Spirit of a Fighter149 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 149

7 min read November 5, 2026

अब माँ ने कदम आगे बढ़ाया। उनकी साड़ी का पल्ला हवा में हिला। माथे पर हल्दी का टीका, सफ़ेद चोटी, और आँखों में वो चमक जो मैंने पच्चीस साल में कभी नहीं देखी थी।

"सर," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ गली में गूंजी, "मैं सरस्वती हूँ। रघुवीर की बीवी। बीस साल पहले मेरे पति को इसी अखाड़े ने खाया था। उस दिन मैंने चुप्पी सही। मेरे सामने लोगों ने कहा — 'बीमारी से गए।' मैंने कुछ नहीं बोला, क्योंकि मेरे पास सबूत नहीं थे और मेरे दो बच्चे थे।"

गली में सन्नाटा छा गया। भैरव की मुस्कान अब नहीं थी। वो खड़ा था, हाथ जोड़े हुए, पर उँगलियाँ सख़्त हो गई थीं।

"बीस साल मैंने चुप्पी सही," माँ ने कहा। "चार बजे चक्की चलाई, बेटे को पाला, और हर रोज़ उसी मिट्टी से बैर रखा जिसने मेरे पति को खाया। पर अब नहीं। आज मेरा बेटा मेरे सामने खड़ा है, और आप उसे हथकड़ी लगाने आए हैं? पहले मेरी आँखों में देखिए, सर।"

पुलिस वाले ने देखा। वो देख ही रहा था — ये माँ की आँखें थीं, कोई तर्क नहीं।

उसका हाथ बेल्ट की तरफ़ गया, और फिर वहीं रुक गया। पीछे वाले ने धीरे से कहा, "सर…"

तभी भीड़ में से एक आवाज़ उठी। तेज़, चमकीली, और बिलकुल सुक्खी बुआ की।

"अरे मैंने तो सुना है," वो आगे आईं, पान का बीड़ा हाथ में लिए, "कि भैरव सिंह ने खुद किसी को बुलाकर कल रात आग लगवाई है। और अब पुलिस को फँसा रहे हैं।"

भैरव पहली बार हिला। "सुक्खी बुआ, आप—"

"मैं क्या?" सुक्खी बुआ ने उनकी तरफ़ घूमकर देखा। "मैं तो गाँव की बुआ हूँ, मुझे सब पता है। कल रात गोपी का लड़का बैलगाड़ी लेकर अखाड़े की तरफ़ गया था — उसने खुद मुझसे कहा, 'बुआ, भैरव साहब ने बुलाया है।' और आज सुबह गोपी का लड़का घर में मुँह छिपाकर बैठा है। क्यों?"

भीड़ में गुस्से की लहर दौड़ी। कोई बोला, "हाँ, मैंने भी देखा था।" कोई बोला, "गोपी के लड़के को बुलाओ।"

पुलिस वाले ने हाथ उठाया। "शांत, शांत।" उसने भीड़ को देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर भैरव की तरफ़। उसका चेहरा बदल रहा था। "ठीक है। मैं रिपोर्ट में लिखूँगा कि जाँच बाकी है। आरोप साबित नहीं हुआ। फिलहाल कोई गिरफ़्तारी नहीं।"

भैरव का मुँह खुला रह गया। "सर, ये क्या बात हुई? मैंने शिकायत—"

"भैरव जी," पुलिस वाले ने धीमी आवाज़ में कहा, "आप पंचायत के आदमी हैं, मैं जानता हूँ। पर भीड़ देख रहे हैं? अभी कुछ नहीं होगा। आप अपनी तरफ़ से सबूत दीजिए। मैं जाँच करूँगा।"

भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो ठंडक थी जो कुएँ में होती है — गहरी, और कुछ न पाने वाली। उसने होंठ हिलाए, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर वो पलटा और भीड़ के बीच से निकल गया। उसकी धोती की लाल मिट्टी की गंध हवा में रह गई।

पुलिस वाले ने अपनी बेल्ट ठीक की। जाने से पहले वो मेरे पास आया। उसने धीरे से, इतना धीरे कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ, कहा —

"बेटा, भैरव सिंह के पुलिस में आदमी हैं। ऊपर तक। आज मैंने भीड़ के डर से तुझे छोड़ा है, पर कल वो ऊपर से आदेश ले आएगा। सँभलकर रहना।"

वो पलटा और चला गया। पीछे वाला भी चला।

गली में लोग खड़े रह गए। सुक्खी बुआ ने पान का बीड़ा मुँह में डाला और ज़ोर से चबाया, जैसे उन्होंने कोई बड़ा काम कर दिया हो।

मैं माँ की तरफ़ पलटा। वो वहीं खड़ी थीं, हाथ जोड़े हुए, आँखें बंद। होंठ हिल रहे थे — कोई दुआ। जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो उनमें पानी था। पर वो हँस रही थीं।

"देखा?" उन्होंने कहा। "मैंने कहा था न — भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है।"

