Spirit of a Fighter145 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 145

6 min read November 5, 2026

जब काका थोड़े शांत हुए, तो टिंकू ने धीरे से कहा, "भाई, अब हमें चाबी चाहिए। और चाबी भैरव के पास है।"

हरनाम आगे आया। उसने अपना चश्मा उतारा, आँखें पोंछीं, फिर पहनी। "कल रात," उसने कहा। "कल रात वो अखाड़े आएगा। मैंने उसकी बात सुनी थी — किसी से फ़ोन पर बोल रहा था। कह रहा था, आख़िरी खेप। अमावस की रात। तहखाने की मिट्टी उठानी है, बोरियों में भरनी है। और उस वक़्त चाबी उसकी कमर पर ही होगी — अलमारी की भी, तहखाने की भी।"

"मतलब एक ही मौक़ा," मीरा ने कहा। वो अपने बैग के पास गई और उसमें से एक छोटी डायरी निकाली। पन्ने पलटे। "अगर हम सीधे टकरेंगे, तो वो चाबी हमें नहीं देगा। उसके पास आदमी हैं। हमें उसे चाबी छोड़ने पर मजबूर करना होगा।"

"कैसे?" मैंने पूछा।

उसने डायरी बंद कर दी और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक लौट आई थी जो मुझे पहली बार अखाड़े के गेट पर दिखी थी।

"आग," उसने कहा।

सब चुप हो गए।

"नाटक की आग," वो जल्दी से बोली। "अखाड़े के पिछवाड़े में जहाँ भैरव का कमरा है, वहाँ से धुआँ उठे। भैरव को लगे कि उसका कमरा जल रहा है। वो भागेगा। भागते वक़्त चाबी गिरा सकता है, या उसका ध्यान बँटेगा। हमें सिर्फ़ इतनी देर चाहिए।"

"भैरव भागेगा नहीं," रणवीर सिंह ने कुर्सी घुमाकर कहा। उनकी आवाज़ सपाट थी। "भैरव पहले पानी भिगोएगा, फिर देखेगा। वो घबराता नहीं।"

"तो हमें उसे सच में घबराना पड़ेगा," मीरा ने कहा।

"मैं करूँगा," टिंकू ने कहा।

सबने उसे देखा। वो पहले थोड़ा सिकुड़ा, फिर सीधा खड़ा हो गया। उसने अपनी टोपी ठीक की।

"मैं आग जलाऊँगा। छोटी सी। बस धुआँ हो। मैं रसोइया हूँ, चूल्हा जलाना मुझे आता है।" उसकी आवाज़ में काँपन था, पर रुकी नहीं। "पर भाई, अगर पकड़ा गया तो…"

"तो क्या?" मैंने कहा।

"तो मेरी माँ को कौन बताएगा कि मैं रसोई में नहीं, अखाड़े में था?"

हँसी सबके मुँह से एक साथ निकली। ऐसी हँसी जो डर के बीच से फूटती है। काका ने अपनी आँखें पोंछीं और पहली बार हल्का सा मुस्कुराए।

मैंने टिंकू का कंधा पकड़ा। "टिंकू, तेरी मिठाई जीतने वाले पहलवान के मुँह में जाएगी — याद है ना?"

"याद है," उसने कहा।

"तो ये भी याद रख — उस पहलवान को पहले जीतना पड़ेगा। और उसके लिए हमें कल रात चाबी चाहिए।"

टिंकू ने एक गहरी साँस ली। "अब तो जाना ही पड़ेगा।" फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। "पर भाई, एक बात पहले साफ़ कर ले — अगर मैं आग जलाऊँगा, तो खीर कल रात के लिए बचा लेता हूँ। जीत के बाद खाएँगे।"

"बचा ले," मैंने कहा।

हरनाम ने अपनी जेब से एक छोटी चाबी निकाली। वो चाँदी जैसी चमक रही थी। "ये अलमारी के नीचे वाले ताले की है। एक ही नक़ल है, मेरे पास। भैरव को पता नहीं।" उसने मेरी तरफ़ बढ़ाई, फिर रोक ली। "पर याद रख, अगर वो इसे देख ले, तो समझ जाएगा कि कोई अंदर से है। और फिर वो सबको ढूँढ निकालेगा।"

"तो मैं इसे उस वक़्त इस्तेमाल करूँगा जब वो तहखाने में होगा," मैंने कहा। "और उसके हाथ में चाबी होगी।"

"कैसे?" मीरा ने पूछा।

मैंने मिट्टी की तरफ़ देखा। तहखाने की मिट्टी, जिसमें सैकड़ों साल की ताकत सोई थी, जिसमें बीस साल का ज़हर भी मिला था।

"वो कल रात मिट्टी उठाने आएगा," मैंने कहा। "अकेला नहीं आएगा। आदमियों के साथ आएगा। आदमी उतारेगा सीढ़ी पर, तब खुद उतरेगा। तब उसकी कमर पर चाबी होगी।" मैंने मीरा की तरफ़ देखा। "तू कहती है आग का नाटक करें। पर भैरव आग से नहीं डरता। वो डरता है उस चीज़ से जो उसकी अलमारी में है।"

"मतलब?"

