Spirit of a Fighter – Chapter 132
"तुम्हारा नाम?"
"किसान कह ले। बस किसान।" उसने लाठी पर झुककर साँस ली। "तेरे पापा ने मुझे कुएँ से निकाला था। रस्सी बाँधकर। और बदले में कुछ नहीं माँगा। मैंने पूछा तो बोले — 'किसान, तू मेरे लड़के को देखना। जिस दिन वो अखाड़े का दरवाज़ा छुए, तू उसे सच बता देना।'"
"मैंने छुआ," मैंने कहा। "पर तुम नहीं आए।"
"मैं आया था।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तीसरे दिन। तू चक्की पर बैठा था। मैं दरवाज़े से तुझे देख रहा था। और तभी भैरव का आदमी गली में आ गया। मैं लौट गया।" वो चुप हुआ। "बीस साल में मैं एक बार भी तेरे पास नहीं आया। तेरे पापा का कर्ज़ चुकाने से डरता रहा।"
"आज क्यों नहीं डरे?"
"क्योंकि आज सुबह मैंने गुड़िया को दौड़ते देखा।" उसकी आँखें छोटी हो गईं। "बच्ची रो रही थी और भाग रही थी। और मुझे याद आया — तेरे पापा ने किसी बच्ची के लिए नहीं कहा था। तेरे लिए कहा था। पर बच्ची भी तेरी है। मतलब मेरा कर्ज़ दो गुना है।"
गुड़िया ने दरवाज़े से सिर निकाला। उसके गाल पर सूखे आँसू की लकीर थी।
"भैया," उसने धीरे से कहा। "किसान काका कह रहे हैं न, वो सच बोल रहे हैं। मैंने इन्हें सुबह गली के मोड़ पर देखा था। ये वहीं खड़े थे।"
किसान ने गुड़िया की तरफ़ देखा और उसकी आँखों में कुछ पिघला।
"बच्ची," उसने कहा। "तेरे भैया को मैं रास्ता दिखाऊँगा। पर एक बात पहले।" वो मेरी तरफ़ पलटा। "तहखाने में मिट्टी नहीं है।"
"क्या?"
"भैरव ने तुझे उस काग़ज़ से फँसाया है। तहखाने में जो है, वो मिट्टी नहीं — बीस साल से जमा सबूत है। काग़ज़ात। नाम। गवाहियाँ। उसने तेरे पापा को मारा नहीं था। उसने उन्हें खरीदने की कोशिश की, और जब वो नहीं बिके, तो उनका नाम कुएँ में डाल दिया।"
मेरे हाथ की मुट्ठी खुल गई। अँगूठी उँगली से फिसलकर हथेली में आ गई।
"तो पापा…"
"तेरे पापा ने खुद कुएँ में छलाँग लगाई थी," किसान ने कहा। "उस रात भैरव के आदमी घर के बाहर खड़े थे। तेरे पापा जानते थे — अगर वो पकड़े गए, तो सबूत भी जाएँगे और परिवार भी। तो उन्होंने सबूत पहले कुएँ में छिपाए। और फिर खुद गए।" उसने लाठी को दोनों हाथों से पकड़ा। "कुएँ का पानी ठंडा था। मैंने उन्हें बचाने की कोशिश की। पर वो डूबते हुए भी मुस्कुरा रहे थे। जैसे जीत गए हों।"
मेरे पैर काँपे। मैं दीवार का सहारा लेकर बैठ गया।
सरस्वती चारपाई पर करवट बदल रही थीं। उनकी आँखें खुलने लगी थीं।
"वीर…" उनकी आवाज़ सूखी थी।
मैं उनके पास गया। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"वो बुढ़िया…" उन्होंने धीरे से कहा। "वो आई थी। कह रही थी — 'भैरव सर ने भेजा है। बीस साल पुराना हिसाब।' मैंने उसे चाय दी। वो हँसी। और फिर…"
"माँ, आप आराम करो।"
"नहीं।" उन्होंने मेरा हाथ कसा। "सुन। उस बुढ़िया के हाथ में वो अँगूठी थी। साँप वाली। मैंने उसे देखा था। बीस साल पहले। तेरे पापा के हाथ में।" उनकी आँखों में पानी आ गया। "वो बुढ़िया कौन है, वीर? वो अँगूठी क्यों पहनती है?"
