Spirit of a Fighter128 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 128

6 min read November 5, 2026

मीरा ने मेरा हाथ नहीं हटाया। पहली बार।

वो वहीं बैठी रही, कड़ी माथे से लगाए, आँखें बंद किए। और मैं उसके पास खड़ा रहा, हाथ उसके कंधे पर। कमरे में कोई कुछ नहीं बोला।

फिर मीरा ने आँखें खोलीं। उसने मेरी तरफ़ देखा।

"मतलब उस दिन मेरे पापा मिट्टी में गिरे थे," उसने कहा। उसकी आवाज़ ठंडी हो गई थी, जैसे किसी ने पानी को बर्फ़ बना दिया हो। "और भैरव वहीं खड़ा था। मेरे पापा के गिरने की आवाज़ सुन रहा था।"

उसने कड़ी मेरी हथेली पर रख दी। उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों से छू गईं।

"हमें ये पुलिस को देना है," उसने कहा।

टिंकू बीच में बोला। "तो अब थाने जाना है?"

मीरा ने सिर हिलाया।

"नहीं। पहले पापा को दिखाना है। बीस साल बाद उन्हें अपनी चेन की कड़ी दिखानी है। उन्हें जानना है कि वो मिट्टी में अकेले नहीं गिरे थे।"

रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था।

"बेटा," उन्होंने कहा। "मेरी चेन… तुमने उस जगह पाई जहाँ भैरव ने मिट्टी बदली?"

"हाँ।"

"तो इसका मतलब…" उनकी आवाज़ रुक गई। "इसका मतलब भैरव ने वो मिट्टी बदली थी जिसमें मेरा खून गिरा था। वो मेरे खून को छुपाना चाहता था।"

कमरा फिर चुप हो गया।

फिर रणवीर सिंह ने अपनी व्हीलचेयर की ब्रेक खोली। उन्होंने अपने हाथों से पहियों को धक्का दिया और वो मेरे पास आए।

"अपना हाथ दो," उन्होंने कहा।

मैंने हाथ बढ़ाया। उन्होंने मेरी हथेली में कड़ी रखी और अपना हाथ उसके ऊपर।

"ये कड़ी अब तुम्हारी है," उन्होंने कहा। "क्योंकि तुमने इसे ढूँढा। और तुमने वो किया जो मैं बीस साल नहीं कर सका।"

"पर ये आपकी चेन है—"

"चेन तो चेन है, बेटा।" उन्होंने मेरी हथेली दबाई। "पर मेरे पास अब भी बहुत कुछ है। ये मेरी बेटी है। और अगर मैं इसे तुम्हारे साथ देखता हूँ, तो ये चेन से ज़्यादा कीमती है।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसके गाल लाल हो गए। उसने नज़र चुराई और अपनी पट्टी ठीक करने लगी।

टिंकू ने खाँसा। "अरे वाह। भाई, ये तो…"

"चुप कर।" मैंने कहा।

वो हँसा। पहली बार उस रात में किसी ने हँसा।

माँ उठीं। उन्होंने अपनी साड़ी ठीक की और छड़ उठाई।

"अब," उन्होंने कहा। "रात हो गई है और कल फिर सुबह होगी। भैरव ने तीन दिन की बात कही है। उससे पहले हमें तैयारी करनी है।"

"तैयारी?" मैंने पूछा।

"हाँ।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "तू अकेले नहीं लड़ेगा, वीर। तेरे पापा ने अकेले लड़ा था और हार गया था। तू मिलकर लड़ेगा।"

कालू काका आगे आए। "मैं एक चीज़ कहना चाहता हूँ।"

सबने उनकी तरफ़ देखा।

"भैरव ने कल रात कुएँ की सीढ़ियाँ तुड़वा दीं। पर मुझे पता है एक और रास्ता। नीम के पीछे से सुरंग है। वो तहखाने तक जाती है। मैं बीस साल से उस रास्ते से जाता था — चुपके से। तहखाने की मिट्टी सींचने। भैरव को पता नहीं।"

"तू वहाँ जाता था?" रणवीर सिंह ने पूछा।

"हाँ।" कालू काका ने सिर झुकाया। "बीस साल से। क्योंकि मुझे लगता था — शायद कोई आए और उस मिट्टी को जगाए। शायद रघुवीर का बेटा आए।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चमक थी जो बुढ़ापे में कभी-कभी आती है — उम्मीद की चमक।

"वो बेटा तू है," उन्होंने कहा। "मुझे पता था जिस दिन तूने दीवार के छेद से कुश्ती देखी थी।"

मैंने मुट्ठी भींची। कड़ी मेरी हथेली में चुभ रही थी।

"तो अब क्या करना है?"

रणवीर सिंह ने कहा। "तीन दिन। भैरव ने तीन दिन कहा है। तीन दिन में हमें वो सब इकट्ठा करना है जो हमारे पास है। मेरी पुरानी पर्चियाँ। सरस्वती का लिफ़ाफ़ा। तुम्हारी लैब रिपोर्ट, मीरा। और…" उन्होंने कालू काका की तरफ़ देखा। "तहखाने की मिट्टी।"

"मिट्टी क्या करेगी?" टिंकू ने पूछा।

"मिट्टी गवाही देगी," कालू काका ने कहा। "जब सबके सामने भैरव का सच खुलेगा, तो कोई पूछेगा — सबूत क्या है? तब मैं वो मिट्टी लाऊँगा जिसमें रणवीर सिंह का खून और भैरव का ज़हर दोनों मिले हैं। मिट्टी झूठ नहीं बोलती।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "तीन दिन में हमें सबको तैयार करना है। गाँव वालों को। पहलवानों को। पंचायत को।"

"और सुक्खी बुआ को," मैंने कहा।

टिंकू हँसा। "वो तो खुद ही सबको बुला लेगी। उसे कहने की ज़रूरत नहीं।"

माँ ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।

"चल," उन्होंने कहा। "घर चलते हैं। तेरी बहन अकेली है।"

मैंने रणवीर सिंह को प्रणाम किया। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा — बस एक पल के लिए — फिर छोड़ दिया।

"कल मिलते हैं," उसने कहा।

"कहाँ?"

"नहर के मोड़ पर। सुबह। जब सब सो रहे हों।"

"ठीक है।"

टिंकू ने हमारा रास्ता रोका। "मैं भी आऊँगा।"

"तू क्यों?"

"क्योंकि भाई, तेरी नाक अच्छी है पर तेरी अक्ल कम है। तुझे कोई संभालने वाला चाहिए।"

मैंने उसका कंधा थपथपाया। "चल, बेवकूफ।"

हम बाहर निकले। रात गहरी थी। चाँद बादलों के पीछे छिपा था। गाँव सो रहा था।

माँ आगे चल रही थीं। कालू काका उनके पास। टिंकू पीछे। और मैं सबसे पीछे — जेब में कड़ी, हाथ में लिफ़ाफ़ा।

रास्ते में टिंकू ने धीरे से कहा। "भाई, तूने देखा? मीरा मैडम ने तेरा हाथ नहीं हटाया।"

"चुप कर।"

"मैं तो बस कह रहा हूँ। अच्छी लड़की है। पढ़ी-लिखी। और तेरे लिए…"

"टिंकू।"

"हाँ भाई।"

"अगर तूने एक और शब्द बोला, तो तेरी खीर हमेशा के लिए बंद।"

वो हँसा। पर चुप हो गया।

घर पहुँचे तो गुड़िया दरवाज़े पर खड़ी थी। उसकी आँखें सूजी हुई थीं। वो दौड़कर मेरे गले लगी।

"भैया, तुम आ गए। माँ कह गई थीं कि तुम आ जाओगे। पर मैं डर गई थी।"

"डर किस बात का?" मैंने उसके बाल सहलाए। "मैं हूँ ना।"

"माँ ने कहा कि भैरव ने धमकी दी है।"

"धमकी देने वाले अब डरेंगे," मैंने कहा। "अब हम धमकी देंगे।"

गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक वापस आई।

"सच?"

"सच।"

माँ अंदर गईं। उन्होंने चूल्हा जलाया। दाल चढ़ाई। और मुझे लगा जैसे सब कुछ सामान्य हो गया है।

पर नहीं था।

मैं बाहर आँगन में गया। आसमान में तारे दिख रहे थे। और मेरी नाक में एक गंध आई — दूर से। जली हुई मिट्टी की। जैसे कोई कुछ जला रहा हो।

मैंने चारों तरफ़ देखा। कुछ नहीं दिखा।

पर गंध आ रही थी। और वो दूर नहीं थी।

मैंने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा। कड़ी मुट्ठी में कसी।

और फिर मैंने पाया कि दरवाज़े पर कोई खड़ा है।

हरनाम।

वो अंधेरे में खड़ा था। उसका चश्मा टूटा हुआ था। उसकी शर्ट फटी थी। उसके हाथ काँप रहे थे।

"वीर सिंह," उसने फुसफुसाकर कहा। "प्लीज। मुझे अंदर आने दो।"

मैंने दरवाज़ा खोला। वो अंदर घुसा और दीवार से टिक गया।

"अब मैं नहीं बचूँगा," उसने कहा। उसकी आवाज़ में दम नहीं था। "भैरव को पता चल गया कि मैंने तुम्हें कुछ बताया है। उसने मेरी फ़ाइलें जला दीं। और अब वो मुझे ढूँढ रहा है।"

"तुमने मुझे क्या बताया था?" मैंने पूछा।

उसने अपनी जेब से एक लिफ़ाफ़ा निकाला। छोटा, सील बंद, ऊपर कोई नाम नहीं।

"ये रख लो," उसने काँपते हाथ से मेरी तरफ़ बढ़ाया। "इसे खोलना मत। पहले अपनी माँ को देख लेना।"

मैंने लिफ़ाफ़ा लिया। "क्यों? इसमें क्या है?"

वो पलटा। दरवाज़े की तरफ़ भागा।

"हरनाम!" मैंने आवाज़ दी। "रुको! इसमें क्या है?"

उसने दरवाज़े पर रुककर पीछे देखा। उसके चेहरे पर पसीना था।

"तेरी माँ का नाम," उसने कहा। "भैरव के रिकॉर्ड में।"

और वो भाग गया। अंधेरे में।

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