Spirit of a Fighter – Chapter 1290
"तूने सही किया," बूढ़ी औरत ने कहा। "अगर तू नहीं जलाती, तो वो हड्डियाँ भी मिट गई होतीं। और मुझे पता था कि तू उससे प्यार करती थी।"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा। कुछ देर वो चुप रहीं। फिर वो बूढ़ी औरत के हाथ पर सिर रखकर रो पड़ीं।
सुबह की धूप अखाड़े में फैल गई थी। पुराने पहलवान, जो रात वहीं रुके थे, दूर से देख रहे थे। कुछ औरतें चबूतरे से आ गईं थीं।
बूढ़ी औरत ने उठकर अखाड़े की दीवारों को देखा। फिर उसने एक पुरानी तस्वीर देखी — जो दीवार पर लगी थी, धूल से ढकी। वो उसके पास गई और उसने अपनी आस्तीन से उसे पोंछा। तस्वीर में एक नौजवान पहलवान था, मिट्टी में लिपटा, और उसके बगल में एक तेज़ नज़र वाली औरत खड़ी थी।
"ये मैं हूँ," उसने कहा। "और ये भवानी है। उसने ये तस्वीर लगवाई थी जब वो पहली बार जीता था। कहा था — माँ, मेरी जीत तेरी है।"
मैं उसके पीछे खड़ा था। मेरी आवाज़ नहीं निकल रही थी।
वो पलटी। उसने मेरी तरफ़ देखा। और फिर उसका चेहरा कुछ और हो गया — जैसे किसी ने उसके अंदर कुछ और खोल दिया हो। उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे खींचकर अपने पास किया।
"वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब धीमी थी, जैसे कोई बहुत गहरी बात कहने जा रहा हो। "तेरे बाप ने मरने से पहले मुझे एक नाम बताया था। जो आज तक किसी को नहीं पता।"
मेरे पेट में एक झटका लगा।
"कौन-सा नाम, दादी?"
वो मेरे कान के पास आई। मुझे उसकी साँस की गरमाहट फील हुई, और उसमें मिट्टी की गंध थी।
"भैरव का असली बाप," उसने फुसफुसाया।
मेरे हाथ अपने आप कस गए। मैंने उसकी तरफ़ देखा।
उसकी आँखें एकदम साफ़ थीं। उसमें धुँधलापन नहीं था। उसमें बीस साल का इंतज़ार था।
"वो नाम," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सूख रही थी, "वो क्या है?"
वो पलटकर कालू काका की तरफ़ देखी। उसने मेरा हाथ और कसकर पकड़ा।
"वो नाम," उसने कहा, "उसी आदमी का है जिसने मेरे बेटे की हड्डियाँ उस जगह भेजी हैं जहाँ से कोई ज़िंदा नहीं लौटता।"
अखाड़े की मिट्टी पर उस पल धूप धीमी पड़ गई, और मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"नाम क्या है, दादी?" मेरी आवाज़ किसी और की लग रही थी।
वो मेरे हाथ को और कसकर पकड़े रही। उसकी उँगलियाँ हड्डी जैसी पतली थीं, पर पकड़ में जान थी।
"पहले मुझे अखाड़े तक ले चल," उसने कहा। "मेरे भवानी की मिट्टी को छूने दे। फिर बताऊँगी।"
कालू काका आगे आए। "माँ जी, मैं आपको सहारा देता हूँ।"
"मुझे तेरा सहारा नहीं चाहिए," उसने कहा, पर फिर अपना हाथ उनकी तरफ़ बढ़ा दिया। "पकड़। पर ऐसे मत पकड़ना जैसे मैं बीमार हूँ। मैं बीमार नहीं हूँ। मैं बस थकी हूँ।"
कालू काका ने उनका हाथ थामा। धीरे-धीरे वो अखाड़े की तरफ़ बढ़ीं। उनके पैर नंगे थे। मिट्टी में उनके पंजों के निशान पड़ रहे थे, छोटे-छोटे। पुराने पहलवान जो दूर खड़े थे, अपने आप रास्ता छोड़ने लगे।
एक बूढ़ा पहलवान जिसका नाम बिशन था, आगे आया। उसकी मूँछें सफ़ेद थीं और कमर झुकी हुई थी। उसने दादी को देखा और उसके हाथ जुड़ गए।
"बाई जी," उसने कहा। "आप… आप ज़िंदा हैं?"
