Spirit of a Fighter – Chapter 131
मेरी नाक में उस वक़्त कुछ नहीं आ रहा था। बस माँ की चाय की कड़वाहट। पर मैंने सीना तान लिया।
"माँ," मैंने कहा। "मैं कल रात तहखाने जाऊँगा।"
वो चुप रहीं।
"कालू काका साथ चलेंगे," मैंने कहा। "मीरा और टिंकू भी।"
"और मैं?"
"तुम यहाँ रहोगी।"
"नहीं।" उन्होंने सिर हिलाया। "मैं चलूँगी।"
"माँ—"
"वीर।" उनकी आवाज़ में वो सख़्ती लौट आई थी जो चक्की की आवाज़ से भी पुरानी है। "जिस मिट्टी में तेरे पापा ने पसीना डाला, उसे ज़हर से बचाने के लिए मैं भी जाऊँगी। मैं वहाँ बैठूँगी। और अगर भैरव आया, तो उसे मेरे चेहरे से पहले गुज़रना पड़ेगा।"
"तुम बीमार हो।"
"मैं माँ हूँ," उन्होंने कहा। "बीमार होना मेरी मर्ज़ी नहीं थी। पर बेटे के साथ खड़ा होना मेरी मर्ज़ी है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने कंधे उचकाए। जैसे कह रही हो — मैं तुम्हारी माँ से नहीं जीत सकती।
दिन ऐसे बीता जैसे सब कुछ रुका हुआ हो।
माँ चारपाई पर लेटी रहीं। मीरा ने उन्हें पुड़िया दी — थोड़ी-थोड़ी देर में। गुड़िया ने उनके पैर दबाए। टिंकू दुकान बंद करके आ गया और दिन भर दरवाज़े पर बैठा रहा।
और मैं?
मैं आँगन में बैठा रहा। चक्की के टूटे हत्थे को हाथ में लेकर। लकड़ी अब भी माँ के हाथों की गर्मी जैसी लग रही थी।
दोपहर को कालू काका आए। उन्होंने माँ को देखा। फिर मुझे अलग बुलाया।
"आज रात?" उन्होंने पूछा।
"हाँ।"
"मैं तुम्हें नीम के पास से रास्ता दिखाऊँगा," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी। "पर एक बात याद रखना — अंदर जाते वक़्त कोई चीज़ मत छूना। जो मिले, वो मुझे देना। उस मिट्टी में बीस साल की साँस है।"
"क्या मिलेगा?"
"वही जो भैरव ने बोया है," उन्होंने कहा। "पर तुम उसे खोदने से पहले जान लेना — उस मिट्टी में दो तरह की ताकत है। एक जो ज़हर से आई है। और एक जो पसीने से। तुम्हें पता होना चाहिए कौन सी किसकी है।"
"कैसे पता करूँ?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी सफ़ेद दाढ़ी में वो हल्की मुस्कान आई जो सिर्फ़ बूढ़े लोगों की आँखों में होती है।
"तेरी नाक को पता है," उन्होंने कहा। "बस उसे बताना — सही वक़्त पर।"
शाम को मीरा घर गई। जाते वक़्त उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। पर उनमें दम था।
"रात को देखते हैं," उसने कहा।
"देखते हैं।"
वो गई। और मैं आँगन में खड़ा रहा।
तभी गुड़िया ने मेरी कमीज़ खींची।
वो मेरे पीछे खड़ी थी। उसके हाथ में कुछ था। लाल मिट्टी की थैली — वही जो उसने हमेशा मेरे लिए भरी थी। पर इस बार उसमें कुछ और था।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
वो थैली मेरी तरफ़ बढ़ाई। "आज सुबह अखाड़े के बाहर से लाई," वो बोली। "मैं स्कूल जाते वक़्त गई थी। मैंने सोचा — भैया को मिट्टी चाहिए।"
"गुड़िया, अभी अखाड़ा बंद—"
"पर मैंने दीवार के छेद से देखा," उसने कहा। "और वहाँ कुछ गड़ा हुआ था। मैंने निकाला।"
मैंने थैली खोली।
उसमें लाल मिट्टी थी — पर वो सूखी नहीं थी। वो अब भी गीली थी। और उसमें एक छोटी, चमकती चीज़ दबी थी।
मैंने उसे निकाला।
एक सोने की अँगूठी। बड़ी। मोटी। ऊपर साँप का निशान।
भैरव की अँगूठी।
मैंने उसे पलटा। अंदर की तरफ़ कुछ खुदा था। मैंने पास लाकर देखा।
"भवानी सिंह।"
मेरी साँस रुक गई।
वो नाम। वही नाम जो पीले लिफ़ाफ़े में था। जो रघुवीर ने लिखा था। भैरव का असली नाम।
मैंने अँगूठी मुट्ठी में कसी। और मुँह फेरकर गुड़िया की तरफ़ देखा।
"तूने ये कहाँ से निकाला?"
