं। आज निभाऊँगा।"

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