Spirit of a Fighter – Chapter 136
भैरव ने एक और कोशिश की। वो भीड़ की तरफ़ भागा। पर भीड़ ने रास्ता नहीं दिया। लोग खड़े रहे। कोई नहीं हिला। कोई नहीं बचाया।
और फिर वो रुक गया। हाँफते हुए। उसने अपनी धोती की तरफ़ देखा। लाल मिट्टी वाली धोती। उसने उसे छुआ, जैसे किसी पुरानी चीज़ को छू रहा हो।
"बीस साल," उसने धीरे से कहा। खुद से। किसी और से नहीं। "मैंने बीस साल इस मिट्टी में ज़हर घोला। और ये मिट्टी मुझे कभी नहीं बोली।"
वो मुड़ा। रणवीर सिंह की तरफ़। और उसकी आँखों में पानी था। असली पानी।
"तूने मेरे पिता को हराया था," उसने कहा। "पर उससे पहले तूने उनसे क्या छीना, वो मुझे कोई नहीं बताता।"
रणवीर सिंह ने उसकी तरफ़ देखा। देर तक।
"मैंने तेरे पिता से कुछ नहीं छीना," उन्होंने कहा। "तेरे पिता ने खुद को हराया। उन्होंने कुश्ती में हार नहीं मानी थी। वो जीत रहे थे। पहला दाँव उनका था। दूसरा मेरा। तीसरे में…"
वो रुके।
"तीसरे में वो अचानक कमज़ोर पड़ गए," रणवीर सिंह ने कहा। "जैसे किसी ने उनका दम निकाल लिया हो। उन्होंने मुझे गिराया, पर खुद भी गिरे। और फिर उठ नहीं पाए।"
भैरव के चेहरे का रंग उड़ गया।
"तू झूठ बोल रहा है," उसने कहा। पर आवाज़ फुसफुसाहट थी।
"मैं झूठ क्यों बोलूँगा?" रणवीर सिंह ने कहा। "मैं तो व्हीलचेयर पर हूँ। मेरे पास कुछ नहीं बचा। सिवाय सच के।"
भैरव ने अपना सिर पकड़ लिया। वो झुक गया। उसके घुटने ज़मीन पर टिके। लाल मिट्टी में। और वो वहीं बैठ गया।
भीड़ में से कोई नहीं बोला।
मैं उसके पास गया। मेरी छाया उस पर पड़ी। वो ऊपर देखने नहीं आया।
"तेरे पिता ने खुद को मारा," मैंने कहा। "तूने नहीं मारा। पर तूने यहाँ जो किया — ग्यारह पहलवान, मेरे दोनों पापा, रणवीर सिंह के पैर — वो तेरे पिता के नाम पर नहीं हुआ। वो तेरे नाम पर हुआ।"
वो ऊपर देखा। उसकी आँखों में पानी था।
"तू क्या जाने," उसने कहा। "तू तो बाहर वाला है।"
मैं झुका। उसके सामने बैठा। मेरे घुटने भी लाल मिट्टी में धँसे।
"मैं बाहर वाला नहीं हूँ," मैंने कहा। "मैं रघुवीर का बेटा हूँ। और मेरे पापा ने इस मिट्टी में पसीना डाला। मैं भी डालूँगा। तूने जो बोया, वो काटेगा भी।"
वो हँसा। एक टूटी हुई हँसी। फिर वो ज़मीन पर गिर गया। पूरी तरह।
मैं उठा। मीरा मेरे पास आई। उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ काँप रही थी, पर छोड़ नहीं रही थी।
गाँव की तरफ़ से धुआँ कम हो गया था। पर मेरा दिल अभी भी धक-धक कर रहा था।
"माँ," मैंने कहा।
मीरा ने सिर हिलाया। "जाओ। मैं यहाँ सब सँभाल लूँगी। ये अब भाग नहीं सकता।"
मैंने उसका हाथ छोड़ा। फिर भागा।
रास्ते में गुड़िया मिली। वो रो रही थी। मेरा दिल रुक गया।
"गुड़िया!"
"भैया!" वो मेरी तरफ़ दौड़ी। "माँ… माँ…"
मैंने उसका कंधा पकड़ा। "क्या हुआ? बोल!"