"मतलब — हम उसे दिखाएँगे कि अलमारी खुली है।"

मीरा की आँखें चौड़ी हुईं। "वीर, वो ख़तरनाक है। अगर उसे लगे कि काग़ज़ निकल गए, तो वो पागल हो जाएगा।"

"पागल ही तो चाहिए," मैंने कहा। "पागल आदमी सोच नहीं पाता। भागता है। और भागते वक़्त चाबी छोड़ जाता है।"

रणवीर सिंह ने कुर्सी थोड़ी आगे की। "बेटा, बीस साल मैंने इस आदमी को देखा है। वो पागल नहीं होगा। वो हँसेगा। और फिर तुम्हें मारेगा।"

"तो हमें उससे पहले मारना होगा," मैंने कहा। "उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी क्या है, पापा जी?"

रणवीर सिंह कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे। मैंने उन्हें पहली बार 'पापा जी' कहा था, और मुझे ख़ुद अचरज हुआ कि कैसे निकल गया। वो नरम पड़ गए।

"उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी," उन्होंने धीरे से कहा, "उसका नाम है। वो चाहता है कि उसका नाम कोई न जाने, क्योंकि उसका नाम उसके पिता से जुड़ा है। उसके पिता की हार से। अगर तुम उसके सामने भवानी सिंह बोल दो, तो वो अपना आपा खो देगा।"

"तो कल रात," मीरा ने कहा, "हम उसके सामने भवानी सिंह बोलेंगे। और जब वो झल्लाएगा, तब हम अलमारी का नाटक करेंगे।"

"तीन चीज़ें एक साथ," मैंने कहा। "टिंकू धुआँ। मैं उसके सामने नाम। मीरा चाबी।"

"और मैं?" रणवीर सिंह ने पूछा।

"आप सीढ़ी के ऊपर रहिएगा," मैंने कहा। "अगर हम फँसें, तो आप ही हमें निकाल सकते हैं।"

उन्होंने एक पल सोचा, फिर सिर हिलाया। "ठीक। पर वीर, एक वादा करो — जब तुम उसकी अलमारी खोलो, तो सबसे पहले वो हरा कवर वाली कॉपी निकालना। बाक़ी बाद में।"

"क्यों?"

"क्योंकि उस कॉपी में हर मौत का नाम है। और एक नाम ऐसा भी है जो तुमने अभी तक नहीं देखा।" उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "मेरे पापा का नहीं। मेरे गुरु का। जिन्होंने मुझे पहलवान बनाया।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

"कौन?" काका ने पूछा, आवाज़ में काँपन।

"वो नाम मैं कल बताऊँगा," रणवीर सिंह ने कहा। "अभी नहीं। पहले काम पूरा करो।"

हरनाम ने चाबी मेरे हाथ में रख दी। वो ठंडी थी, और मेरी मुट्ठी में गर्म हो गई।

हम तहखाने से बाहर निकले। कुएँ की सीढ़ियाँ भैरव ने तुड़वा दी थीं, पर काका ने पिछवाड़े वाला रास्ता खोल दिया था — नीम के पेड़ के नीचे से, झाड़ियों के पीछे से। रात की हवा में मिट्टी की गंध तैर रही थी, पर उसमें कुछ और भी था। कुछ जला हुआ।

मैं पहले निकला। मेरे पीछे मीरा, फिर टिंकू, फिर काका। रणवीर सिंह सीढ़ी पर रुके — उन्हें ऊपर खींचने के लिए दो आदमियों की ज़रूरत थी, और हरनाम ने कहा कि वो अंदर ही रुकेगा, बाहर भीड़ में नहीं दिखेगा।

अखाड़े की दीवार के बाहर निकलते ही मैंने आसमान देखा।

मेरी साँस रुक गई।

गाँव की तरफ़ आसमान लाल था। ऐसा लाल जैसे किसी ने आधे आसमान पर लाल रंग उँडेल दिया हो। और उस लाल के बीच से धुआँ उठ रहा था — मोटा, काला धुआँ, जो हवा में लहरा रहा था।

"वो… वो हमारी तरफ़ है," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ फट गई।

मैं भागा। पैर मिट्टी में धँसते गए, पर मैं रुका नहीं। मीरा मेरे पीछे भागी, टिंकू भी। काका पीछे रह गए, पर उन्होंने लाठी ज़मीन पर टेकते हुए भागने की कोशिश की।

गाँव की गली में घुसते ही मुझे रोटी जलने की गंध आई। वो गंध मेरे सीने में घुस गई। मैंने सैकड़ों बार माँ के चूल्हे पर रोटी जलते देखी थी — हल्की सी काली, फिर फेंक दी जाती थी। पर ये गंध अलग थी। ये पूरे घर की गंध थी।

आँगन का दरवाज़ा खुला था। भीतर से लपटें उठ रही थीं। चक्की — जो माँ ने चालीस साल चलाई थी — आग में लिपटी खड़ी थी, और उसकी लकड़ी चटचटा रही थी।

"माँ!" मेरी आवाज़ फट गई।

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