Spirit of a Fighter – Chapter 1293
अखाड़े में सन्नाटा छा गया। ये क़ानून सिर्फ़ काग़ज़ पर नहीं था — ये उन सत्रह मरे हुए पहलवानों की आवाज़ थी, जो अब भी मिट्टी में दबी थीं।
कालू काका ने अपनी लाठी ज़मीन पर मारी। "मिट्टी झूठ नहीं बोलती," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो सारा बीस साल था जो उन्होंने चुप रहकर काटा था। "आज से मिट्टी खुद गवाही देगी। जो पसीना डालेगा, वो जिएगा। जो ज़हर डालेगा, वो सड़ेगा।"
गाँव वालों ने एक साथ हाथ उठाए।
माँ मेरे पास आईं। उन्होंने मेरी आँखों में देखा, और फिर उन्होंने मेरे माथे पर हल्दी का टीका लगाया — ठंडा, गीला, वही जो वो रोज़ सुबह लगाती थीं।
"आज तेरे पापा को शांति मिलेगी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ सिर्फ़ मेरे लिए थी। "बीस साल बाद।"
मैंने उनके हाथ पकड़े। उनकी हथेलियाँ चक्की से खुरदरी थीं, और उनमें वो गरमाहट थी जो हर माँ के हाथ में होती है — वो गरमाहट जिसमें रोटी भी पकती है और दुआ भी।
"माँ," मैंने कहा, "आज के बाद आप चक्की नहीं चलाएँगी।"
वो हँसीं। "चक्की चलेगी, बेटा। पर आराम से। तेरे पापा ने कहा था न — भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है। मैं तेरे लिए दुआ माँगती रहूँगी, और चक्की चलाती रहूँगी। ताकि तू कभी भूखा न सोए।"
मेरी आँखें भर आईं। गुड़िया ने मेरी कमर पकड़ ली और अपना चेहरा मेरे पेट में दबा दिया।
शाम को अखाड़ा खाली हो गया। गाँव वाले चले गए, चबूतरा सूना पड़ा। मैं अखाड़े में अकेला बैठा था।
मीरा आई। वो मेरे पास बैठ गई। उसके हाथ में एक कटोरी थी जिसमें गरम दूध था। उसने मुझे दिया।
"पी," उसने कहा। "आज कुछ नहीं खाया तूने।"
मैंने दूध पिया। उसमें अदरक थी और थोड़ी शक्कर। मीरा के हाथ की गंध दूध में घुली हुई थी — तुलसी, अदरक, और वो हल्की सी काली मिर्च जो वो हर चीज़ में डालती थी।
"मीरा," मैंने कहा, और मैंने कटोरी रख दी, "कल से सब बदल जाएगा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। "कैसे?"
"कल भारत केसरी का मुकाबला है," मैंने कहा। "अखाड़े में मेरा नाम अब भवानी अखाड़े के तख़्ते पर लिखा है। मैं लड़ूँगा। बिना किसी शीशी के। बिना किसी पानी के। सिर्फ़ मिट्टी और मेहनत से।"
"और अगर हार गया?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें मेरी आँखों से जा मिलीं।
"तो भी सच्चा रहूँगा," मैंने कहा। "भैरव जीता था, पर झूठ से। उसकी जीत पीली शीशी में बंद थी। मेरी हार भी अगर होगी, तो मिट्टी में होगी — और मिट्टी झूठ नहीं बोलती।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"कल से पहले," उसने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी थी, "आज की रात — मैं तेरे साथ हूँ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके छोटे बाल हवा में हिल रहे थे। उसकी आँखों में वो चमक थी जो पहली बार मैंने उस दिन देखी थी जब वो मुझे अखाड़े से बाहर धकेलने आई थी।
मैंने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।
तभी आसमान में बादल गरजे। गरज इतनी ज़ोर की थी कि अखाड़े की मिट्टी काँप उठी। और फिर पहली बूँद गिरी — मेरे माथे पर, ठंडी, छोटी, किसी की उँगली की तरह।
और उसके बाद दूसरी। फिर तीसरी। फिर बीसों, फिर सैकड़ों, और फिर पूरा अखाड़ा बारिश से गूँज उठा।
मैं अखाड़े की मिट्टी पर लेट गया। बारिश मेरे चेहरे पर गिर रही थी, और मिट्टी की गंध — वो गंध जो मेरे बचपन से मेरे सीने में बसी थी — बारिश के पानी से और गहरी हो गई।
मीरा मेरे पास बैठी। उसने मेरा हाथ पकड़ा।
"सुन," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ बारिश में घुल गई, "ये बारिश मेरे पापा की पहली जीत की मिट्टी पर पहली बारिश है।"
मीरा ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया।
और उस रात, अखाड़े की मिट्टी पर पहली बार, बीस साल बाद, बारिश ऐसे बरसी जैसे कोई पुराना हिसाब चुका रहा हो।
॥
बारिश रुकी तो सुबह की पहली किरण अखाड़े की मिट्टी पर ऐसे गिरी जैसे किसी ने सोने का पानी उँडेल दिया हो। मैं वहीं मिट्टी पर पड़ा था, कपड़े कीचड़ में लिपटे, सिर के नीचे बाँह। मीरा मेरे पास बैठी थी, उसने रातभर मेरा हाथ नहीं छोड़ा। मेरी आँख खुली तो सबसे पहले उसकी आवाज़ सुनाई दी।
"उठ," उसने धीरे से कहा। "आज तेरा दिन है।"
मैं उठा। मेरे हाथ में मिट्टी लगी थी और उस मिट्टी में बारिश की गंध भरी हुई थी। ऐसी गंध मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में नहीं सूँघी थी। इसमें पसीना था, दुआ थी, और कुछ ऐसा था जो मेरे पापा की छाती से निकलकर इस मिट्टी में बस गया था।
अखाड़े के बाहर ढोल बजने लगा। पहले एक, फिर दो, फिर पूरा गाँव उतर आया।
माँ आई। उसके हाथ में गरम पानी का लोटा था और कंधे पर साफ़ धोती। उसने मेरे सिर पर पानी डाला और मेरे बालों में उँगलियाँ फेर दीं।
"आज के बाद," उसने कहा, "तू इस अखाड़े का नाम रोशन करेगा। मैंने तेरे पापा से वादा किया था।"
"कब किया था, माँ?"