"माँ ठीक है," उसने हाँफते हुए कहा। "पर… पर चक्की जल गई। पूरी जल गई। कालू काका की झोपड़ी भी। आग चक्की से लगी थी। माँ चक्की पर सोई थी, भैया। भैरव ने चक्की जलाई, ताकि माँ…"
वो रो पड़ी।
मैं दौड़ा। मेरे पैर ज़मीन पर नहीं लग रहे थे। घर का आँगन आया। चक्की की जगह एक काला धब्बा था। जली हुई लकड़ी की गंध हवा में भरी थी।
और माँ वहीं थीं।
चक्की के काले धब्बे के पास बैठी। उनके हाथ जले हुए थे। धोती पर कालिख थी। पर वो ज़िंदा थीं। वो ज़िंदा थीं।
मैं उनके पास गिरा। मेरे घुटने ज़मीन पर टिके।
"माँ!"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें धुँधली थीं। पर उनमें वो चमक अब भी थी।
"चक्की गई," उन्होंने धीरे से कहा। जैसे कोई चीज़ टूटने का अफ़सोस हो। "पचास साल की।"
मैंने उनके जले हाथ थामे। मेरे हाथ काँप रहे थे।
"तुम ठीक हो," मैंने कहा। "चक्की आ जाएगी।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और मुस्कुराईं। वो मुस्कान जो भूखे पेट की दुआ जैसी थी।
"चक्की नहीं आएगी," उन्होंने कहा। "पर तू आ गया। बस।"
गुड़िया आई। टिंकू आया। वो सब मेरे पीछे खड़े थे। माँ ने उन सबको देखा। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"भैरव?" उन्होंने पूछा।
"गिर गया," मैंने कहा। "अखाड़े में। सबके सामने।"
उन्होंने आँखें बंद कीं। देर तक बंद रखीं। फिर खोलीं।
"तेरे पापा की आत्मा को आज चैन मिला होगा," उन्होंने कहा। "पर मुझे नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैं चक्की पर बैठी थी," उन्होंने कहा। "और मैं सोच रही थी कि तू कहाँ है। मैं अपने बेटे की लड़ाई में साथ नहीं थी। मैं यहाँ चक्की चला रही थी।"
मेरा गला भर आया।
"तुम यहीं थीं," मैंने कहा। "तुम हर पल साथ थीं। तुमने मुझे मिट्टी दी। तुमने मुझे धोती दी। तुमने मुझे…"
वो रुकीं। फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनके हाथ जले हुए थे, पर पकड़ मज़बूत थी।
"एक काम कर," उन्होंने कहा। "रोटी बना। आज सब भूखे हैं।"
मैं हँसा। रोते हुए हँसा। गुड़िया भी हँसी। टिंकू ने अपनी आँखें पोंछीं और कहा, "मैं खीर लाता हूँ।"
"नहीं," माँ ने कहा। बहुत साफ़ आवाज़ में। "आज रोटी। हमारे हाथ की। और…" उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा। "…उस लड़की को भी बुला। जिसके हाथों में औषधि की गंध है।"
मीरा।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो मुस्कुराया। और भाग गया।
मैं वहीं बैठा रहा। माँ के पास। जले हुए चक्की के पास। और मेरी नाक में वो गंध आई — जली लकड़ी की, धुएँ की, और नीचे से कुछ और। मिट्टी की गंध। गरम मिट्टी। जैसे किसी ने अभी-अभी उसे हाथ से उठाया हो।
मैंने माँ की तरफ़ देखा।
"माँ," मैंने कहा। "भैरव ने कहा कि तुमने खुद हार का काग़ज़ लिखा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा। शर्म।
"मैंने लिखा था," उन्होंने कहा। "कल रात।"
मेरा दिल रुक गया।
"क्या?"
"वो काग़ज़ उसने मुझे दिखाया था," उन्होंने धीरे से कहा। "जब वो गुड़िया के हाथ जलाने की बात कर रहा था। उसने कहा — या तो तू ये लिख, या गुड़िया की उँगलियाँ। मैंने लिख दिया। पर…"
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।
"…पर मैंने नीचे तारीख़ नहीं लगाई," उन्होंने कहा। "और नीचे एक लाइन लिखी — 'जो इसे पढ़े, वो जाने कि ये डर से लिखी गई है।' भैरव ने वो लाइन नहीं देखी। उसने सिर्फ़ ऊपर देखा।"
मैं हँसा। ज़ोर से। मेरी आँखों से पानी बह रहा था। और मैं हँस रहा था।
"तुमने उसे धोखा दिया," मैंने कहा। "बीस साल बाद भी।"
उन्होंने मुस्कुराया। वही मुस्कान।
"मैं तेरे पापा की औरत हूँ," उन्होंने कहा। "मैं डरती हूँ। पर हार नहीं मानती।"
वो उठीं। मुश्किल से। उनके हाथ जले हुए थे, पर उन्होंने मुझे ऊपर खींचा।
"अब जा," उन्होंने कहा। "अखाड़ा सँभाल। मैं रोटी बनाती हूँ।"
मैं अखाड़े की तरफ़ चला। रास्ते में मीरा मिली। वो भागती हुई आ रही थी। उसके हाथ में एक छोटी सी पुड़िया थी।
"माँ कैसी हैं?" उसने पूछा।
"ठीक हैं," मैंने कहा। "चक्की जल गई।"
वो रुकी। उसकी आँखें भर आईं।
"मैं जानती हूँ ये चक्की आंटी के लिए क्या थी," उसने कहा। "मैं सुनती थी। रात को। जब मैं छोटी थी और पिता के साथ यहाँ आती थी। सुबह चार बजे चक्की की आवाज़ आती थी। वो आवाज़ मुझे नींद से जगाती थी।"
"अब नहीं आएगी," मैंने कहा।
"आएगी," उसने कहा। "मैं नई चक्की लाऊँगी। मेरे पास पैसे हैं। मैंने जोड़े हैं।"
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