"अखाड़े के पीछे," उसने कहा। "जहाँ नीम है। वहाँ की मिट्टी में। जैसे किसी ने उसे जल्दी में गाड़ दिया हो।"
मैंने अँगूठी सूँघी।
और मेरे हाथ काँप गए।
उस पर ताज़ा मिट्टी की गंध थी। और उसके नीचे — धतूरे की गंध। वही गंध जो माँ की चाय में थी।
वो अँगूठी कल रात वहाँ नहीं थी।
कल रात भैरव वहाँ था।
मैंने अँगूठी अपनी जेब में डाली। कड़ी के बगल में। और गुड़िया की तरफ़ देखा।
"गुड़िया," मैंने कहा। "आज रात तू माँ के पास रहना।"
"नहीं।" उसने सिर हिलाया। "मैं भी चलूँगी।"
"गुड़िया—"
"भैया।" उसने मेरी कमीज़ पकड़ी। उसकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ साफ़ थी। "तुमने वादा किया था — दीवार के बाहर तक साथ जाऊँगी।"
"वो वादा था—"
"और ये अँगूठी मैंने निकाली है," उसने कहा। "ये मेरा हिस्सा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। बारह साल की लड़की। दो चोटियाँ। फटी कॉपी। और उसकी आँखों में वो ज़िद जो माँ से आई है।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर मेरी बात माननी होगी।"
"मानूँगी।"
"और वो बुढ़िया जाते वक़्त क्या बोली थी — वो सब बताना।"
गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें फैल गईं।
"भैया, मैंने तुम्हें बताया नहीं?"
"क्या?"
वो रोते-रोते बोली। "वो बुढ़िया जाते वक़्त रुकी थी। दरवाज़े पर। उसने पलटकर मेरी तरफ़ देखा और बोली — 'तेरे भैया को बोल देना, उसकी माँ का हिसाब बाकी है।'"
मैं वहीं खड़ा रह गया।
हिसाब।
बीस साल का हिसाब।
मैंने गुड़िया का सिर सहलाया। उसके आँसू पोंछे। और धीरे से कहा, "हाँ गुड़िया। हिसाब बाकी है। और आज रात मैं वो हिसाब लेने जाऊँगा।"
उसने सिर हिलाया। फिर मेरी कमीज़ में मुँह छिपा लिया।
और मैंने आसमान की तरफ़ देखा। शाम ढल रही थी। पहला तारा निकल रहा था।
आज रात।
आज रात मैं अखाड़े के पीछे वो रास्ता खोजूँगा जो कालू काका ने दिखाया था। आज रात मैं उस मिट्टी को छूऊँगा जिसमें मेरे पापा का पसीना है। और आज रात मुझे पता चलेगा — भैरव ने उस मिट्टी में ज़हर कब बोया।
मैंने जेब में हाथ डाला। कड़ी। पीला लिफ़ाफ़ा। और अब अँगूठी।
तीन चीज़ें। तीन सबूत।
और एक और चीज़ जो माँ ने मुझे दी थी — चुप्पी का सबक़। जो बीस साल तक उन्होंने सहा था। अब वो सबक़ मेरे हाथ में था। पर उलटा — अब मैं चुप नहीं रहूँगा।
तभी आँगन के दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी।
मैंने पलटकर देखा।
दरवाज़े पर एक साया था। छोटा। दुबला। एक लाठी पर टिका हुआ।
अंधेरे में चेहरा दिख नहीं रहा था। पर आवाज़ आई। धीमी। फटी हुई। जैसे किसी ने बहुत दिनों से पानी न पिया हो।
"वीर सिंह?" उसने पूछा।
"कौन हो?"
वो एक कदम आगे आया। लाठी की ठक-ठक आँगन की मिट्टी पर सुनाई दी।
"मैं वही हूँ जिसे तेरे पापा ने तुझसे मिलने के लिए भेजा था," उसने कहा। "कुएँ से। बीस साल पहले।"
मेरा खून जम गया।
"तुम… कुएँ वाले?"
"हाँ।" वो रुका। उसकी साँस फूल रही थी। "पर मैं तुझसे मिलने नहीं आया। मैं तुझे बचाने आया हूँ। भैरव को पता चल गया है कि तू आज रात तहखाने जा रहा है।"
"कैसे?"
"क्योंकि उसने मुझे बताया है।" उसने लाठी आगे की। "वो मुझे वहाँ भेज रहा है — तेरे सामने खड़ा होने के लिए।"
"तो तुम भैरव के आदमी हो।" मेरी आवाज़ अपनी ही कानों में अजनबी लगी।
बूढ़े ने लाठी से ज़मीन खुरची। "बीस साल से हूँ। पर आज नहीं।"
"क्यों? आज क्या बदला?"
"आज मैंने उसकी आँखों में देखा।" वो थोड़ा और पास आया। अब उसका चेहरा दिख रहा था — सूखी खाल, धँसी आँखें, और गले में एक पुरानी रस्सी। "जब वो मुझे तेरे सामने खड़ा करने की बात कर रहा था, तो उसकी आवाज़ में जो था, वो मैंने पहले कभी नहीं सुना था।"
"क्या था?"
"डर।" बूढ़े की आवाज़ टूटी। "भैरव सिंह बीस साल से नहीं डरा। और आज वो तुझसे डर रहा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। आँगन की मिट्टी में हमारी परछाइयाँ लंबी हो रही थीं।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno