Spirit of a Fighter150 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 150

6 min read November 5, 2026

रात नौ बजे मैं घर से निकला। आसमान में बादल थे, चाँद नहीं दिख रहा था। माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ में लालटेन। गुड़िया उनके पीछे थी, दो चोटियाँ, आँखें चमकीली।

"भैया," गुड़िया ने कहा, "मैं साथ चलूँगी।"

"नहीं—"

"आपने वादा किया था," उसने तुरंत कहा, जवाब तैयार था। "कहा था — दीवार के बाहर तक साथ जाएगा। मैं दीवार के बाहर ही रहूँगी। बस दीवार तक।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "ले जा," उन्होंने कहा। "जो बच्ची दीवार तक साथ आने की ज़िद करे, उसे रोकना ठीक नहीं।"

हम निकले — मैं, गुड़िया, और रास्ते में टिंकू मिल गया, पीछे मीरा।

अखाड़े के पीछे वाला रास्ता सुनसान था। कुएँ के पास का पत्थर अब भी वहीं पड़ा था, पर सीढ़ियाँ टूटी हुई थीं — भैरव के आदमियों ने कल रात पत्थर गिराकर उन्हें बंद कर दिया था। कालू काका नीम के पेड़ के नीचे खड़े थे, हाथ में लालटेन।

"आ गए," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, जैसे पुरानी किताब का पन्ना पलट रहा हो। "नीम के जड़ के पास से रास्ता है। बीस साल पहले भैरव भी यहीं से गया था। मैंने उसे देखा था, पर कुछ नहीं बोला। आज बोलूँगा।"

उन्होंने जड़ के पास की मिट्टी हटाई। नीचे लोहे का ढक्कन दिखा, जंग लगा, पर आज भी मज़बूत। टिंकू ने अपनी जले हुई उँगलियों से भी मदद की, और मैंने उसे रोका। फिर भी वो हँसा — "भाई, मेरी उँगलियाँ जल गई हैं, ऐसा तो कहीं लिखा नहीं कि जली उँगली से काम नहीं होता।"

ढक्कन खुला। अंदर अंधेरा था, पर उसमें से एक गंध आई — नम मिट्टी, पुरानी लकड़ी, और उसके नीचे कुछ और। धतूरे की गंध। कड़वी, भारी, जैसे कोई सालों से साँस न ले रहा हो।

मैंने लालटेन ऊपर उठाई और पहले उतरा।

तहखाना वही था। दीवारों पर रघुवीर की लिखाई, ग्यारह नाम, और उनके नीचे वो काग़ज़ जो हमने पिछली रात पढ़ा था। पर आज कुछ बदला था। ज़मीन पर ताज़ी मिट्टी बिखरी थी, और बीच में एक जगह पर मिट्टी हटी हुई थी — जैसे किसी ने कुछ खोदा हो।

"भैरव ने यहाँ कुछ ढूँढा है," मीरा ने कहा। वो मेरे पीछे उतरी थी, हाथ में टॉर्च। "देखो — मिट्टी ताज़ी है, अभी कुछ घंटे पुरानी।"

मैंने झुककर मिट्टी सूँघी। उसमें हाथ की गंध थी — मिट्टी के नीचे से आती मिट्टी की नहीं, बाहर से लाई मिट्टी की। भैरव यहाँ आया था, और कुछ लाया था।

"वो यहाँ मिलावट करने आया था," मैंने कहा। "यही जगह है जहाँ वो तहखाने की मिट्टी को ज़हर में बदलने वाला था।"

कालू काका सीढ़ियों पर खड़े थे, नीचे नहीं उतरे। उन्होंने कहा, "देखो, दीवार के उस कोने में, पत्थर के नीचे।"

मैंने पत्थर हटाया। नीचे एक हरी शीशी थी — वही रंग जो मैंने कभी कुएँ के पास पड़ी देखी थी। पर ये दूसरी थी, बड़ी। और उसके साथ एक काग़ज़ का टुकड़ा था, जिस पर भैरव की लिखाई थी — मैंने वो लिखाई तहखाने के काग़ज़ों में देखी थी।

काग़ज़ पर लिखा था — "तीसरी रात। सारी मिट्टी। नीचे से ऊपर तक ज़हर। जो बचेगा, वो गवाही नहीं देगा।"

मेरे हाथ काँपे।

"तीसरी रात," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ सपाट थी। "यानी अगर हम तीन दिन में नहीं लड़े, तो तीसरी रात वो पूरे अखाड़े की मिट्टी में ज़हर डाल देगा। और जो पहलवान वहाँ पसीना गिराएँगे, उनकी खाल से ज़हर अंदर जाएगा।"

"और जो बचेगा," टिंकू ने धीरे से कहा, "वो गवाही नहीं देगा।"

कालू काका ने अपनी कुबड़ी पीठ सीधी करने की कोशिश की। "भैरव ने ये नहीं सोचा," उन्होंने कहा, "कि मिट्टी झूठ नहीं बोलती। इतनी सारी मिट्टी में ज़हर डालने से पहले उसे मिट्टी से पूछना चाहिए था।"

"मिट्टी क्या कहेगी?" मीरा ने पूछा।

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "अगर ये चाहे, तो बहुत कुछ।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें चमक रही थीं — वैसी ही जैसी उन दिनों चमकती थीं जब वो मुझे मिट्टी गूंधना सिखाते थे।

"कैसे?" मैंने पूछा।

"तहखाने की मिट्टी असली है," उन्होंने कहा। "बाहर की मिट्टी सिर्फ़ मिट्टी है। अगर भैरव इस असली मिट्टी पर ज़हर डालेगा, तो ये मिट्टी खुद उससे इनकार कर देगी। पर उसके लिए तुझे पहले उस मिट्टी को अपना बनाना होगा। तू खुद इसमें लेटेगा, इसका पसीना पिएगा, और फिर इससे कहेगा — 'तेरे ऊपर ज़हर डालने आए हैं, तू क्या करेगी?'"