वो रुकी। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर होंठ मुस्कुरा रहे थे। "उस रात, जब मैंने उनकी लाश जलाई थी। मैंने कहा था — तेरा बेटा तेरे नाम को ज़िंदा रखेगा। और आज वो दिन आ गया।"
मैंने उसके पैर छुए। मेरे हाथ काँप रहे थे, और ये कँपकँपी किसी डर की नहीं थी। ये उस आदमी की थी जो बीस साल से इंतज़ार कर रहा था।
अखाड़े के बीच में बाँस का तख़्ता खड़ा था जिस पर लाल कपड़ा टँगा था। रणवीर सिंह अपनी व्हीलचेयर पर आए, पीछे बलवंत धकेल रहा था। रणवीर सिंह के हाथ में एक पुरानी तलवार थी जिसकी मूठ पर पीतल का शेर बना था।
"ये तलवार भवानी की थी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो गरज लौट आई थी जो बीस साल से सोई हुई थी। "जिस दिन उसने पहली बार मुझे पछाड़ा था, उस दिन उसने मुझे ये तलवार दी थी। कहा था — जिस दिन तेरा कोई शिष्य इस अखाड़े का नाम रोशन करे, उस दिन ये तलवार उसे देना।"
उन्होंने मेरी तरफ़ तलवार बढ़ाई। मेरे हाथ काँपे। मैंने दोनों हाथों से वो तलवार पकड़ी। उसकी ठंडक मेरी हथेली से सीधे मेरे सीने तक गई।
"आज से," रणवीर सिंह ने कहा, और पूरे गाँव ने सुना, "ये अखाड़ा 'भवानी अखाड़ा' कहलाएगा। और इसका पहला पहलवान होगा — वीर सिंह।"
ढोल फट गया। गाँव के लोगों ने तालियाँ बजाईं। सुक्खी बुआ रो रही थीं और चुगली भी कर रही थीं — "अरे मैंने तो कहा था न, ये लड़का कुछ बनेगा।" उनके हाथ से पान का बीड़ा गिर गया और टिंकू ने उसे उठाकर उन्हें दिया।
फिर मैंने सबको बताया। अखाड़े के बीच खड़े होकर, पूरे गाँव के सामने, मैंने भैरव का ज़हर खोला — कैसे वो हर पहलवान को उसका दिया हुआ पानी पिलाता था, कैसे वो पानी पहले दम देता था और फिर शरीर के अंदर की उम्र खा जाता था। मैंने सत्रह पहलवानों के नाम बोले। मैंने उनके बच्चों के नाम बोले।
"ये बीमारी नहीं थी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ साफ़ थी, काँप नहीं रही थी। "ये ज़हर था। और ज़हर का इलाज इलाज नहीं — रोकना है। जो आज से अपने पहलवान बेटे को किसी के हाथ का पानी पिलाए, वो मेरा दुश्मन है।"
गाँव की औरतें रो पड़ीं। एक बूढ़ी माँ आगे आई और उसने मेरे पैर पकड़ लिए। मैंने उसे उठाया। उसका बेटा भी उन सत्रह में से एक था।
"बेटा," उसने कहा, "मेरा बेटा मरते वक़्त कहता था — माँ, मेरे पैर नहीं चल रहे। मैं समझी नहीं थी। अब समझी।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा और कुछ नहीं बोला। कुछ बोलने को नहीं था।
फिर मीरा आगे आई। उसके बैग से उसने हरी शीशियाँ निकालीं और एक-एक करके गाँव वालों को बाँटने लगी।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno