Spirit of a Fighter – Chapter 130
वो मुझे देख रही थीं। पर पहचान नहीं रही थीं। उनकी आँखें धुँधली थीं — जैसे कोई सपने से जाग रहा हो।
और फिर उनके होंठ हिले।
"गुड़िया…" उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी सूखे कुएँ से आ रही हो। "गुड़िया ने… खाना खाया?"
मैं वहीं जम गया।
ये औरत ज़मीन पर पड़ी थी। उसे ज़हर दिया गया था। वो मरने के कगार पर थी। और उसका पहला सवाल — अपनी हालत नहीं, अपना दर्द नहीं — बेटी की भूख थी।
मैंने मुँह फेर लिया।
क्योंकि मेरी आँखें भर आई थीं। और मैं नहीं चाहता था कि माँ मुझे रोते देखें। जब वो खुद मर रही थीं, तब भी वो मुझे कमज़ोर नहीं देखना चाहती थीं।
"खाया है माँ," गुड़िया ने रोते हुए कहा। वो माँ के पास आकर बैठ गई। "मैंने खाया है। तुम चुपचाप लेटो।"
माँ ने गुड़िया का हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ पतली थीं, नसें उभरी हुईं।
"तेरे हाथ ठंडे हैं," माँ ने कहा। "कंबल ओढ़ ले।"
गुड़िया ने मुँह फेर लिया। और फूट-फूट कर रोने लगी।
मैंने माँ का सिर सहलाया। "माँ, अब बोलो मत। आराम करो। मीरा आ रही है। वो दवा ला रही है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में अब कुछ और था। वो मुझे पहचान रही थीं।
"वीर," उन्होंने कहा। "मेरी चाय… मत पीना।"
"नहीं पीऊँगा माँ।"
"और गुड़िया को भी मत देना।"
"नहीं दूँगा।"
वो एक पल चुप रहीं। फिर उन्होंने धीरे से कहा, "मुझे पता था। जब वो केतली में कुछ डालकर गई, तब मुझे पता था। पर मैं सोच रही थी — अगर मैं नहीं पीती, तो वो तुझे पिला देती।" उन्होंने गुड़िया का हाथ कसकर पकड़ा। "मैं एक बेटी से दूसरी बेटी को बचा रही थी।"
मेरा गला भर आया।
"माँ," मैंने कहा। "तुम ऐसा मत किया करो। तुम्हें ऐसा मत किया करना।"
"तो फिर क्या करूँ?" उन्होंने कहा। "माँ हूँ। माँ का काम यही है।"
और तभी दरवाज़े पर पैरों की आवाज़ आई। मीरा आई थी। उसके हाथ में छोटी पुड़िया थी और पीछे टिंकू खड़ा था — हाँफता हुआ, सिर पर टोपी टेढ़ी।
"मैं रास्ते में मिला," मीरा ने कहा। "उसने कहा वो अकेला नहीं आएगा।"
टिंकू ने हाथ जोड़े। "मैडम, मैं तो बस—"
"चुप रहो और पानी लाओ," मीरा ने कहा। वो माँ के पास बैठ गई। पुड़िया खोली। उसमें भूरे रंग का पाउडर था। उसने एक चुटकी ली और माँ के होंठों पर रखी। फिर पानी की बूँद डाली।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"सोंठ, काली मिर्च और थोड़ी अजवाइन," उसने कहा। "धतूरे को शरीर से बाहर निकालने में मदद करेगी। पर ये ज़हर का इलाज नहीं है। ये सिर्फ़ वक़्त खरीद रही है।"
"कितना वक़्त?"
"अगर सुबह तक होश आ जाए, तो ठीक है।" उसने माँ की कलाई छोड़ी। "अगर नहीं आया, तो…"
उसने वाक्य पूरा नहीं किया। ज़रूरत नहीं थी।
टिंकू पानी लेकर आया। समोसा भी लाया — पर किसी ने नहीं खाया। वो चुपचाप कोने में बैठ गया। उसका चेहरा उतरा हुआ था।
"टिंकू," मैंने कहा। "तू घर जा। सुबह आ जाना।"
"नहीं भाई।" उसने सिर हिलाया। "मैं यहीं रहूँगा। अगर वो बुढ़िया लौटी, तो मेरे सामने से गुज़रेगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो डर रहा था — मैं उसकी गंध से बता सकता था। पसीना तेज़ था। पर वो चला नहीं।
उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराने की कोशिश की।
"भाई, एक बात कहूँ?"
"कह।"
"अगर कल भैरव से लड़ना है, तो…" उसने गला साफ़ किया। "मुझे लगता है मुझे आज रात कसरत शुरू कर देनी चाहिए।"
मैंने उसे घूरा।
"अभी?" मैंने कहा।
"अभी नहीं।" उसने हाथ उठाए। "समोसा खाने के बाद।"
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा। और मुझे लगा उसके होंठ हिले। हल्की सी हँसी। फिर वो माँ के पास झुक गई।
रात कट रही थी।
मैं माँ के पास बैठा था। मीरा दूसरी तरफ़ बैठी थी। गुड़िया माँ के पैरों के पास सो गई थी — रोते-रोते। टिंकू दरवाज़े पर बैठा था, सामने अंधेरे में देख रहा था।
मीरा ने धीरे से कहा। "तुमने लिफ़ाफ़ा खोला?"