मैंने नीचे देखा। मेरे पैरों के नीचे मिट्टी थी — लाल, गर्म, जैसे अभी कोई उसमें लेटा हो। मैंने हथेली भरी। मुट्ठी में गरम लगी। कल भी गरम लगी थी।

"आज रात?" मैंने पूछा।

"आज रात," उन्होंने कहा। "पर सुबह होने से पहले लौटना होगा। भैरव के आदमी सुबह यहाँ आएँगे।"

मैं मिट्टी में बैठ गया। मीरा ने कुछ कहना चाहा, पर रुक गई। गुड़िया ने ऊपर से आवाज़ दी — "भैया?" और मैंने कहा, "हाँ, मैं यहीं हूँ।"

मैंने पीठ के बल मिट्टी में लेट गया। मिट्टी गरम थी, जैसे किसी ने उसे अभी छोड़ा हो। मेरी आँखें बंद हो गईं। सीने पर हल्का-सा दबाव आया। मैंने साँस ली।

और फिर मुझे कुछ ऐसा दिखा जो मैंने कभी नहीं देखा था — पर महसूस ज़रूर किया था। एक बूढ़ा आदमी, कुबड़ा, दीवार के पास खड़ा है और भैरव को रोक रहा है — "बेटा, ये मिट्टी तेरी नहीं है।" और भैरव का जवाब — "मैं तो इसे अपना बनाने आया हूँ।" वो बूढ़ा कालू काका थे, बीस साल पहले के। और भैरव की आवाज़ में वो गुड़ नहीं था, सिर्फ़ ज़हर।

मैंने आँखें खोलीं। मेरा सिर भारी था, पर सीने का दबाव हट गया था। मिट्टी की गंध अब और गहरी लग रही थी।

"मिला कुछ?" कालू काका ने ऊपर से पूछा।

"मिला," मैंने कहा। "मुझे पता चल गया कि भैरव डरेगा किस बात से।"

मैं उठा और मीरा की तरफ़ देखा। "हमें अलमारी नहीं खोलनी," मैंने कहा।

"क्या?"

"अलमारी खोलेंगे, तो भैरव जान जाएगा कि हमने कुछ लिया। और वो अपने काग़ज़ पहले ही हटा देगा। हमें अलमारी खोलनी है, पर भैरव के देखते हुए।"

"यानी?" टिंकू ने कहा।

"यानी कल सुबह, आधे गाँव के सामने," मैंने कहा। "हम अलमारी खोलेंगे, और सबके सामने वो काग़ज़ निकालेंगे। भैरव देखेगा, पर कुछ नहीं कर पाएगा, क्योंकि सारा गाँव वहाँ होगा।"

कालू काका नीचे झुके। उनका चेहरा लालटेन की रोशनी में चमक रहा था। "वही तो," उन्होंने कहा। "पर एक बात — भैरव तीन दिन की बात कह रहा है। वो तीन दिन का इंतज़ार क्यों करेगा? वो कल भी हमला कर सकता है।"

"वो करेगा," मैंने कहा। "पर उसे लगता है कि हम डर गए हैं। आज पुलिस के सामने माँ खड़ी हो गईं, इससे वो और शक में है। वो सोचेगा कि हम कुछ करने वाले हैं।"

"तो वो पहले हमला करेगा," मीरा ने कहा।

"हाँ," मैंने कहा। "और हमें उसी हमले का इंतज़ार है।"

हम ऊपर लौटे। गुड़िया नीम के नीचे बैठी थी, हाथ में टिंकू की टोपी पकड़े। जब मैंने उसे देखा, तो वो उठी और भागकर मेरे पास आई।

"भैया, तुम्हारा मुँह पीला है," उसने कहा।

"मिट्टी की गंध लगी है," मैंने कहा।

"तुम्हारी नाक से खून आ रहा है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में डर था।

मैंने हाथ लगाकर देखा। हल्का खून था। मैंने पोंछ दिया।

"ठीक है," मैंने कहा। "चल, घर चलें।"

घर लौटकर माँ ने दरवाज़ा खोला। उन्होंने मेरा चेहरा देखा और कुछ नहीं पूछा। बस रसोई में गईं और एक कटोरी में पानी लेकर आईं, उसमें नमक डाला, और मेरी नाक पर पोछा रखा।

"अब सो जा," उन्होंने कहा।

"माँ—"

"सो जा," उन्होंने कहा। "कल सुबह तेरे पास बहुत काम है।"

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