"तू अभी तक यहाँ है, बिशन?" दादी ने कहा। "तेरी कमर भी झुक गई। भवानी तुझे डंड पेलने से नहीं थकता था।"
बिशन की आँखें भर आईं। वो दादी के पैरों पर गिर पड़ा। "बाई जी, उस दिन मैं अखाड़े में था। मैंने देखा था सब। पर मैं कुछ नहीं कर पाया।"
दादी ने उसके सिर पर हाथ रखा। "उठ, बिशन। जो हुआ, सो हुआ। तूने कभी मेरे बेटे का साथ नहीं छोड़ा। बस यही काफ़ी है।"
वो आगे बढ़ीं। अखाड़े के बीच में एक जगह थी जहाँ मिट्टी सबसे गहरी और सबसे साफ़ थी। वहाँ भवानी कुश्ती से पहले अपने हाथ रगड़ता था। दादी वहीं रुकीं।
उन्होंने कालू काका का हाथ छोड़ा। फिर धीरे से घुटनों के बल बैठीं। उनकी हड्डियों की आवाज़ आई, पर वो रुकीं नहीं। उन्होंने अपनी हथेली मिट्टी पर रखी।
पूरा अखाड़ा चुप हो गया।
दादी ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ हिल रहे थे, कोई पुरानी दुआ पढ़ रहे थे या कोई पुरानी बात कह रहे थे। मिट्टी उनकी उँगलियों के बीच से फिसल रही थी। फिर उन्होंने आँखें खोलीं।
"मेरे भवानी की मिट्टी आज भी गरम है," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में कंपन नहीं था। "बीस साल हो गए, पर ये मिट्टी ठंडी नहीं हुई। जानती है क्यों?"
वो मेरी तरफ़ देखने लगीं।
"क्यों, दादी?"
"क्योंकि यहाँ हर पहलवान ने अपना पसीना डाला है और हर पसीने में भवानी का नाम है।" उसने मुट्ठी में मिट्टी भरी और मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "ले। इसे सूँघ।"
मैंने मिट्टी अपने हाथों में ली। उसमें लोहे की गंध थी और कुछ और भी — पसीने की खट्टी गंध, तेल की गंध, और कुछ जो मैं नहीं बता सकता था। पर जब मैंने उसे सूँघा, तो मेरी आँखें अपने आप भर आईं। मुझे कुछ याद नहीं आया। कोई चेहरा नहीं, कोई आवाज़ नहीं। बस एक एहसास आया — जैसे मैं कहीं घर लौट आया हूँ, जहाँ मैं कभी रहा ही नहीं।
मैं घुटनों के बल उनके पास बैठ गया और अपना सिर उनकी गोद में रख दिया। मैं रो रहा था। अखाड़े के सब लोग देख रहे थे, पर मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था।
दादी ने मेरे बालों में हाथ फेरा। उनकी हथेली में मिट्टी थी, जो मेरे सिर पर लग रही थी।
"तू भवानी जैसा नहीं दिखता," उन्होंने कहा। "भवानी का चेहरा चौड़ा था, तेरा पतला है। पर तेरी आँखें वही हैं। उसी तरह देखता था वो — जैसे दुनिया से कोई शिकायत लेकर आया हो और उसे कहीं दूर रखना चाहता हो।"
मैंने अपना सिर उठाया। "दादी, वो नाम…"
"अभी नहीं," उसने कहा। उसकी आवाज़ सख़्त हो गई। "पहले मुझे ये बता — तू मेरे बेटे की मौत का बदला लेगा?"
पूरा अखाड़ा साँस रोककर सुन रहा था।
"लेगा," मैंने कहा।
"कैसे? तेरे पास क्या है? तू ईंट ढोता है।"
उसकी बात में ताना नहीं था। सिर्फ़ सच था। और वो सच मेरे सीने में तीर की तरह लगा।
"मेरे पास भवानी का नाम है," मैंने कहा। "और उसका बेटा टिंकू। और ये अखाड़ा।"
दादी ने मेरी तरफ़ देखा। कुछ देर। फिर उनके होंठों पर एक मुश्किल मुस्कान आई।
"ये तो भवानी की बोली है," उन्होंने कहा। "वो भी यही कहता था — माँ, मेरे पास अपनी मिट्टी है और अपना नाम। बाक़ी सब अपने आप आ जाएगा।"
वो उठीं। कालू काका ने हाथ बढ़ाया, पर इस बार उन्होंने ख़ुद उठने की कोशिश की। वो थोड़ी लड़खड़ाईं, फिर सीधी खड़ी हो गईं। उन्होंने अपने कपड़ों पर लगी मिट्टी को नहीं झाड़ा। वो वैसे ही खड़ी रहीं, मिट्टी से भरी हुई।
फिर वो अखाड़े के बाहर की तरफ़ मुड़ीं। वहाँ एक पुराना तख़्ता लटका था, जिस पर अखाड़े का नाम खुदा था। उसके नीचे एक छोटी सी तस्वीर थी — भवानी की, कुश्ती जीतने के बाद, कमर पर हाथ रखे।
दादी उस तस्वीर के पास गईं और उसे देखने लगीं।
"इस तस्वीर में वो बीस साल का था," उन्होंने कहा। "उस दिन उसने मुझे फ़ोन किया था — गाँव के चौक पर एक दुकान से। कहा था, माँ, आज मैंने जीत लिया। और मैंने कहा, जीत तो तू रोज़ जीतता है। तो वो हँसा और बोला — आज वाली जीत अलग है माँ। आज मैंने अपने बाप को हराया है।"
मेरे कान खड़े हो गए। "अपने बाप को?"
दादी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मुझे ठंडा कर गया।
"भवानी के बाप ज़िंदा थे," उन्होंने कहा। "और वो अखाड़े में आते थे। रात में। चेहरा ढककर।"
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