Spirit of a Fighter – Chapter 129
मैं वहीं खड़ा रहा। हाथ में लिफ़ाफ़ा। सीने में धक-धक।
फिर मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो चूल्हे पर थीं। दाल चढ़ा रही थीं।
उन्हें कुछ पता नहीं था।
मैंने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा। कड़ी के बगल में।
और मैंने ठान लिया — कल सुबह मीरा से मिलकर ये सब दिखाऊँगा। पर माँ से पहले नहीं। क्योंकि जो लिफ़ाफ़े में लिखा था, वो माँ के बारे में था।
और मुझे डर था कि अगर मैंने उन्हें पहले बता दिया, तो वो फिर से चुप हो जाएँगी।
जैसे बीस साल से चुप थीं।
॥
हरनाम भाग गया। अंधेरे में उसकी चप्पल की आवाज़ भी दूर जाकर मिट गई।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। हाथ में लिफ़ाफ़ा। जेब में कड़ी। और सीने में एक डर जो मुझे खींच रहा था — अंदर, चूल्हे की तरफ़।
क्योंकि जो गंध बाहर आ रही थी, वो जली हुई मिट्टी की नहीं थी। वो माँ की चाय की थी।
मैं अंदर भागा।
दरवाज़ा खुला पड़ा था। आँगन में चक्की टूटी पड़ी थी — अबकी बार ऐसे टूटी थी जैसे किसी ने पूरी ताकत से पटका हो। उसका लकड़ी का हत्था टूटकर दूर गिरा था।
और माँ ज़मीन पर बैठी थीं।
गुड़िया उनका सिर गोद में रखे बैठी थी। उसके आँसू माँ के माथे पर गिर रहे थे, और वो फफक-फफक कर रो रही थी। उसकी स्कूल की नई कॉपी पास में पड़ी थी — जिस पर उसने लिखा था "जो लड़ता है, वही जीतता है"।
वो लाइन अब मुझ पर ताना मार रही थी।
"माँ!" मैं घुटनों के बल उनके पास गिरा। उनकी कलाई पकड़ी। नाड़ी — धीमी। बहुत धीमी। पर चल रही थी।
उनकी आँखें बंद थीं। होंठ सूखे। माथे पर हल्दी का टीका अब भी था, पर उसके नीचे पसीना सूखकर नमक की पतली लकीर बन गया था।
"गुड़िया—" मेरी आवाज़ फटी। "ये क्या हुआ? कब हुआ? कौन आया?"
गुड़िया ने मुँह उठाया। उसकी नाक बह रही थी। आँखें लाल। और उसके होंठ काँप रहे थे।
"एक बुढ़िया आई थी," वो हिचकी लेकर बोली। "रात को। मैं सो नहीं रही थी। माँ चाय बना रही थीं। मैंने दरवाज़े पर दस्तक सुनी।"
"बुढ़िया? कैसी बुढ़िया?"
"सफ़ेद बाल। काली साड़ी। हाथ में बोतल थी — छोटी, लाल ढक्कन वाली। मैंने पूछा कौन हो। वो बोली — भैरव सर ने भेजा है। माँ के लिए दवा है।"
मेरा खून जम गया।
"और माँ ने लिया?"
"माँ ने नहीं लिया। माँ ने कहा — भैरव की कोई चीज़ नहीं लेती।" गुड़िया ने हिचकी रोकी। "पर वो बुढ़िया रुकी नहीं। वो रसोई तक चली गई। माँ ने उसे रोका। उसने माँ को धक्का दे दिया और चाय की केतली में कुछ डालकर भाग गई।"
"और माँ ने वो चाय पी ली?"
गुड़िया ने मुँह नीचे कर लिया। फिर धीरे से बोली। "माँ ने पूछा — गुड़िया, तूने चाय पी है? मैंने कहा नहीं। माँ ने कहा — फिर मत पीना, ये चाय कड़वी है। और माँ ने खुद पी ली।"
मैं सन्न रह गया।
"क्यों?" मेरी आवाज़ निकली, बस फुसफुसाहट में। "वो जानती थीं कि इसमें कुछ है। फिर भी क्यों पी ली?"
गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो बात थी जो बच्चे बड़े होकर भूल जाते हैं।
"क्योंकि अगर माँ नहीं पीती, तो वो बुढ़िया मुझे पिला देती।" उसने अपनी आवाज़ भर ली। "भैया, माँ ने मेरी जगह पी ली।"
मुझे लगा किसी ने मेरे सीने पर पत्थर रख दिया है।
मैंने माँ को गोद में उठाया। वो हल्की थीं — बहुत हल्की। जैसे चक्की का बोझ ही उनका पूरा वज़न खा गया हो। मैंने उन्हें अंदर लाकर चारपाई पर लिटाया। सिर के नीचे तकिया रखा। पैरों को ढका। माथे पर गीला कपड़ा रखा।
फिर मैंने अपना कान उनके सीने पर रखा।
साँस। धीमी। पर चल रही थी।
मैंने खुद को सँभाला। और तभी मुझे याद आया — मेरे पास एक ही आदमी है जो इसे पहचान सकता है।
"गुड़िया," मैंने कहा। "घर में ध्यान से रहना। किसी को अंदर मत आने देना। मैं अभी आया।"
"कहाँ जा रहे हो भैया?"