किसान ने पीछे से कहा, "क्योंकि वो भैरव की माँ है।"
सन्नाटा।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। गुड़िया ने।
"उसकी… माँ?" मैंने कहा।
"बीस साल से वो अखाड़े की रसोई में है," किसान ने कहा। "कोई उसे नहीं पहचानता। भैरव भी नहीं। पर वो सब जानती है। और आज उसने खुद आकर तेरी माँ को छुआ।" उसकी आवाज़ भारी हो गई। "इसका मतलब है, वो भैरव के ख़िलाफ़ खड़ी हो गई है।"
गुड़िया चारपाई के पास आई। उसने माँ का हाथ पकड़ा। और फिर मेरी तरफ़ देखा, और वो बात कही जो उसने अब तक छिपाई थी।
"भैया," उसकी आवाज़ काँपी। "वो बुढ़िया जाते वक़्त रुकी थी। दरवाज़े पर। उसने पलटकर मेरी तरफ़ देखा था। और बोली थी — 'तेरे भैया को बोल देना, उसकी माँ का हिसाब बाकी है।'"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनकी आँखों से आँसू चुपचाप बह रहे थे। और उनके होंठ हिले।
"हिसाब," उन्होंने फुसफुसाया। "बीस साल का हिसाब।"
मैंने अँगूठी मुट्ठी में कसी। साँप का निशान हथेली में चुभा।
"किसान," मैंने कहा। "मुझे रास्ता दिखाओ।"
"अभी नहीं," उसने कहा। "पहले एक बात साफ़ कर ले।
॥
किसान ने लाठी ज़मीन पर टिकाई और मेरी तरफ़ देखा।
"पहले ये बता," उसने कहा। "तेरे पास क्या है? सिर्फ़ गुस्सा है, या कुछ और भी?"
मैंने जेब से वो सोने की कड़ी निकाली और उसकी हथेली पर रख दी। किसान ने उसे उँगलियों में उठाया। चूल्हे की रोशनी में कड़ी चमकी।
"ये तो…" उसकी आवाज़ भारी हो गई। "ये तो रणवीर की चेन की कड़ी है।"
"आप जानते हैं?"
"मैंने ये चेन बीस साल पहले रणवीर के गले में देखी थी। उस दिन जब वो आख़िरी बार अखाड़े में उतरे थे।" उसने कड़ी को करीब लाकर देखा। "ये कहाँ मिली?"
"अखाड़े की मिट्टी में। भैरव की चेन के पास।"
किसान ने कड़ी वापस मेरी हथेली पर रख दी और अपनी आँखें मूँद लीं। कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, "तो रणवीर की हार झूठी थी। उस दिन उसकी चेन टूटी थी — मैंने सोचा था, धक्के से टूटी होगी। पर अगर वो कड़ी भैरव की चेन के साथ मिली है, तो मतलब उस दिन अखाड़े में हाथापाई सिर्फ़ कुश्ती नहीं थी।"
माँ ने करवट ली। उनकी आवाज़ अब थोड़ी साफ़ थी।
"किसान," उन्होंने कहा। "तू अब भी वही है। बीस साल बाद भी।"
किसान हँसा। हँसी में कुछ कड़वाहट थी।
"सरस्वती, मैंने तुझे उस दिन कहा था — रघुवीर को रोक। मैंने कहा था, भैरव से उलझना ठीक नहीं। पर तेरा आदमी सुनता कहाँ था।" उसने लाठी उठाई। "वो बोला था — 'अगर सच के लिए मरना पड़े, तो मरेंगे। पर झुकेंगे नहीं।'"
माँ की आँखों से एक आँसू बहा जो उन्होंने जल्दी से पोंछ दिया।
"तो अब बता," किसान ने मेरी तरफ़ देखा। "तेरा प्लान क्या है?"
"कल सुबह अखाड़े जाऊँगा। सबके सामने।"
"और भैरव?"
"भैरव के सामने भी।"
किसान ने सिर हिलाया। "वो तुझे पहले ही तीन दिन की धमकी दे चुका है। तू अगर एक दिन में पहुँचेगा, तो वो सोचेगा तू डर गया और जल्दी में है।"
"तो सोचे।" मैंने अँगूठी मुट्ठी में कसी। "मैं उसके हिसाब से नहीं चलूँगा अब।"
किसान कुछ देर मुझे देखता रहा। फिर उसने अपनी लाठी उठाई और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
"सुबह मैं अखाड़े के पीछे वाले नीम के नीचे मिलूँगा," उसने कहा। "उस रास्ते से हम अंदर जाएँगे। पर वीर —" वो रुका। "अंदर जाना आसान है। बाहर निकलना मुश्किल। सोच ले।"
"सोच लिया।"
वो चला गया। दरवाज़ा बंद हुआ तो आँगन में सिर्फ़ चूल्हे की आग बची थी।
मीरा ने अपना बैग खोला। उसमें से छोटी-छोटी शीशियाँ निकालीं — कुछ में पाउडर, कुछ में पत्तियाँ। उसने एक कटोरी में पानी लिया और उसमें कुछ मिलाया।
"आंटी," वो चारपाई के पास बैठ गई। "ये पी लीजिए। धतूरे का असर उतर जाएगा।"
माँ ने कटोरी देखी। फिर मीरा को देखा।
"तू वही लड़की है ना?" माँ ने कहा। "जिसकी घड़ी वीर रखता है?"
मीरा के हाथ रुक गए। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा, बस कटोरी माँ के होंठों तक बढ़ा दी।
"हाँ," वो बोली। "वही हूँ।"
माँ ने दवा पी। फिर उन्होंने कटोरी मीरा के हाथ से ली और पास रख दी। उनकी उँगलियों ने मीरा की कलाई छुई।
"तेरे हाथों में औषधि की गंध है," माँ ने कहा। "और मेहनत की भी। तू शहर की लड़की लगती नहीं।"
मीरा हँसी। पहली बार उसके चेहरे पर वो हँसी आई जो मैंने पहले नहीं देखी थी।
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