Spirit of a Fighter – Chapter 1292
"एक ही खून," दादी ने कहा। "पर अलग-अलग रास्ते। खून एक है, वीर। रास्ते तू चुनेगा।"
मैंने अपने हाथ देखे। चक्की के छाले, मज़दूरी के निशान, अखाड़े की मिट्टी। इन हाथों में वो खून था जो भैरव के हाथों में भी था। मुझे अचानक अपने ही शरीर से डर लगने लगा।
मैंने मुँह खोला, पर कुछ नहीं निकला। मैं अखाड़े की मिट्टी पर बैठ गया। मेरे घुटने मुड़ गए, जैसे किसी ने उनमें से हड्डी निकाल दी हो।
मीरा मेरे पास आई और बैठ गई। उसने मेरा हाथ पकड़ा।
"वीर," उसने कहा। "साँस ले।"
"मैंने सोचा था," मैंने कहा, और आवाज़ काँप रही थी, "कि भैरव कोई बाहर वाला है। कोई पराया आदमी जो हमारे अखाड़े में घुस आया। कोई साँप जो दूर से आया।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "वो बाहर वाला नहीं है, मीरा। वो मेरे ही घर का है। मेरे ही बाप का भाई है। मेरे ही खून का है।"
मीरा ने मेरा हाथ नहीं छोड़ा। उसने कुछ नहीं कहा। बस उसका हाथ मेरे हाथ पर रहा, और उसकी गरमाहट मेरी हथेली से सीधे मेरे सीने तक गई।
थोड़ी देर बाद मैं उठा। मेरी टाँगें काँप रही थीं, पर मैं खड़ा हो गया। मैंने अखाड़े की तरफ़ देखा। दूर बिशन चाचा खड़े थे। कालू काका अपनी लाठी पर झुके थे। बलवंत वहीं था, अब भी चुप।
"बलवंत," मैंने कहा।
वो आया। उसके कदम भारी थे।
"तूने सुना," मैंने कहा।
"सुना," उसने कहा। "भैरव मेरा पालने वाला था, पर वो मेरे बाप का भाई था। और भवानी मेरा बाप था, जिसे उसी भाई ने मारा।" उसने एक गहरी साँस ली। "सब एक ही कुएँ का पानी है, वीर। पर किसी ने ज़हर घोला, किसी ने नहीं।"
मैंने उसका कंधा पकड़ा। "तू मेरे साथ है?"
"मैं भवानी का बेटा हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार बिना काँपे निकली। "मैं जहाँ खड़ा हूँ, वहीं से मिट्टी दिखती है।"
तभी पीछे से चप्पलों की तेज़ आवाज़ आई। सुक्खी बुआ अपनी चमकीली साड़ी सँभालती हुई दौड़ी आ रही थीं, हाथ में पान का बीड़ा, और मुँह में पहले से ही बात तैयार।
"अरे मैंने तो सुना है," वो चिल्लाईं, और उनकी आवाज़ पूरे अखाड़े में गूँजी, "कि भैरव और वीर भाई हैं! अरे राम राम, ये तो वही बात है जो मैं बीस साल से कह रही थी — इस अखाड़े में कोई न कोई खून का खेल ज़रूर है!"
पीछे खड़े गाँव वालों में से किसी ने हँसी दबाई। फिर एक और हँसा। फिर पूरा अखाड़ा हँसने लगा — वो हँसी जो डर के बाद आती है, जब आदमी को समझ नहीं आता कि रोए या हँसे। सुक्खी बुआ ने अपनी साड़ी का पल्ला ठीक किया और शान से खड़ी हो गईं, जैसे उन्होंने कोई बड़ा काम किया हो।
पर मैं नहीं हँसा। मेरा चेहरा गंभीर था।
मैं अखाड़े के बीच में गया और मैंने अपनी आवाज़ उतनी ऊँची की जितनी मेरे अंदर थी।
"सुनो," मैंने कहा। हँसी धीरे-धीरे बंद हुई। "हाँ, हम भाई हैं। भैरव और मैं। एक ही बाप के बेटों के बेटे। पर सुनो — हमारा रास्ता अलग है।"
मैंने सबकी तरफ़ देखा। माँ दूर खड़ी थीं, गुड़िया का हाथ पकड़े। माँ की आँखों में पानी था, पर वो मुझे देख रही थीं, और उनके होंठ हिल रहे थे, जैसे कोई दुआ पढ़ रही हों।
"मैं उसे माफ़ नहीं करूँगा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो ज़ोर था जो मुझे खुद भी नहीं पता था कि कहाँ से आया। "भैरव ने मेरे बाप को मारा। उसने सत्रह पहलवानों को मारा। उसने मेरे गाँव को बीस साल ज़हर पिलाया। मैं उसे माफ़ नहीं करूँगा। माफ़ी माँगने से सत्रह मरे हुए लड़के वापस नहीं आएंगे।"
अखाड़े में सन्नाटा छा गया।
"पर," मैंने कहा, और मैंने अपनी आवाज़ नरम की, "मैं उसके बेटे को अपना भाई मानूँगा।"
