Spirit of a Fighter – Chapter 144
हरनाम किनारे खड़ा था। उसका चेहरा पीला पड़ गया था।
"वो आता है," उसने धीरे से कहा। "महीने में एक बार। अमावस की रात। मैंने सोचा था… किसी की क़ब्र पर दीया जलाने आता होगा।"
"किसकी क़ब्र?" मैंने पूछा।
हरनाम ने जवाब नहीं दिया। उसने अपनी जेब में हाथ डाला और एक फोटो निकाली। पुरानी, मुड़ी हुई। उसे सीधा किया, अपनी उँगली से धूल पोंछी, और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
फोटो में एक लड़का था। दस-ग्यारह साल का। स्कूल की वर्दी में, हाथ में बस्ता, मुँह पर वो हँसी जो बच्चों की होती है — बिना वजह, बिना हिसाब।
"मेरा बेटू," हरनाम ने कहा। उसकी आवाज़ टूट गई। "बीस साल का हो गया। पर पैर सून्न हैं। जन्म से। डॉक्टर बोले, इलाज है, पर पैसा बहुत लगेगा।"
वो रुका। उसने फोटो को सीने से लगाया।
"मैंने सोचा था सिर्फ़ पैसा कमाऊँगा। भैरव का काम करूँगा, चुप रहूँगा, और एक दिन बेटे को चलता हुआ देखूँगा।" उसकी आँखों से पानी बह रहा था, पर आवाज़ साफ़ थी। "पर उसने मेरे बच्चे को भी ज़हर दिया। वही पानी जो पहलवानों को पिलाता है, वही मेरे बेटे की दवा में मिला दिया। धीरे-धीरे। ताकि मैं कभी उससे दूर न जाऊँ।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए। नाखून हथेली में गड़ने लगे।
"अब तू मेरे साथ चलेगा," मैंने कहा। आवाज़ मेरी भारी थी, पर साफ़। "कल सुबह पुलिस के सामने। सब बोलेगा, जो तूने देखा।"
हरनाम ने सिर हिलाया। पहली बार उसकी आँखों में डर के साथ कुछ और था। जैसे कोई आदमी बीस साल बाद साँस ले रहा हो।
टिंकू ने संदूक को हिलाया। "भैया, ताला तो है, पर नीचे कुछ चिपका है।"
मैंने झुककर देखा। संदूक के पेंदे से एक काग़ज़ चिपका था, गोंद की परत सूखकर पीली पड़ गई थी। मैंने उसे धीरे से उतारा।
काग़ज़ बहुत पुराना नहीं था। लिखावट मोटी थी, जल्दी में लिखी हुई। और उस पर एक नाम था जिसे पढ़ते ही मेरी साँस रुक गई।
जगदीश।
मेरे पापा का नाम। जिन्होंने मुझे गोद लिया था। जो मुझे कंधे पर बैठाकर गली में घुमाते थे। जिनकी मौत के बाद मेरी दुनिया बदल गई थी।
और उस नाम के नीचे एक तारीख़ लिखी थी। मेरे जन्म की तारीख़।
मेरी उँगलियाँ काँपने लगीं। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा, पर मैंने उसे महसूस नहीं किया। मैं वहाँ खड़ा था, एक काग़ज़ हाथ में, और ऐसा लगा जैसे ज़मीन मेरे पैरों के नीचे से खिसक गई हो।
"क्या है?" मीरा ने पूछा।
मैंने जवाब नहीं दिया। मैं सिर्फ़ उस नाम को देखता रहा, और सोचता रहा कि मेरे पापा की मौत की तारीख़, मेरे जन्म की तारीख़ पर क्यों लिखी है।
॥
वो काग़ज़ मेरे हाथ में काँप रहा था। मैंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा, फिर भी काँपता रहा। मेरे कानों में एक हल्की सी सीटी बजने लगी — वो आवाज़ जो डर के वक़्त आती है, जब दिल धड़कना भूल जाए और साँस रुक जाए।
"वीर?" मीरा ने कंधे पर हाथ रखा। "तेरा चेहरा सफ़ेद पड़ गया। क्या लिखा है?"
मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ा दिया। मेरी ज़ुबान सूख गई थी, जैसे मुँह में रेत भर दी हो।
मीरा ने लैंप की रोशनी में काग़ज़ पढ़ा। उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। फिर उसने एक बार मेरी तरफ़ देखा, और मैंने पहली बार उसकी आँखों में वो डर देखा जो वो कभी नहीं दिखाती।
"पढ़ो," मैंने कहा। आवाज़ भारी थी, जैसे किसी और की हो।
उसने गला साफ़ किया। "ऊपर लिखा है — जगदीश सिंह, उम्र अड़तालीस साल। मौत का कारण — दिल का दौरा।" वो रुकी। उसकी उँगली काग़ज़ के नीचे सरकी। "पर नीचे… नीचे भैरव की लिखाई है। अलग रंग की स्याही। छोटे अक्षरों में।"
"क्या लिखा है?" टिंकू ने सामने से झाँका।
मीरा ने आँखें सिकोड़कर देखा। "लिखा है — पानी पिलाया। तीसरी खुराक। रात में बेहोश हुआ। सुबह तक ठंडा।"
तहखाने में इतनी खामोशी छा गई कि मुझे अपने दिल की धड़कन दीवारों से टकराकर लौटती सुनाई दी। रणवीर सिंह की व्हीलचेयर की पहिया हल्की चरमराई, फिर रुक गई।
"तीसरी खुराक," मैंने धीरे से दोहराया। "मतलब दो बार पहले भी दिया था।"
"तीसरी खुराक में आदमी ठंडा हो जाता है," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ तहखाने की हवा में लुढ़क गई। "पहली में ताकत का नशा। दूसरी में शरीर टूटने लगता है। तीसरी… तीसरी में दिल रुक जाता है। यही पैटर्न है। बीस साल से यही पैटर्न है।"
मेरे घुटने भारी हो गए। मैं दीवार का सहारा लेकर बैठ गया। मिट्टी मेरी हथेली से चिपक गई, ठंडी और नम।
मुझे याद आया। पापा जगदीश — मेरे गोद लेने वाले पापा — उस सुबह चाय पी रहे थे। आँगन में बैठे थे, धूप में। उन्होंने मुझे गोद में बिठाया था और कहा था, "वीर, तू बड़ा होकर पहलवान बनेगा, तो मैं तेरा नाम सबसे पहले बोलूँगा।" फिर अगले ही हफ़्ते वो बीमार पड़े। दो दिन बुखार। तीसरे दिन सुबह वो उठे ही नहीं।
माँ ने रोते हुए कहा था — "दिल का दौरा। भगवान को यही मंज़ूर था।"
भगवान को नहीं। भैरव को मंज़ूर था।
"मैंने उसे देखा था।"
आवाज़ कालू काका की थी। वो अब तक चुप खड़े थे, दीवार से सटे। उनका कुबड़ा शरीर लैंप की रोशनी में और भी छोटा लग रहा था। उनकी सफ़ेद दाढ़ी हिल रही थी।
"क्या देखा था, काका?" मैंने पूछा।
वो मेरी तरफ़ नहीं देख पा रहे थे। उन्होंने अपनी गर्दन नीची कर ली और दोनों हाथ लाठी पर जमा दिए, जैसे कहीं गिर न जाएँ।
"उस रात मैं अखाड़े में सोया था। मेरी झोपड़ी से जगदीश का कमरा दो कदम पर था। रात का दूसरा पहर। मुझे प्यास लगी, उठा। तभी जगदीश के कमरे का दरवाज़ा खुला।" उनका गला रुँध गया। "भैरव निकला। हाथ में गिलास। गिलास खाली था। उसने दरवाज़ा बंद किया, पीछे मुड़ा, और मुझे देखा।"
"और तुमने कुछ नहीं कहा?" टिंकू की आवाज़ में गुस्सा काँप रहा था।
काका की आँखों से पानी बहने लगा। वो धीरे-धीरे घुटनों के बल बैठ गए। उनकी लाठी खड़खड़ाकर गिरी, पर किसी ने नहीं उठाई। "मैं डर गया, बेटा। उसने सिर्फ़ एक बार देखा, और मैं अपनी झोपड़ी में घुस गया। दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। पूरी रात काँपता रहा। सुबह आवाज़ आई — जगदीश मर गया।" उन्होंने अपना सिर हाथों में पकड़ लिया। "बीस साल मैंने वो रात अपने सीने में ढोई। हर सुबह मिट्टी सींचता रहा, और हर शाम सोचता रहा कि काश… काश मैं चिल्ला पाता।"
मैं उठा। मेरे पैर काँप रहे थे, पर मैं उठा। मैं उनके पास गया और घुटनों के बल उनके सामने बैठ गया। मैंने उनके हाथ अपने हाथों में लिए। उनकी उँगलियाँ सूखी लकड़ी जैसी थीं, ठंडी।
"काका, मेरी तरफ़ देखिए।"
वो धीरे से सिर उठाया। उनकी आँखें लाल थीं।
"आपने उस रात चुप रहकर मेरी जान बचाई थी," मैंने कहा। "अगर आप चिल्लाते, तो भैरव उसी रात आपको भी ठंडा कर देता। और फिर आज मुझे ये रास्ता कौन दिखाता? कौन मुझे मिट्टी गूंधना सिखाता? कौन मुझे बताता कि मेरे पापा कैसे मरे?"
उनका होंठ हिला, पर आवाज़ नहीं निकली।
"काका, आपने मुझे वो रास्ता दिखाया जो मेरे पापा भूल गए थे। ये माफ़ी का वक़्त नहीं है। ये शुक्रिया का वक़्त है।"
मैंने उन्हें गले लगा लिया। उनका शरीर छोटा था, हड्डियों का ढाँचा, पर उसी में बीस साल का बोझ भरा था। वो मेरे कंधे पर सिसकने लगे। तहखाने की दीवारें उनकी सिसकियों से गूँज उठीं।
मीरा ने मेरी पीठ पर हल्का हाथ रखा। रणवीर सिंह ने कुर्सी घुमाई, उनका चेहरा दीवार की तरफ़ था। पर मैंने देखा — उनका एक हाथ कुर्सी की बाँह पर इतनी ज़ोर से जमा था कि नसें उभर आई थीं।
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