Spirit of a Fighter – Chapter 151
मैं चारपाई पर लेटा। आँखें बंद थीं, पर नींद नहीं आई। आँगन में हवा चल रही थी, और जली चक्की का ढाँचा हवा में हल्का-सा हिल रहा था — जैसे कोई बूढ़ा आदमी करवट बदल रहा हो।
सुबह मैंने आँख खोली तो आँगन में सुक्खी बुआ की आवाज़ सुनाई दी।
"अरे मैंने तो सुना है कि कल रात अखाड़े के पीछे कुछ हुआ है।"
मैं उठकर बाहर आया। सुक्खी बुआ दरवाज़े पर खड़ी थीं, पान का बीड़ा हाथ में, आँखें बड़ी।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"कालू काका को किसी ने रात में धक्का दे दिया," उन्होंने कहा। "वो नीम के नीचे पड़े मिले। सिर पर चोट है। उठ नहीं पा रहे।"
मेरे पैर ठंडे हो गए।
"कहाँ हैं?"
"उनकी झोपड़ी में। मीरा वहाँ पहुँच गई है।"
मैं भागा। टिंकू रास्ते में मिला और साथ चला। कालू काका की झोपड़ी में मीरा उनके सिर पर पट्टी बाँध रही थी। कालू काका की आँखें खुली थीं, पर आवाज़ धीमी।
"देखा," उन्होंने कहा, जब मैं पास बैठा, "भैरव को पता चल गया कि हम रात में आए थे।"
"क्यों?" मैंने कहा। "हमने कोई निशान नहीं छोड़ा।"
"छोड़ा," कालू काका ने कहा। "मैंने छोड़ा। उसने मेरी लालटेन पहचान ली। मेरे पास बीस साल से एक ही लालटेन है, और मैं उसे हर रोज़ उसी जगह लटकाता हूँ। आज सुबह वो नहीं थी।"
मीरा ने गीली पट्टी बदली। "उन्होंने कुछ और कहा?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनके होंठ हिले। "उसने कहा — 'बूढ़े, तूने मेरी मिट्टी में हाथ डाला। अब तू मेरा हाथ नहीं देखेगा।'"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"कालू काका," मैंने कहा, "आप आज अखाड़े नहीं जाएँगे।"
"नहीं जाऊँगा," उन्होंने कहा। "आज मेरी लड़ाई तेरी है।"
मैं उठा। मेरे अंदर कुछ ऐसा भर रहा था जो मैं पहले नहीं जानता था। गुस्सा नहीं — गुस्से से भी गहरा। जैसे सीने में मिट्टी भर गई हो, और वो गरम हो रही हो।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "अब?" उसने पूछा।
"अब कुछ नहीं," मैंने कहा। "अब हम इंतज़ार करेंगे। भैरव ने अपना पहला हमला कर दिया। दूसरा हमला वो करेगा कब, यही देखना है।"
टिंकू ने अपनी जली उँगली उठाई। "और अगर दूसरा हमला कल हो?"
"तो कल हम जवाब देंगे," मैंने कहा।
मैं बाहर आया। आसमान साफ़ था, सूरज निकल रहा था। दूर अखाड़े की दीवार दिख रही थी — वही दीवार जिसके ऊपर से भैरव ने हमें देखा था।
और तभी मैंने देखा। दीवार पर कुछ चमक रहा था। सफ़ेद रंग से कुछ लिखा गया था — बड़े अक्षरों में।
मैं दौड़ा। टिंकू और मीरा मेरे पीछे। दीवार पर लिखा था —
"वीर सिंह — तेरी माँ की चक्की तोड़ी। तेरे दोस्त की दुकान जलाई। अब तेरे बूढ़े की बारी थी। तीन दिन में तेरे पास कुछ नहीं बचेगा। फिर मैं तुझसे लड़ूँगा। — भवानी सिंह"
मैंने दीवार को देखा। नाम वही था जो रघुवीर ने अपने काग़ज़ में लिखा था। भैरव अब अपना असली नाम खुद लिख रहा था। वो अब छिप नहीं रहा था।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "वो खुद को खोल रहा है," उसने कहा। "जो डरता है, वो नाम नहीं छिपाता।"
"नहीं," मैंने कहा। "जो खुद को नहीं छिपाता, वो ये भी जानता है कि हम कुछ नहीं कर सकते।"
टिंकू ने दीवार के नीचे कुछ देखा। "भाई, ये क्या है?"
मैंने देखा। दीवार के नीचे पत्थरों के बीच एक काग़ज़ दबा था — सीलबंद नहीं, खुला। मैंने उठाया। उस पर भैरव की लिखाई थी —
"आज रात दस बजे, तहखाने के पास। अकेला आ। अगर कोई और आया, तो उसका हिसाब तेरे सिर।"
मैंने काग़ज़ मीरा को दिया। उसने पढ़ा और मेरी तरफ़ देखा।
"ये जाल है," उसने कहा।
"हाँ," मैंने कहा।
"तो?"
