Spirit of a Fighter – Chapter 133
"मेरे पापा कहते हैं," उसने कहा। "शहर में रहकर भी गाँव की मिट्टी पैरों से नहीं उतरती।"
माँ ने उसका हाथ थाम लिया। "अब तू ये चक्की मत चलाना," मीरा ने कहा। "इस दवा के बाद दो दिन आराम। नहीं तो ज़हर का असर दिल तक पहुँच जाएगा।"
माँ मुस्कुराईं। वो मुस्कान थकी थी, पर मुस्कान थी।
"चक्की नहीं चलेगी तो घर कैसे चलेगा, बेटी?"
"अब मैं चलाऊँगा।"
सब मेरी तरफ़ देखने लगे। मैंने माँ के पैरों के पास बैठकर कहा, "कल सुबह से। जब तक ये हाथ हैं, चक्की नहीं रुकेगी। आप बस आराम कीजिए।"
माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखा। उनकी हथेली ठंडी थी, पर उसमें वो ताकत थी जो चूल्हे की आग में भी नहीं थी।
"तेरे पापा भी ऐसे ही बोलते थे," उन्होंने धीरे से कहा। "कि 'माँ, अब तुम चक्की मत चलाना।' पर वो जब तक रहे, मैंने चक्की नहीं छोड़ी। और अब…" उनकी आवाज़ रुकी। "अब तू है।"
गुड़िया चारपाई के पास बैठी थी। उसने अपनी फटी कॉपी निकाली और उसमें कुछ लिखने लगी।
"क्या लिख रही है?" मैंने पूछा।
"तारीख़," उसने कहा, बिना ऊपर देखे। "आज की तारीख़। जिस दिन भैया ने कहा कि अब मैं चक्की चलाऊँगा।" उसने पेंसिल रोकी। "और कल की भी जगह छोड़ रही हूँ। क्योंकि कल कुछ बड़ा होगा।"
टिंकू दरवाज़े के पास खड़ा था। वो चुपचाप सब देख रहा था। फिर वो बोला, "भाई, एक बात कहूँ?"
"कह।"
"मैंने आज दुकान बंद कर दी है। कल भी बंद रहेगी।" उसने अपनी टोपी उतारी और हाथ में ली। "मेरी मिठाई अब तक सिर्फ़ बिकती थी। कल से वो लड़ेगी भी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ काँप रहे थे, पर उसकी आवाज़ नहीं।
"टिंकू," मैंने कहा। "तू रसोइया है। तेरा काम मिठाई बनाना है।"
"और तेरा काम पहलवानी है," उसने पलटकर कहा। "पर तू खीर खाता है मेरी। तो हिसाब बराबर है।"
हँसी छूट गई। माँ भी हँसीं। उनकी हँसी में खाँसी मिली, पर हँसी थी।
मीरा ने अपना बैग बंद किया और मेरी तरफ़ देखा।
"वो काग़ज़," उसने कहा। "जो तुम्हें मिला था। सरस्वती आंटी के हाथ वाला। वो मेरे पापा को दिखाना होगा।"
"कल सुबह दिखाऊँगा।"
"नहीं।" उसने सिर हिलाया। "पापा को अभी पता चलना चाहिए। अगर वो कल सुबह अखाड़े के दरवाज़े पर खड़े होंगे, तो उन्हें पता होना चाहिए कि सामने क्या है।" उसने अपना मोबाइल निकाला। "मैं उन्हें मैसेज करती हूँ।"
वो आँगन के कोने में चली गई। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर मैं सुन सकता था।
"पापा… हाँ, मैं ठीक हूँ… नहीं, अभी नहीं बता सकती… कल सुबह आप अखाड़े के मुख्य दरवाज़ा पर आइए। सबके सामने। हाँ, सबके सामने… पापा, एक बात और — वो कड़ी मिल गई। आपकी चेन की कड़ी।"
उसकी आवाज़ रुकी। फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोली, "पापा, रोइए मत। प्लीज।"
उसने मोबाइल बंद किया और मेरी तरफ़ पलटी। उसकी आँखें लाल थीं, पर उसने मुँह पर हाथ नहीं रखा। वो मेरे सामने खड़ी रही, सीधी।
"पापा कह रहे हैं," उसने कहा, "कि कल सुबह नौ बजे वो अखाड़े के दरवाज़े पर होंगे। और उन्होंने कहा है —" उसकी आवाज़ भारी हुई। "उन्होंने कहा है कि वो खुद बोलेंगे। जो बीस साल से नहीं बोला, वो कल सबके सामने बोलेंगे।"
माँ चारपाई पर उठ बैठीं। मीरा दौड़कर उनके पास गई।
"आंटी, आपको उठना नहीं था—"
"बैठना तो पड़ेगा," माँ ने कहा। "अगर कल रणवीर सिंह खुद उठकर बोलेंगे, तो मैं चारपाई पर पड़ी कैसे रह सकती हूँ?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चमक लौट आई थी जो कल तक बुझ गई थी।
"वीर," उन्होंने कहा। "अब सुन।"
"हाँ, माँ।"
"कल सुबह तू अखाड़े जाएगा। पर अकेला नहीं।" उन्होंने मीरा का हाथ पकड़ा। "ये लड़की तेरे साथ जाएगी।"
"माँ, वहाँ ख़तरा है—"
