Spirit of a Fighter – Chapter 1294
"ये अदरक, तुलसी और काली मिर्च का काढ़ा है," उसने कहा। "ये ज़हर नहीं काटेगा। ज़हर काटने का कोई इलाज नहीं। पर ये शरीर को साफ़ रखेगा। जो पहलवान आज तक इस पानी के पास भी गया है, वो सुबह-शाम ये पिए। और जो पी चुका है, वो ये पिए और मेरे पास आए। हम सब मिलकर देखेंगे कि कितना बचा है।"
उसकी आवाज़ में वो दम था जो मैंने किसी डॉक्टर की आवाज़ में नहीं सुना था। गाँव की औरतें उसके पास आईं और उसने हर एक को ध्यान से समझाया कि कितना पीना है, कब पीना है।
तभी भीड़ के पीछे से एक आवाज़ आई।
"मैं गवाही देना चाहती हूँ।"
सब पलटे। एक लड़की खड़ी थी। लंबी, दुबली, सिर पर दुपट्टा, आँखें लाल। मैंने उसे पहले नहीं देखा था। वो आगे आई और उसने अपनी आवाज़ में वो दम भरा जो उसके जैसी लड़की में मैंने नहीं सोचा था।
"मैं चंदा हूँ," उसने कहा। "ठाकुर महेंद्र सिंह की बेटी।"
गाँव में सन्नाटा छा गया। किसी ने साँस नहीं ली।
"मेरे पिता ने मुझे बेचने की बात की थी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ एक बार लड़खड़ाई, फिर सँभल गई। "मेरे भाई शेराज़ को उन्होंने भैरव के हाथ में दिया। मेरी माँ को मार डाला। मैं जानती हूँ कि पीली शीशी कहाँ से आती थी। और मैं जानती हूँ कि मेरे पिता ने कितने पहलवानों के घर जलाए।"
इंस्पेक्टर शर्मा आगे आए। उनके हाथ में काग़ज़ था।
"ठाकुर महेंद्र सिंह पर," उन्होंने कहा, "ज़हर देने, आग लगाने, और अपराध में साथ देने के सत्रह मुक़दमे चल रहे हैं। गवाही शुरू हो चुकी है।"
चंदा ने आगे बढ़कर उन काग़ज़ों पर अँगूठा लगाया। उसकी उँगली काँप रही थी। मैंने उसका हाथ थामा और उसने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं अपने पिता के ख़िलाफ़ गवाही दूँगी," उसने कहा, और उसकी आँखों में पानी था। "क्योंकि मैं उनकी बेटी नहीं, इंसान हूँ।"
अखाड़े में फूल बरसने लगे। चंदा की आँखों से आँसू गिर रहे थे और वो मुस्कुरा रही थी।
करण उस दिन अखाड़े में आया। उसने मेरे सामने खड़े होकर अपने दोनों हाथ जोड़े।
"मैं तुमसे लड़ना चाहता हूँ," उसने कहा। "कुश्ती में। मिट्टी में। जैसे तुम लड़ते हो।"
मैंने उसका कंधा थामा। "कल सुबह आना। पाँच बजे। मैं तुम्हें वो सिखाऊँगा जो मुझे किसी ने नहीं सिखाया — मिट्टी से बात करना।"
करण हँसा। मैंने उसे पहली बार हँसते देखा। उसकी हँसी में वो भैरव वाली कड़वाहट नहीं थी। उसकी हँसी में एक बेटे की हँसी थी जो अपने बाप के साए से निकल आया था।
टिंकू की दुकान उस दिन खाली हो गई। उसने सारी मिठाइयाँ अखाड़े में बाँट दीं। उसकी माँ आई — सिर पर साफ़ साड़ी, हाथ में मिठाई की डिब्बी। उसने टिंकू को देखा और वो रो पड़ी।
"मैं सोचती थी," उसने कहा, और उसका गला भरा हुआ था, "मेरा बेटा बड़ा रसोइया बनेगा। पर तू तो अखाड़े में खड़ा है।"
टिंकू ने अपनी माँ के पैर छुए। "माँ, मैं रसोइया ही हूँ। बस मेरी मिठाई अब जीतने वाले पहलवान के मुँह में जाती है।"
उसकी माँ ने उसका सिर सहलाया और उसकी आँखों से पानी बहता रहा। मैंने उस दिन देखा कि टिंकू का राज़ — वो खीर जो वो मुझे रोज़ चुपके से खिलाता था — उसमें उसकी माँ का हाथ था। वो खीर उसकी माँ बनाती थी और टिंकू कहता था कि दुकान पर बिक गई।
उस शाम टिंकू ने मुझे खीर खिलाई और अपनी माँ का सामना नहीं किया। हम दोनों अखाड़े की मिट्टी पर बैठे खीर खा रहे थे और हँस रहे थे। मैंने कहा, "अब शादी में भी खीर ही बनेगी क्या?" और उसने कहा, "नहीं, शादी में मिठाई बनेगी। खीर तो बस तेरे और मेरे बीच है।"
वो पल मेरे दिल में बैठ गया। मेरे दोस्त ने मुझे अपना सबसे बड़ा राज़ दे दिया — अपनी माँ की खीर, और ये कहकर दिया कि ये सिर्फ़ हम दोनों के बीच है।
तीन दिन बाद पंचायत बैठी। सुक्खी बुआ चबूतरे पर चढ़ीं और बोलीं, "अरे मैंने तो सुना है कि वीर और मीरा की शादी अखाड़े की मिट्टी में होगी!"
गाँव हँसा। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मुँह नीचे किए मुस्कुरा रही थी। और मेरे पेट में ऐसे झटका लगा जैसे अखाड़े में पहली बार उतरा हूँ।
"सुक्खी बुआ," मैंने कहा, "आपकी चुगली आज सच हो जाएगी।"
उनका मुँह खुला का खुला रह गया। गाँव में ऐसी चीख पड़ी जैसे मैंने कोई पहलवान पछाड़ दिया हो।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो आगे आई और उसने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा।
"मेरी शर्त है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो दम था जो उसने कभी अदालत में बहस करते वक़्त इस्तेमाल किया होगा। "शादी अखाड़े में होगी। मिट्टी में। और मेरे पिता वहाँ होंगे।"
उसकी आवाज़ आख़िरी लाइन पर धीमी हो गई। रणवीर सिंह ने अपनी व्हीलचेयर से हाथ उठाया।
"मैं तो वहाँ हूँ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ भर गई, "पर एक शर्त है। मैं अपनी बेटी को सौंपने नहीं, खुद लेने वाला हूँ। क्योंकि तू मेरा बेटा है, बेटी नहीं।"
मीरा उनके पास गई और उनके गले लग गई। उसकी आँखें भर आईं और उसने अपना चेहरा उनके कंधे में छुपा लिया।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो सिसक रही थी और हँस रही थी, और मैंने अपना सिर नीचे किया। मेरे हाथ काँप रहे थे। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा और मेरे कान में कहा — "तुम अकेले नहीं हो।"
उस दिन के बाद गाँव में वो मिठाई बँटी जो टिंकू ने अपनी पूरी ज़िंदगी नहीं बाँटी थी। हर घर में एक थैली गई। हर बच्चे के हाथ में एक लड्डू आया। और टिंकू की दुकान का नाम उस दिन पूरे इलाक़े में गूँजा।
शादी का दिन आया। सुबह से ढोल बज रहे थे। अखाड़े की मिट्टी को मीरा ने खुद सजाया था — गेंदा के फूल, हल्दी की पोटलियाँ, और बीच में हल्दी से बना स्वस्तिक। मंडप बाँस का था, ऊपर लाल कपड़ा, और नीचे वही मिट्टी जिस पर मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी पसीना गिराया था।
मैंने लाल धोती पहनी। मेरे कंधे पर वही तलवार थी जो रणवीर सिंह ने दी थी। मेरी माँ ने मेरे माथे पर हल्दी का टीका लगाया और मेरे कान में कहा — "आज तेरे पापा भी यहाँ हैं। मुझे उनकी गंध आ रही है।"
मैंने आँखें बंद कीं। और मुझे सच में वो गंध आई। मिट्टी, पसीना और कपूर की — तीनों मिली हुई।
मीरा आई। लाल जोड़े में, हाथों में मेहंदी, माथे पर चाँद। उसके पीछे रणवीर सिंह की व्हीलचेयर थी और उन्होंने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा था। उनकी आँखों में पानी था पर वो मुस्कुरा रहे थे।
मीरा मेरे पास आई और उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसके हाथ में वो तुलसी, अदरक और काली मिर्च की गंध थी। उसने मेरे कान में कहा — "मैंने डर के लिए जगह नहीं रखी है।"
शादी की रस्में शुरू हुईं। फेरे अखाड़े के बीच में हुए — कोई अग्नि नहीं थी, कोई हवन नहीं था, सिर्फ़ मिट्टी और उस पर रखा दीपक। कालू काका ने मुझे बताया था कि अखाड़े की मिट्टी में शपथ लेने की रस्म बहुत पुरानी है — जो इस मिट्टी पर शपथ लेता है, वो सच बोलता है, क्योंकि मिट्टी झूठ नहीं बोलती।
मैंने मीरा के हाथ पर हाथ रखा और मैंने कहा, "मैं तुमसे वादा करता हूँ — मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा। न अखाड़े में, न बाहर। और अगर कभी मैं तुम्हारे और मेरे बीच आया, तो ये मिट्टी मुझे माफ़ न करे।"
मीरा हँसी। "शर्त यही है?"
"शर्त यही है।"
उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ा और कहा, "और मैं तुमसे वादा करती हूँ — मैं तुम्हें कभी बदलने नहीं दूँगी। तुम वीर सिंह हो, गाँव के मज़दूर का बेटा, जिसने अखाड़े की मिट्टी से उठकर ये नाम बनाया। और मैं तुम्हारी हूँ, तुम्हारे साथ, हर हाल में।"
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