मेरा गला भर आया। मैंने उनके पैर छुए। उन्होंने मेरा सिर उठाया और माथे पर हाथ रखा।

"उठ," उन्होंने कहा। "अभी रोने का वक़्त नहीं। अभी लड़ने का वक़्त है।"

मीरा मेरे पास आई। उसके हाथ में वो काग़ज़ अब भी था, पर उसने उसे सीने से लगा रखा था, जैसे कोई कीमती चीज़ हो।

"तुम्हारी माँ," उसने धीरे से कहा। "उन्होंने आज जो किया…"

"मुझे पता है," मैंने कहा।

"नहीं, तुम्हें नहीं पता," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो नरमी थी जो कभी-कभी आती थी। "मैंने अपने पापा को कभी ऐसे नहीं देखा। जब वो व्हीलचेयर पर आए थे, तब भी उनकी आँखों में ये चमक नहीं थी। तुम्हारी माँ ने आज पुलिस को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।"

टिंकू दौड़ता हुआ आया। उसके हाथों पर पट्टी थी, और वो पट्टी उसने अपनी टोपी से बनाई थी। "भाई, मैंने सुना — वो जा रहे हैं? सच में जा रहे हैं?" उसकी आँखें बड़ी थीं, जैसे किसी ने उसे चुटकी काटी हो।

"जा रहे हैं," मैंने कहा।

"मैं तो दुकान के पीछे छिपा था," उसने कहा, और फिर हँसी छूट गई। "सोचा, अगर पकड़ लिया तो कहूँगा — मैं तो मिठाई वाला हूँ, आग मुझे क्या जलाएगी।"

"तू छिपा था?" मैंने पूछा।

"हाँ। तेरे पास आने की हिम्मत नहीं हुई। सॉरी भाई।"

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसकी पट्टी से हल्दी और घी की गंध आ रही थी — वही गंध जो उसकी दुकान से आती थी।

"तू छिपा नहीं था," मैंने कहा। "तू दुकान बचा रहा था।"

वो चुप हो गया। फिर उसने नज़रें चुराकर कहा, "दुकान तो जल गई।"

"दुकान नहीं जलेगी," माँ ने पीछे से कहा। "तू मिठाई बनाएगा, और मैं खुद उसमें शक्कर डालूँगी।"

टिंकू की आँखें भर आईं। उसने तेज़ी से मुँह फेर लिया और आस्तीन से नाक पोंछी।

उस शाम हम सब मेरे आँगन में बैठे थे। जली चक्की का ढाँचा अब भी वहीं पड़ा था — काला, टेढ़ा, जैसे कोई बूढ़ा आदमी थककर बैठ गया हो। माँ ने उसे देखा और कुछ नहीं बोलीं। वो रसोई में गईं और सबके लिए चाय बनाई — गुड़ और अदरक वाली, वही जो मुंशीजी को पसंद थी।

हम बैठे और हिसाब लगाया।

"सबूत," मीरा ने कहा। उसने घुटनों पर काग़ज़ रखा और उँगली से लिखा, जैसे हवा में ही लिख रही हो। "हमारे पास क्या है? पहला — मेरे पापा की चौकीदार वाली गवाही। दूसरा — हरनाम की हरी कवर वाली कॉपी। तीसरा — तहखाने से मिले काग़ज़। चौथा — लैब रिपोर्ट। पाँचवाँ — वो कड़ी जो अखाड़े की मिट्टी में मिली।"

"और छठा," मैंने कहा, "मेरी नाक।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"मैं गंध से बता सकता हूँ कि कौन ज़हर पी चुका है," मैंने कहा। "अगर मुझे एक बार वो सब पहलवान मिल जाएँ जो बीमार पड़े, तो मैं बता सकता हूँ कि उनमें किसमें भैरव का ज़हर है और किसमें नहीं। यही सबसे बड़ा सबूत होगा — डॉक्टर की रिपोर्ट का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा।"

माँ ने चाय का प्याला मेरे आगे रखा और कहा, "पर तेरी नाक पर दाग मत लगाना। ज़्यादा इस्तेमाल करेगा, तो नाक से खून आएगा, और फिर तू मैदान में किस काम का?"

मैंने चाय पी।

"आज रात," मीरा ने कहा। "आज रात हमें अलमारी खोलनी है।"

"पर भैरव ने पहले ही कह दिया," टिंकू ने कहा, "कि वो तीन दिन बाद खुद खोलेगा। अगर हम आज रात खोलेंगे, तो उसे पता चल जाएगा।"

"पता चले," मैंने कहा।

सबने मेरी तरफ़ देखा।

"अगर उसे पता चलेगा कि अलमारी खुल गई," मैंने कहा, "तो वो अपने आदमियों को भेजेगा। और जब वो भेजेगा, तो वो खुद आएगा — क्योंकि उसे अंदर क्या है, यही पता है। और जब वो आएगा, तो हम उसे उसी हाल में पकड़ेंगे।"

"ये तो…" टिंकू ने कहा, "ये तो खतरनाक है, भाई।"

"है," मैंने कहा।

माँ ने प्याला नीचे रखा। "ये खतरा तो कल भी था," उन्होंने कहा। "आज सिर्फ़ बात बदली है।"

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