Spirit of a Fighter138 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 138

6 min read November 5, 2026

भैरव मेरी तरफ़ मुड़ा। उसकी आँखें छोटी हो गईं।

"क्योंकि मेरे पिता ग़ुस्से में थे," उसने कहा। "उन्होंने वापस धक्का दिया। और रघुवीर कुएँ में गिर गए।"

माँ की साँस रुक गई। उन्होंने अपनी छाती पर हाथ रखा, जैसे कोई चीज़ अंदर से टूट रही हो।

"तो तेरे पिता ने…" उनकी आवाज़ फूट गई।

"मेरे पिता ने उन्हें बचाने की कोशिश की," भैरव ने कहा। पहली बार उसकी आवाज़ में कुछ नरम हुआ। "रस्सी डाली। पर रघुवीर का हाथ फिसल गया। और जब मेरे पिता नीचे उतरे, तब तक…"

वो रुक गया। उसने अपनी मुट्ठी देखी।

"तब तक देर हो चुकी थी।"

"तो तेरे पिता ने अंगूठी क्यों निकाली?" माँ ने पूछा। "अगर वो बचाना चाहते थे, तो अंगूठी क्यों?"

भैरव ने जवाब नहीं दिया। उसने अपनी जेब से कुछ निकाला। एक पुरानी तस्वीर। फटी हुई। उसने उसे माँ की तरफ़ बढ़ाया।

"क्योंकि मेरे पिता तुमसे प्यार करते थे," उसने कहा। "रघुवीर से पहले से। उस रात उन्होंने अंगूठी निकाली, क्योंकि वो उसे तुम्हारे पास लौटाना चाहते थे। कहना चाहते थे — जो हुआ, वो मेरी वजह से हुआ। माफ़ कर दो।"

मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनके होठ काँप रहे थे। उन्होंने तस्वीर नहीं उठाई।

"वो आया ही नहीं," उन्होंने कहा। "बीस साल। वो कभी नहीं आया।"

"क्योंकि मेरे पिता अगले महीने मर गए," भैरव ने कहा। "बुख़ार से। पर शायद… शायद उनकी मौत बुख़ार से नहीं थी।"

वो खड़ा हो गया। उसके आदमी दूर खड़े देख रहे थे, पर कोई पास नहीं आया।

"मैंने तुमसे नफ़रत की," वो माँ से बोला, "क्योंकि मुझे लगा तुमने मेरे पिता को मारा। मैंने रघुवीर की याद में ज़हर घोला। मैंने तुम्हारे बेटे को अखाड़े से दूर रखा।" वो मेरी तरफ़ देखकर बोला, "पर आज मुझे पता चला कि मैं बीस साल से ग़लत आदमी से नफ़रत कर रहा था।"

मेरे हाथ में अभी भी वो पीतल का डिब्बा था। मैंने उसे उलटा किया। नीचे उसके पिता का नाम खुदा था। बलवंत सिंह।

"ये डिब्बा मिट्टी में क्यों दबा था?" मैंने पूछा।

भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। "क्योंकि मेरे पिता ने उसे उसी रात दबाया था। अंगूठी के साथ। कहा था — जिस दिन ये मिट्टी से निकलेगा, उस दिन सच भी निकलेगा।"

उसने एक गहरी साँस ली।

"पर वो अगले महीने मर गए," उसने कहा। "और मैंने अखाड़ा सँभाल लिया। मैंने ये डिब्बा भूल गया। तुम्हारी मिट्टी सबसे ऊपर थी। मैंने कभी सोचा नहीं कि नीचे क्या है।"

मैंने डिब्बे को अपनी मुट्ठी में कस लिया। मेरे हाथ की गर्मी उस ठंडे पीतल पर चढ़ रही थी।

"तो अब क्या?" मैंने कहा।

भैरव ने माँ की तरफ़ देखा। उसने अपनी जेब से चाबियाँ निकालीं। अखाड़े की चाबियाँ। कुएँ की चाबी। उसने वो मेरी तरफ़ बढ़ा दीं।

"अब तुम जो कहो," उसने कहा। "मैं मानूँगा।"

॥

चाबियाँ मेरे हाथ में थीं। ठंडी, भारी, और उँगलियों में ऐसी लगीं जैसे किसी ने मुझे शिकंजे में दबा लिया हो।

मैंने उन्हें जेब में डाल दिया और भैरव की तरफ़ देखा। वो वहीं खड़ा था, कंधे झुके हुए, जैसे अचानक उसका पूरा शरीर भारी हो गया हो। उसकी बड़ी तेल लगी मूँछें नीची लटक गई थीं। सोने की चेन गले में ऐसी लटक रही थी जैसे किसी पुरानी तस्वीर में हो।

"अभी नहीं," मैंने कहा। "अभी मैं कुछ नहीं कहूँगा।"

भैरव ने सिर हिलाया। और फिर वो धीरे-धीरे पलटा और चला गया — उसी रास्ते से, जिससे आया था। उसके आदमी भी उसके पीछे हो लिए, पर कोई कुछ नहीं बोला। दूर से लुट्टन खड़ा देख रहा था, उसकी आँखों में वो डर था जो आदमी के भीतर तब आता है जब उसका सारा बना-बनाया खेल एक पल में टूट जाए।