"मीरा के पास।"
वो उठी। उसके घुटनों में दम नहीं था, पर वो चलने की कोशिश कर रही थी।
"मैं भी आऊँगी।"
"नहीं। माँ अकेली—"
"माँ अकेली नहीं हैं।" गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आवाज़ अब रो नहीं रही थी। वो सख़्त हो गई थी। "माँ के पास मैं हूँ। और जो बुढ़िया आई थी — वो लौटकर आ सकती है। तू जा। जल्दी जा।"
मैंने उसका सिर चूमा। और भागा।
रास्ते में मेरी नाक में जो गंध आई, वो मुझे और तेज़ भगा रही थी — माँ के होंठों पर लगी वो कड़वी चाय की गंध। मैं उसे सूँघ रहा था जैसे कोई आदमी पानी की बूँद ढूँढ़ रहा हो।
मीरा का घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला था। रोशनी जल रही थी। मैंने दस्तक दी।
दरवाज़ा खुद खुला। मीरा ने खोला। उसने कुर्ता पहन रखा था और हाथ में किताब थी। मेरा चेहरा देखते ही उसने किताब गिरा दी।
"वीर? इस वक़्त? क्या हुआ?"
"माँ," मैंने कहा। बस इतना। आगे आवाज़ नहीं निकली।
वो एक पल भी नहीं रुकी। उसने बैग उठाया, दरवाज़ा बंद किया और बाहर निकल आई।
"चलो। रास्ते में बताओ।"
चलते-चलते मैंने सब बताया। बुढ़िया। चाय। गुड़िया की जगह माँ ने पी ली। मीरा ने एक बार भी नहीं टोका। बस तेज़ चलती रही। उसकी आँखों में वो ठंडक थी जो डर के ऊपर पत्थर की तरह जम जाती है।
घर पहुँचे तो माँ वैसी ही पड़ी थीं।
मीरा उनके पास गई। उसने उनकी कलाई पकड़ी। आँखें खोलीं। जीभ देखी। होंठों पर उँगली रखी। फिर उसने चारपाई के पास पड़ी वो चाय की केतली उठाई और उसकी गंध सूँघी।
उसके चेहरे का रंग बदल गया।
"ये चाय में क्या है?" मैंने पूछा।
उसने केतली नीचे रखी। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने जवाब देने से पहले एक लंबी साँस ली।
"धतूरा," उसने कहा। "खुराक कम है। इसलिए जान नहीं गई। पर…" उसने माँ की तरफ़ देखा। "उनकी उम्र ज़्यादा है। उनका शरीर कमज़ोर है। ये उनके लिए बहुत है।"
"इलाज?" मेरी आवाज़ टूटी।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब वो ठंडक नहीं थी। डर था। साफ़ डर।
"धतूरे का इलाज होता है," उसने कहा। "पर अभी। तुरंत। मेरे बैग में कुछ नहीं है। मुझे अपने कमरे में जाना होगा — मेरी पुड़िया वहीं है।"
"तो जाओ।"
"और अगर मैं जाते-जाते देर हो गई—"
"देर नहीं होगी," मैंने कहा। "तुम जाओ। मैं यहाँ हूँ।"
वो उठी। दरवाज़े तक गई। फिर रुकी। पलटी।
"वीर।" उसकी आवाज़ अब नरम हो गई थी। "उनके होंठों पर उँगली रखकर रखना। अगर साँस रुके, तो उँगली से हवा डालना। समझे?"
"समझ गया।"
वो भागी।
मैं माँ के पास बैठ गया। उनका सिर गोद में रखा। गुड़िया पास बैठकर पंखा झल रही थी। आँगन में चक्की का टूटा हत्था पड़ा था, और बाहर अंधेरा था।
मैंने जेब से हरनाम का लिफ़ाफ़ा निकाला।
उसे खोलना मत, उसने कहा था। पहले अपनी माँ को देख लेना।
मैंने माँ को देख लिया।
अब लिफ़ाफ़ा खोलूँगा।
मैंने अँगूठे से सील तोड़ी। अंदर एक काग़ज़ था — मुड़ा हुआ, पीला, नरम। हरनाम की लिखाई थी। हड़बड़ाई हुई, टेढ़ी-मेढ़ी।
और उस पर चार लाइनें।
कुएँ के नीचे तहखाने में जो मिट्टी है, उसमें ज़हर मिलाकर भैरव पूरे अखाड़े को खत्म करेगा। तीन दिन बाद, आख़िरी रात। जब सब सोए होंगे। जो पहलवान उसकी बात नहीं मानते, वो उसी मिट्टी में गिरेंगे। और फिर उठेंगे नहीं।
मेरे हाथ काँप गए।
मैंने काग़ज़ माँ के सीने पर रख दिया। जैसे उन्हें भी पढ़ना हो।
"माँ," मैंने धीरे से कहा। "अब मैं नहीं रुकूँगा।"
और तभी माँ की उँगली हिली।
मैं सन्न रह गया। उनकी पलकें काँपीं। होंठ हिले। मैंने कान पास लगाया।
उनकी पहली साँस गहरी आई। फिर दूसरी। फिर उनकी आँखें धीरे से खुलीं।
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