"हाँ।"
"क्या लिखा था?"
मैंने उसे बताया।
वो सुनकर चुप रही। फिर उसने कहा। "तो तीन दिन बाद भैरव अखाड़े को ज़हर देगा।"
"हाँ।"
"और तुम क्या करोगे?"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनकी साँस अब थोड़ी गहरी आ रही थी। रंग लौट रहा था — हल्का सा।
"मैं पहले उसे तीन दिन दूँगा," मैंने कहा। "वो जो चाहता है — खेल। तो खेल होगा। पर उसके नियम मेरे होंगे।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक थी जो पहली बार नहर के मोड़ पर मैंने देखी थी — जब उसने कहा था "सबूत के बिना आरोप नहीं"।
"वीर," उसने कहा। "अगर वो तहखाने की मिट्टी में ज़हर मिलाएगा, तो वो मिट्टी हमेशा के लिए खराब हो जाएगी। वो मिट्टी जिसमें तुम्हारे पापा ने पसीना डाला था।"
"मुझे पता है।"
"और अगर वो ज़हर वहाँ गया, तो उसे कोई नहीं निकाल सकता। मिट्टी ज़हर नहीं छोड़ती। वो उसे पी लेती है।"
मैंने मुट्ठी भींची।
"तो फिर हमें उससे पहले जाना होगा," मैंने कहा। "आख़िरी रात से पहले।"
"कल रात?"
"आज रात बीतने दो। कल रात।"
मीरा ने माँ की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। "पर माँ—"
"माँ ठीक हो जाएँगी," मैंने कहा। "मुझे पता है।"
"कैसे पता?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और धीरे से कहा, "क्योंकि माँ ने कहा था ना — भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है। और उन्होंने आज कुछ नहीं खाया। उनका व्रत अभी पूरा नहीं हुआ।"
मीरा कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने अपनी आँखें नीची कर लीं।
"तुम अजीब हो," उसने कहा। पर उसकी आवाज़ में वो सख़्ती नहीं थी।
"तुमने अभी तक बताया नहीं," मैंने कहा। "तुम रात को यहाँ कैसे आई? तुम्हारे पापा ने रोका नहीं?"
"पापा जानते हैं," उसने कहा। "जब मैं निकल रही थी, तब वो जाग रहे थे। उन्होंने सिर्फ़ यह कहा — 'जल्दी लौटना।'"
"बस?"
"बस।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पर उनकी आँखों में कुछ था। जैसे वो जानते थे कि ये रात आएगी।"
सुबह होने से पहले माँ की आँखें खुलीं।
इस बार उनकी आँखों में पहचान थी। वो मुझे देख रही थीं। सीधा। बिना धुँधलेपन के।
"वीर," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ कमज़ोर थी, पर साफ़। "मुझे प्यास लगी है।"
मैंने पानी का लोटा उठाया। मीरा ने रोका। "थोड़ा-थोड़ा। ज़्यादा मत देना।"
मैंने माँ को घूँट-घूँट पानी पिलाया। वो पीती रहीं। फिर उन्होंने सिर पीछे किया।
"मैं ज़िंदा हूँ," उन्होंने कहा। जैसे खुद से बात कर रही हों।
"हाँ माँ," मैंने कहा। "तुम ज़िंदा हो।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "कितनी रात बाकी है?"
"अभी सुबह हो रही है।"
"तो दो रात बाकी हैं।"
मैं चुप हो गया।
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। "वो लिफ़ाफ़ा जो हरनाम ने दिया था — तूने खोला?"
मैं सन्न रह गया। "तुम्हें कैसे पता?"
"मैंने तुझे रात में देखा था," उन्होंने कहा। "जब मैं आधी बेहोश थी। तू मेरे सीने पर एक काग़ज़ रख रहा था। और तेरे हाथ काँप रहे थे।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "क्या लिखा था उसमें?"
मैंने उन्हें बताया।
वो सुनकर चुप रहीं। फिर उन्होंने मेरा हाथ छोड़ा और छत की तरफ़ देखा।
"भैरव ने बीस साल में कभी इतनी जल्दी नहीं की," उन्होंने कहा। "वो हमेशा धीरे-धीरे मारता है। ज़हर देता है, इंतज़ार करता है। पर अब वो जल्दी में है।"
"क्यों?"
"क्योंकि उसे डर लग रहा है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "बीस साल में पहली बार उसे कोई ऐसा मिला है जो उसके पानी को सूँघ सकता है। तू उसके लिए ज़हर से भी ज़्यादा खतरनाक है।"
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