मैं पलटा। करण दूर खड़ा था, अकेला, गाँव वालों की भीड़ से थोड़ा अलग। उसका चेहरा सफ़ेद था। उसकी आँखें मुझ पर जमी थीं, और उनमें वो डर था जो कोई पंद्रह साल का लड़का अपने बाप के नाम के डर से पीता है।
"करण," मैंने कहा, और मैंने उसे हाथ से बुलाया।
वो हिला नहीं। उसके पैर जमे हुए थे।
"आ," मैंने कहा। "यहाँ आ।"
वो धीरे-धीरे आया। उसकी चाल में वो झिझक थी जो किसी की मौत के बाद पहली बार सामने आने में होती है। वो मेरे सामने रुका।
"मुझे पता है तूने क्या सुना," मैंने कहा। "तूने सुना कि भैरव मेरा सौतेला भाई है। तो एक बात सुन ले। तेरे बाप ने बहुत गुनाह किए। बहुत। पर तू गुनाह नहीं है। तू उसका बेटा है, पर उसका काम नहीं है।"
करण की आँखें भर आईं। वो कुछ कहना चाहता था, पर आवाज़ नहीं निकली। उसके होंठ काँपे। उसने अपने हाथ जोड़ लिए, जैसे कोई भिखारी दरवाज़े पर खड़ा हो।
"मैंने सोचा था," वो फटी आवाज़ में बोला, "कि तू मुझे गाँव से निकाल देगा। मैंने सोचा था कि तू कहेगा — तेरे बाप का नाम तेरे साथ चलेगा।"
"तेरे बाप का नाम तेरे साथ नहीं चलेगा," मैंने कहा। "तेरा नाम तेरे साथ चलेगा। और तेरा नाम तू खुद कमाएगा।"
मैंने अपने हाथ फैलाए।
करण एक पल रुका। फिर वो मेरी तरफ़ बढ़ा और मेरे गले लग गया। उसका शरीर काँप रहा था। मैंने उसके पीठ पर हाथ रखा। उसकी साँसें टूट रही थीं, और वो मेरे कंधे पर रो रहा था — पंद्रह साल का लड़का, जिसने अपने बाप को जेल में जाते देखा था, और जिसे अब अपना नाम खुद बनाना था।
मेरी आँखें भी भर आईं। मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"तेरे बाप ने बहुत गुनाह किए," मैंने धीरे से कहा, और मेरी आवाज़ सिर्फ़ उसके कान तक गई, "पर तू गुनाह नहीं है। सुन ले। तू गुनाह नहीं है।"
वो और ज़ोर से रोया। उसने मेरी कमर कसकर पकड़ ली, जैसे डर हो कि मैं कहीं हट न जाऊँ।
पीछे गाँव वालों में से किसी ने ताली बजाई। फिर एक और। फिर पूरा अखाड़ा तालियों से गूँज उठा। सुक्खी बुआ ने अपना पान का बीड़ा गिरा दिया और अपनी आँखें पोंछने लगीं। माँ ने अपना मुँह हाथों से ढक लिया। गुड़िया उछलने लगी।
रणवीर सिंह अपनी व्हीलचेयर पर बैठे सब देख रहे थे। उनकी आँखों में वो चमक लौट आई थी जो बीस साल से बुझी थी।
जब करण अलग हुआ, उसने अपनी आँखें साफ़ कीं और सीधा खड़ा हो गया। वो पंद्रह साल का था, पर उस वक़्त उसके कंधे किसी पहलवान के लग रहे थे।
"मैं अपने बाप का नाम नहीं," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब साफ़ थी, "अपने कर्म से नाम कमाऊँगा। और जिस दिन मैं इस अखाड़े में खड़ा होऊँगा, उस दिन मेरा नाम भवानी अखाड़े के तख़्ते पर लिखा होगा — अपने दम पर।"
मैंने उसका कंधा थपथपाया। "तो कल से कसरत शुरू।"
पीछे से टिंकू की आवाज़ आई। "अरे ये तो मेरी लाइन है!"
अखाड़े में हँसी फूट पड़ी। इस बार हँसी सच्ची थी।
फिर पंचायत बैठी। चबूतरे पर रणवीर सिंह को लाया गया। गाँव के बुज़ुर्ग आए। सुक्खी बुआ सबसे आगे बैठीं, जैसे उनका ही न्याय चल रहा हो।
रणवीर सिंह ने अपनी आवाज़ उतनी ऊँची की जितनी उनके फूलते फेफड़े दे सकते थे।
"आज से," उन्होंने कहा, "इस अखाड़े का नाम भवानी अखाड़ा होगा।"
गाँव वालों ने एक साथ सिर हिलाया।
"और आज से," रणवीर सिंह ने कहा, "इस अखाड़े का एक ही क़ानून है। सुन लो सब। कोई नशा नहीं। कोई शीशी नहीं। कोई ज़हर नहीं। सिर्फ़ मिट्टी और मेहनत। जो पानी पिएगा, वो उसी दिन अखाड़े से बाहर। जो किसी को पिलाएगा, वो उसी रात जेल में।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno