Spirit of a Fighter137 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 137

6 min read November 5, 2026

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"मीरा…"

"चुप," उसने कहा। "ये मैं तुम्हारे लिए नहीं कर रही। ये मैं उस आवाज़ के लिए कर रही हूँ जो मेरे बचपन में थी। अब चलो। अखाड़े में सब इंतज़ार कर रहे हैं।"

हम अखाड़े पहुँचे। भैरव अब भी वहीं बैठा था। उसके चारों तरफ़ लोग खड़े थे। कोई नहीं बोल रहा था। रणवीर सिंह सामने थे।

मैंने भीड़ को चीरा। मैं मैदान के बीच पहुँचा। वहाँ वो गड्ढा था जो भैरव ने खुदवाया था। मैं उसमें उतरा।

मेरे पैरों के नीचे मिट्टी नरम थी। ऊपर की परत काली, मिलावटी। मैंने हाथ से उसे हटाया। नीचे कुछ और था। लाल। गरम।

मैंने उसे उठाया। मेरी हथेली में लाल मिट्टी थी। असली। जैसी माँ के आँगन में थी। जैसी गुड़िया की थैली में थी।

मैंने उसे सूंघा।

और मेरी आँखें भर आईं।

उसमें वो गंध थी जो मैंने बचपन में सूंघी थी। जब पापा अखाड़े से लौटते थे और मुझे गोद में उठाते थे। उनके कपड़ों से यही गंध आती थी। पसीने की, मिट्टी की, और कुछ और। कुछ ऐसा जो सिर्फ़ मेहनत से आता है।

मैंने मिट्टी को माथे से लगाया।

"ये वही मिट्टी है," मैंने धीरे से कहा। "जिसमें पापा ने पसीना डाला था।"

मेरे आँसू मिट्टी पर गिरे। और मिट्टी ने उन्हें सोख लिया। जैसे वो भूखी थी।

कालू काका मेरे पास आए। उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा।

"मिट्टी झूठ नहीं बोलती, बेटा," उन्होंने कहा। "जो इसमें पसीना डालता है, वो इसे पहचानता है।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"भैरव ने ऊपर की परत उठवा दी," मैंने कहा। "असली मिट्टी नीचे दब गई।"

"हाँ," कालू काका ने कहा। "पर मिट्टी दबकर मरती नहीं। वो इंतज़ार करती है।"

मैं गड्ढे में बैठ गया। मेरे हाथ में लाल मिट्टी थी। मैंने उसे हटाना शुरू किया। हाथ से। धीरे-धीरे। मेरे हाथों में छाले पड़ गए। खून आने लगा। पर मैं रुका नहीं।

मीरा मेरे पास आई। वो मेरे बगल में बैठी। उसने मेरा हाथ पकड़ा।

"रुको," उसने कहा। "मैं पट्टी बाँधती हूँ।"

"नहीं," मैंने कहा। "पहले मिट्टी।"

"बेवकूफ़," उसने कहा। पर उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। कुछ और था। "तुम हर बार घाव पर ही क्यों आते हो?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ मेरे हाथ पर थे। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।

"ताकि तुम हर बार घायल होकर आओ, ये बंद हो," वो बोली।

मैं हँसा। मेरे हाथ जल रहे थे, पर मैं हँस रहा था।

"तुम्हारे हाथों में औषधि की गंध है," मैंने कहा। "माँ ने कहा था।"

"तुम्हारी माँ को सब पता है," उसने कहा। "मुझे लगता है वो मुझसे ज़्यादा जानती हैं।"

उसने मेरे हाथ पर पट्टी बाँधी। उसकी उँगलियाँ नरम थीं, पर पकड़ मज़बूत।

तभी टिंकू आया। उसके हाथ में खीर की हांडी थी। वो गड्ढे के किनारे खड़ा हुआ।

"भाई," उसने कहा। "जीत के बाद तो और खीर बनेगी। पर अभी ये खा लो। तुम्हारे हाथ काँप रहे हैं।"

मैंने हांडी की तरफ़ देखा। फिर टिंकू की तरफ़। फिर मीरा की तरफ़।

और मैं हँस पड़ा।

"तू हर बार खीर लेकर आता है," मैंने कहा। "हर बार।"

"क्योंकि तू हर बार भूखा होता है," टिंकू ने कहा। "अब खा।"

मैंने खीर खाई। मेरे हाथ जले हुए थे, मेरे कपड़े मिट्टी से भरे थे, और मैं अखाड़े के बीच गड्ढे में बैठा था। पर खीर मीठी थी।

कालू काका ने कहा, "अब मैं एक बात बताऊँ।"

सबने उनकी तरफ़ देखा।

"भैरव ने कुएँ की सीढ़ियाँ तुड़वा दी हैं," उन्होंने कहा। "ऊपर से पत्थर रखवा दिए हैं। पर एक और रास्ता है।"

"कहाँ?" मैंने पूछा।

"नीम के पेड़ के नीचे," उन्होंने कहा। "पुराना। बहुत पुराना। मैंने बीस साल पहले देखा था। भैरव वहीं से तहखाने में जाता था।"

मैं उठा। मेरे हाथ में अभी भी मिट्टी थी। मैंने उसे मुट्ठी में भरा। वो गरम थी।

"तो चलो," मैंने कहा।

"रुक," रणवीर सिंह ने कहा। वो गड्ढे के किनारे आए थे। उनकी व्हीलचेयर मिट्टी में धँस रही थी। "पहले ये बता। भैरव का क्या करना है?"