मैंने काग़ज़ वापस लिया और जेब में रखा। दूर अखाड़े की दीवार पर भैरव का लिखा नाम सूरज की रोशनी में चमक रहा था।
"तो आज रात," मैंने कहा, "मैं अकेला जाऊँगा। और वो समझेगा कि मैं अकेला हूँ।"
"
मैं घर पहुँचा तो सुबह की धूप आँगन में फैल रही थी। माँ चक्की के पास बैठी थी, हाथ में अनाज, पर चक्की नहीं चल रही थी। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। सिर्फ़ हाथ की रेखाएँ देखती रहीं, जैसे उनमें कुछ ढूँढ रही हों।
"माँ?"
"सुक्खी बुआ सब बता गईं," उन्होंने कहा, आवाज़ सपाट। "दीवार पर लिखा है। कालू भाई को मारा है।"
"माँ, मैं सँभाल लूँगा।"
"कैसे?" उन्होंने पहली बार आँख उठाई। उनकी आँखों में वो डर था जो मैं बचपन से देखता आया था — पिता की मौत के बाद से। "तेरे पिता भी यही बोलते थे। 'मैं सँभाल लूँगा, सरस्वती।' और एक दिन मैंने उन्हें चारपाई पर लेटा पाया।"
मैं चुप खड़ा रहा। कहना चाहता था कि मैं पिता जैसा नहीं हूँ। पर मुझे खुद पता नहीं था कि ये सच है या बस बड़ी बात।
तभी आँगन के बाहर पैरों की आवाज़ें आईं। तीन पुलिस वाले। आगे वाला मोटा, मूँछें घुमाते हुए अंदर आया। पीछे दो सिपाही, हाथ में हथकड़ी।
"वीर सिंह?" मोटे ने पूछा।
"हाँ।"
"भैरव सिंह की शिकायत है। रात में उनके अखाड़े के पीछे तोड़फोड़ हुई। तुम पर इल्ज़ाम है।" उसने हथकड़ी खोली। "चलो।"
हथकड़ी मेरी कलाई के करीब आई, और तभी माँ उठ खड़ी हुईं।
वो धीरे उठीं, पर उनके उठने में वो आवाज़ थी जो चक्की चलने में नहीं थी। उन्होंने मेरे आगे खुद को खड़ा किया। मेरे और पुलिस के बीच।
"मेरे बेटे ने आग नहीं लगाई," उन्होंने कहा। आवाज़ ऊँची नहीं थी। पर कमरे का हवा तक रुक गया। "उसके हाथ जले हैं — आग बुझाते वक़्त। तुम उसकी हथेलियाँ देख लो।"
मोटे ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने हाथ आगे किए। पट्टी खुली थी, जले निशान साफ़ दिख रहे थे।
"मैंने बीस साल चुप्पी सही है," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में एक ऐसी चमक आई जो मैंने पहली बार देखी। जैसे कोई पुराना दीया अंदर से जल उठा हो। "इस गाँव में मैं हर रोज़ सिर झुकाकर चली हूँ। आज नहीं झुकाऊँगी। अब मेरा बेटा सच बोलेगा, और तुम सुनोगे।"
मोटे का हाथ हथकड़ी पर रुक गया। उसने माँ को देखा, फिर मुझे। उसकी मूँछें अब नहीं घूम रही थीं।
तभी मीरा सामने आई। "सर, मैं मेडिकल छात्रा हूँ।" उसने अपनी बैग से काग़ज़ निकाला। "मैंने खुद टिंकू के जले हाथों का इलाज किया है। ये मेरी लिखी पर्ची है, तारीख़ के साथ। ये सबूत है कि वो आग बुझा रहा था, लगा नहीं रहा था।"
मोटे ने पर्ची पढ़ी। उसका जबड़ा कसा।
"मैडम," उसने धीरे से कहा, "शिकायत भैरव सिंह की है। हमें ले जाना पड़ेगा।"
और तभी भीड़ में से सुक्खी बुआ निकलीं। पान का बीड़ा अब भी हाथ में, पर आवाज़ में वो तेज़ जो पूरे बाज़ार में गूँज गया।
"अरे सुनो सब!" वो बोलीं। "मैंने तो सुना है कि भैरव ने खुद किसी को बुलाकर आग लगवाई है। और अब पुलिस को फँसा रहा है। कल रात उसके आदमी चारकोल लेकर अखाड़े की तरफ़ जाते देखे गए हैं!"
भीड़ में गुड़गुड़ाहट उठी। कोई बोला "हाँ, मैंने भी देखा!" कोई बोला "भैरव की करतूत है!" आवाज़ें बढ़ने लगीं।
मोटा घबराकर पीछे हटा। "ठीक है, ठीक है!" उसने हाथ उठाए। "मैं रिपोर्ट में लिखूँगा कि जाँच बाकी है। फिलहाल कोई गिरफ़्तारी नहीं।"
वो पलटा। सिपाही हथकड़ी समेटने लगे। और जाते-जाते मोटा मेरे करीब झुका — इतना धीरे कि सिर्फ़ मैं सुनूँ।
"बेटा," उसने कहा, "भैरव सिंह के पुलिस में आदमी हैं। ऊपर तक। सँभलकर रहना।"
वो चला गया।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे अंदर जो गरम मिट्टी भर रही थी, वो ठंडी नहीं हुई — और गहरी हो गई। अब ये सिर्फ़ भैरव की लड़ाई नहीं थी। पूरा तंत्र उसके साथ था।
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