"मुझे पता है।" उन्होंने मेरी बात काटी। "और इसीलिए जाएगी। तू जब मिट्टी में उतरेगा, तो ये बाहर खड़ी रहेगी। तेरे पीछे। जैसे मैं तेरे पापा के पीछे खड़ी रहती थी।" उनकी आवाज़ भर आई। "और अगर तू गिरे, तो ये उठाएगी। अकेले कोई नहीं गिरता, वीर। गिरता है तो वही, जिसके पीछे कोई खड़ा न हो।"
मीरा ने माँ का हाथ कसकर पकड़ा। उसने कुछ नहीं कहा, पर उसकी आँखों में जवाब था।
टिंकू ने आँगन में एक बड़ी सी थाली रखी। उसमें गुड़ की रोटियाँ थीं, और एक छोटी कटोरी में खीर।
"आज साथ खाएँगे," उसने कहा। "चारों जने। और आंटी भी।"
उसने सबको रोटी बाँटी। माँ के हाथ में रोटी रखते वक़्त उसके हाथ काँपे।
"आंटी," उसकी आवाज़ भर आई। "मेरी माँ कहती है कि मैं ज़िंदगी में कुछ नहीं करूँगा। सिर्फ़ मिठाई बनाता रहूँगा।" उसने रोटी की तरफ़ देखा। "कल मैं उसे दिखाऊँगा कि मिठाई बनाने वाला भी अखाड़े में खड़ा हो सकता है।"
माँ ने उसका सिर सहलाया। "तेरी मिठाई खाऊँगी," उन्होंने कहा। "कल। अखाड़े में। जब सब ख़त्म हो जाएगा।"
टिंकू की आँखों में पानी आ गया। उसने जल्दी से मुँह फेरा और रोटी खाने लगा।
खाना खत्म हुआ। रात गहरी हो रही थी। टिंकू और गुड़िया आँगन में चटाई पर सो गए। मीरा माँ के पास बैठी रही, कभी उनका माथा सहलाती, कभी दवा का हिसाब लिखती।
मैं दरवाज़े पर बैठा था। बाहर आसमान में तारे थे — इतने साफ़ जैसे किसी ने हाथ से बिछा दिए हों।
मीरा आई और मेरे पास बैठ गई। उसने घुटनों को पकड़ लिया।
"डर लग रहा है?" उसने पूछा।
"नहीं।"
वो मुस्कुराई। "झूठ अच्छा नहीं बोलते तुम।"
"डर लग रहा है," मैंने कहा। "पर उस डर से नहीं जो कल होगा। उस डर से जो कल के बाद होगा।"
"कल के बाद?"
"अगर जीत गया, तो सब बदल जाएगा। माँ को चक्की नहीं चलानी पड़ेगी। गुड़िया को फटी कॉपी पर लिखना नहीं पड़ेगा। और तू…" मैं रुका।
"मैं?"
"तू शहर लौट जाएगी। तेरी पढ़ाई है। तेरे पापा हैं।"
वो कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "तुम मुझे बहुत हल्का समझते हो, वीर सिंह।"
"मैंने कहा—"
"तुमने कहा कि मैं शहर लौट जाऊँगी। तुमने मुझसे पूछा नहीं।" उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो पहली बार अखाड़े में मिली थी। "मैं वहीं रहूँगी जहाँ मेरा मन होगा। और मेरा मन अभी यहीं है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। चाँदनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसके बाल छोटे थे, पर एक लट माथे पर आ गई थी।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा।
"हाँ।"
"वो घड़ी। तेरे पापा की टूटी घड़ी। मैंने कहा था — सच खुलने पर चलती हुई लौटाऊँगा।"
"हाँ।"
"कल सच खुलेगा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें चमक रही थीं।
"तो कल ये भी खुलेगा कि घड़ी चलेगी या नहीं," उसने कहा। "पर एक बात कहूँ?"
"कह।"
"घड़ी चले या न चले, मुझे फर्क नहीं पड़ता।" उसने अपना हाथ मेरे हाथ के पास रखा, पर छुआ नहीं। "फर्क इस बात से पड़ता है कि कल तुम अखाड़े में खड़े रहोगे या नहीं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और मेरे मुँह से वो निकला जो मैंने कभी किसी से नहीं कहा था।
"मीरा, तू मेरी ज़िंदगी में आई, तो मुझे लगा मैं भाग्यशाली हूँ। पर अब लगता है — भाग्यशाली वो नहीं जो पा लेता है। भाग्यशाली वो है जो पाने के बाद भी उसे खोने से डरता है।" मैंने अपनी मुट्ठी देखी। "और मैं डरता हूँ।"
उसने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया। ठंडा हाथ, गरम हाथ।
"अच्छा है," उसने कहा। "डरने वाला ही लड़ता है। बेखौफ़ तो सिर्फ़ मूर्ख होता है।"
रात खत्म हो रही थी। आसमान के किनारे पर हल्की सी लाली आ रही थी।
दरवाज़े पर खटखट हुई।
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