मैंने भैरव की तरफ़ देखा। वो अब भी वहीं बैठा था। अकेला। उसके आदमी भाग गए थे। भीड़ ने उसे घेर लिया था, पर कोई नहीं छू रहा था।

"पुलिस," मैंने कहा। "हरनाम के काग़ज़। तेरी चेन की कड़ी। ग्यारह पहलवानों के नाम। और…"

मैंने अपनी जेब से वो पीतल का डिब्बा निकाला जो मुझे मिट्टी के नीचे से मिला था। मैंने उसे खोला।

उसमें से एक सूखी हुई उँगली की अंगूठी गिरी। छोटी। पुरानी। और उस पर खुदा था — "सरस्वती"।

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

मेरे पीछे किसी ने साँस रोकी।

मैंने पलटकर देखा। माँ दीवार के पास खड़ी थीं। उनके हाथ में रोटी का थाल था। और वो अंगूठी को देख रही थीं।

थाल उनके हाथ से फिसला। ज़मीन पर गिरा। रोटियाँ मिट्टी में लुढ़क गईं।

"ये…" माँ की आवाज़ रुक गई। "ये मेरी अंगूठी है। मेरी शादी की अंगूठी।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा।

"ये मैंने उस दिन पहनी थी," उन्होंने धीरे से कहा। "जिस दिन रघुवीर को कुएँ में धकेला गया था। और फिर ये गायब हो गई। मैंने सोचा कि कहीं गिर गई।"

वो मेरे पास आईं। धीरे-धीरे। उन्होंने अंगूठी उठाई। उनके हाथ काँप रहे थे।

"ये अंगूठी रघुवीर की उँगली में थी," उन्होंने कहा। "उस रात। जब वो कुएँ में गए।"

मैंने पीतल का डिब्बा देखा। उस पर खुदा था — "रणवीर"।

मैंने माँ की तरफ़ देखा। फिर रणवीर सिंह की तरफ़।

"ये डिब्बा रणवीर सिंह के नाम का है," मैंने कहा। "और इसमें मेरी माँ की अंगूठी है।"

रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।

"मैंने ये डिब्बा कभी नहीं देखा," उन्होंने धीरे से कहा। "पर मैं जानता हूँ ये किसका है।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"ये डिब्बा भैरव के पिता का था," उन्होंने कहा। "बलवंत सिंह का। और अगर इसमें सरस्वती की अंगूठी है…"

वो रुके। उनका सीना ऊपर-नीचे हो रहा था।

"…तो मतलब बलवंत सिंह उस रात कुएँ पर था।"

मैंने भैरव की तरफ़ देखा। वो अब भी वहीं बैठा था। पर उसकी आँखें माँ पर थीं। और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं देखा था। पहचान।

"तू," माँ ने धीरे से कहा। उनकी आवाज़ में वो दर्द था जो बीस साल से दबा था। "तू उस रात कुएँ पर था। तूने मेरी अंगूठी क्यों निकाली?"

भैरव ने उनकी तरफ़ देखा। देर तक।

"मेरे पिता ने निकाली थी," उसने कहा।

माँ ने एक कदम आगे बढ़ाया। उनकी चप्पल मिट्टी में धँस गई, पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया।

"तेरे पिता ने निकाली थी," उन्होंने भैरव की बात दोहराई, जैसे उसे अपनी ज़ुबान से सुनकर यक़ीन करना चाहती हों। "मतलब वो वहाँ था। मेरे रघुवीर के साथ। उस रात।"

भैरव ने नज़र नहीं चुराई। उसकी आवाज़ अब भी वही ठंडी थी, पर उसमें एक दरार आ गई थी।

"मेरे पिता उस रात कुएँ पर गए थे," उसने धीरे से कहा, "क्योंकि तुम्हारे पति ने उन्हें बुलाया था।"

सन्नाटा। इतना गहरा कि मुझे अपनी साँस की आवाज़ सुनाई दी।

"रघुवीर ने मेरे पिता को बुलाया था," भैरव ने कहा। "कहा था — अखाड़े की ज़मीन के काग़ज़ हैं। आधी तुम्हारी, आधी मेरी। आधी रात मिलो।"

माँ की आँखें बड़ी हो गईं। "झूठ। मेरे रघुवीर ने कभी…"

"मेरे पिता ने काग़ज़ निकाले," भैरव ने काटा। "और तुम्हारे पति ने उन्हें कुएँ में धकेल दिया। पानी में। मेरे पिता तैरकर बाहर आए—"

"तो फिर मेरे पति कुएँ में कैसे गए?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ खुद मेरे कानों में अजनबी लगी।

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