मैंने पीतल का डिब्बा दोनों हाथों में पकड़ा और माँ की तरफ़ मुड़ा।

माँ वहीं खड़ी थीं। उनकी शादी की साड़ी की किनारी मिट्टी में लग गई थी। माथे का हल्दी का टीका पसीने से फैल गया था। पर उनकी आँखें… उनकी आँखें उस अंगूठी पर टिकी थीं, जो मेरी मुट्ठी में थी।

"माँ।"

वो नहीं हिलीं।

"माँ, ये अंगूठी…"

"मैंने ये अंगूठी पहनी थी," उन्होंने कहा। आवाज़ ऐसी जैसे कहीं दूर से आ रही हो। "एक दिन की। बस एक दिन।"

मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। काका का चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। उनकी सफ़ेद दाढ़ी काँप रही थी, और उनके हाथ — जो उम्र भर मिट्टी गूंधते रहे थे — आज पहली बार ऐसे काँप रहे थे जैसे उनमें ताकत न बची हो।

"काका?" मैंने कहा।

वो मेरे पास आए। धीरे-धीरे। जैसे हर कदम पर कोई बोझ उठा रहे हों। उन्होंने मेरी मुट्ठी खोली और अंगूठी उठाई। उन्होंने उसे अपनी आँखों के सामने किया, और फिर उनके होंठ काँपे।

"ये वो अंगूठी है," काका ने कहा। उनकी आवाज़ फटी हुई थी, "जो रणवीर सिंह ने तुम्हारी माँ को दी थी। उस रात। जिस रात रघुवीर कुएँ में गिरे थे।"

मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन खिसक गई। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो भी सन्न थी, पर उसकी आँखों में कुछ और था — पहचान। जैसे वो इस अंगूठी को जानती हो।

"ये तो…" मीरा ने धीरे से कहा, और फिर रुक गई।

"क्या?" मैंने पूछा।

"ये तो मेरे पापा की अलमारी में रखी थी," उसने कहा। "मैंने बचपन में देखी है। जब मैं छोटी थी, मैं पापा की अलमारी खोलती थी और ये अंगूठी उठाकर पहनती थी। पापा डाँटते थे — 'इसे मत छुओ, ये किसी और की है।'"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

"मतलब," टिंकू ने कहा — उसकी आवाज़ घबराई हुई थी, "मतलब ये अंगूठी पापा जी ने खुद मिट्टी में दबाई थी?"

कालू काका ने अंगूठी अपनी हथेली पर रखी और उसे देखते रहे। उनकी सफ़ेद दाढ़ी पर एक आँसू टपका और उस पर चमक आई।

"मुझे याद है," काका ने कहा। "रघुवीर के जाने के तीसरे दिन। रात। रणवीर सिंह अखाड़े में अकेले आए थे। मैं उस वक़्त जवान था, पर मिट्टी सींचने का काम मेरा ही था। उन्होंने मुझे देखा और कहा — 'कालू, आज जो देखेगा, वो किसी को नहीं बताएगा।' मैंने सिर हिलाया। वो मैदान के बीच गए, घुटनों के बल बैठे, और मिट्टी खोदने लगे। अपने हाथों से। मैं दूर खड़ा देखता रहा। उन्होंने ये अंगूठी निकाली, एक पीतल का डिब्बा निकाला, और दोनों को उसमें रखकर मिट्टी में दबा दिया।"

"क्यों?" माँ ने पूछा। उनकी आवाज़ में वो काँप था जो सिर्फ़ उस औरत के हो सकता है जिसने बीस साल कुछ ऐसा ढोया हो जो उसने कभी किसी को नहीं बताया।

"क्योंकि वो जानते थे," काका ने कहा, "कि भैरव की नज़र हर चीज़ पर है। अगर अंगूठी उनके पास रहती, तो भैरव को शक होता। और अगर वो तुम्हें लौटाते, तो भैरव को पता चल जाता कि रणवीर सिंह जानते हैं। इसलिए उन्होंने इसे मिट्टी में दबा दिया। मिट्टी में — जहाँ भैरव कभी नहीं ढूँढता। क्योंकि भैरव के लिए मिट्टी सिर्फ़ मिट्टी है।"

मैंने अपनी धोती की तरफ़ देखा। घुटनों पर लाल मिट्टी लगी थी। वही मिट्टी जिसमें बीस साल से ये राज़ दबा था। और मैं — मैं रोज़ उसी मिट्टी पर खड़ा होता था, रोज़ उसे पैरों से गूंधता था, और मुझे कभी पता नहीं चला कि मेरे पैरों के नीचे मेरी माँ की शादी की अंगूठी दबी है।

माँ ने काका की हथेली से अंगूठी उठाई। उन्होंने उसे अपनी आँखों के पास लाया। उनके होठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उन्होंने उसे अपनी छाती से लगा लिया और आँखें बंद कर लीं।

"मैंने सोचा था ये खो गई," उन्होंने फुसफुसाया। "उस रात के बाद मैंने कभी नहीं पूछा। मुझे लगा रघुवीर के साथ ही चली गई।"

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