Spirit of a Fighter – Chapter 1289
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वो गाना हवा में घुलकर आ रहा था, और मेरे पैर अपने आप नहर की तरफ़ मुड़ गए। माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"मत जा," माँ ने कहा। "अंधेरा है।"
"वो गा रही हैं," मैंने कहा। "दादी गा रही हैं।"
कालू काका मेरे पास आए। उन्होंने गाने की आवाज़ सुनी और उनका चेहरा वैसे ही हो गया जैसे भैरव का नाम सुनकर होता था।
"ये आवाज़ मैंने बीस साल पहले सुनी थी," उन्होंने धीरे से कहा। "उस रात। तहखाने में।"
मैं रुक गया। "कौन है वो, काका?"
कालू काका ने पलटकर माँ की तरफ़ देखा। फिर लिफ़ाफ़े की तरफ़, जो मेरे हाथ में था। उन्होंने लंबी साँस ली।
"भवानी की माँ," उन्होंने कहा। "जगदीश की भी माँ। अभी ज़िंदा है। गाँव के बाहर, पुराने पीपल के नीचे, एक झोपड़ी में। उसका दिमाग़ ठीक नहीं रहा, बीस साल से। कभी भवानी को ढूँढती है, कभी उसे भूल जाती है।"
मेरे हाथ से लिफ़ाफ़ा फिसलने लगा।
"तो फिर जगदीश… अपनी ही माँ के पास था? और उसने…"
"उसने अपनी माँ को कभी नहीं देखा," कालू काका ने कहा। "शर्म से। डर से। जो आदमी अपने भाई को मरवा दे, वो अपनी माँ के पास कैसे जाए?"
माँ ने मेरा कंधा पकड़ा। "वीर, सुन। वो बूढ़ी है। बीमार है। उससे कुछ मत पूछना।"
"मैं कुछ नहीं पूछूँगा, माँ," मैंने कहा। "मैं बस उसे देखना चाहता हूँ।"
मीरा मेरे पास आई। उसने मेरी तरफ़ देखा और बिना कुछ कहे मेरे साथ चलने लगी। टिंकू भी आया, हाथ में लालटेन। बलवंत सबसे पीछे था, और उसका चेहरा ऐसा था जैसे वो किसी अनजाने रिश्ते की तरफ़ बढ़ रहा हो।
हम गाँव के बाहर चले। रास्ते में नीम के पेड़ों की गंध आ रही थी, और उसके नीचे गीली मिट्टी की। पीपल का पेड़ दूर से दिखने लगा। उसके नीचे एक झोपड़ी थी, छोटी, टूटी, जिसकी छत पर पुआल बिखरा था।
दरवाज़े पर कोई ताला नहीं था। सिर्फ़ एक बाँस का पर्दा लटक रहा था, जो हवा में हिल रहा था।
गाना अब साफ़ सुनाई दे रहा था। कोई शब्द नहीं थे, सिर्फ़ एक धुन — धीमी, टूटी, जैसे कोई अपने आप से बात कर रहा हो।
मैंने पर्दा हटाया।
अंदर लालटेन की पीली रोशनी में एक बूढ़ी औरत बैठी थी। सफ़ेद बाल, बिखरे हुए, कंधों तक। चेहरे पर झुर्रियाँ इतनी गहरी कि जैसे मिट्टी सूखकर फट गई हो। आँखें धुँधली, पर उनमें कुछ था — कुछ जो बुझा नहीं था।
वो झूला झूल रही थी। बाँस का झूला, जो हर झोंके पर चरमराता था।
हम अंदर घुसे, और वो रुक गई।
उसने मेरी तरफ़ देखा। देर तक देखा। उसकी आँखों में पानी आ गया और उसके होंठ काँपने लगे।
"भवानी," उसने कहा। "तू आ गया।"
मेरे अंदर कुछ टूट गया। मैंने कभी अपने बाप को ज़िंदा नहीं देखा था। मैंने उनकी सिर्फ़ गंध पहचानी थी, काग़ज़ों में उनकी लिखाई पढ़ी थी। पर उस पल, इस बूढ़ी औरत की आँखों में, मैंने पहली बार भवानी को देखा — किसी और के दिल में ज़िंदा।
मैं उसके पैरों में बैठ गया। मेरे घुटने मिट्टी से लग गए।
"दादी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई। "मैं भवानी का बेटा हूँ। मैं वीर हूँ।"
वो चुप हो गई। फिर उसने धीरे से मेरा सिर छुआ। उसकी उँगलियाँ सूखी लकड़ी जैसी थीं, पर उनमें गरमाहट थी।
"मुझे पता था," उसने कहा। "तू आएगा। तेरे बाप ने कहा था — मेरा बेटा मेरी मिट्टी जैसा होगा। कभी नहीं मरेगा।"
वो मेरे बालों में हाथ फिराने लगी।
"तेरी आँखें उसकी जैसी हैं," उसने कहा। "मैंने बीस साल में किसी को नहीं देखा जो उसकी आँखें लिए हो।"
मैं उसके पैरों में पड़ा रोता रहा। मैंने कभी किसी के सामने ऐसे नहीं रोया था। पर उस पल मुझे लगा कि मैं बीस साल का बच्चा हूँ, और मुझे कोई ऐसा मिल गया है जो मेरे बाप को जानता था।
माँ पीछे खड़ी थीं। मैंने पलटकर देखा तो उनकी आँखों में भी पानी था।
"माँ," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी। "मैं… मैं सरस्वती हूँ। शेर सिंह की बीवी।"
बूढ़ी औरत ने माँ को देखा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर फिर माँ को।
"शेर सिंह," उसने धीरे से दोहराया। "वो… वो भी चला गया?"
माँ ने सिर हिलाया।
बूढ़ी औरत ने कोई आवाज़ नहीं की। उसने सिर्फ़ अपनी गोद में हाथ रखे और उसकी तरफ़ देखती रही।
फिर वो बोली, "ये गाँव मेरे बच्चे खा गया। एक भी नहीं छोड़ा।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। टिंकू ने लालटेन रखी और पलट गया। बलवंत दरवाज़े पर खड़ा था, और उसकी आँखें उस बूढ़ी औरत को देखकर नम हो गई थीं।
मैं उठा और उसका हाथ पकड़ा।
"दादी," मैंने कहा। "तू मेरे साथ चल। अखाड़े चल।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। "अखाड़ा?"
"हाँ। मिट्टी। तेरे भवानी की मिट्टी।"
कुछ देर वो चुप रही। फिर उसके होंठ हिले। "मिट्टी गरम है?"
"हाँ," मैंने कहा। "अभी भी गरम है।"
वो उठी। उसके पैर काँप रहे थे। बलवंत ने आगे बढ़कर उसका दूसरा हाथ पकड़ लिया। उसने बलवंत की तरफ़ देखा और कुछ कहा नहीं, पर उसकी पकड़ ढीली नहीं हुई।
हम उसे लेकर अखाड़े पहुँचे। सुबह की पहली किरण पूरब से आ रही थी, और अखाड़े की लाल मिट्टी पर पड़ रही थी। उस मिट्टी पर धूप का रंग ऐसा था जैसे किसी ने गरम गुड़ उड़ेल दिया हो।
वो दरवाज़े पर रुकी। उसने मिट्टी देखी। उसकी साँस रुक गई।
वो धीरे-धीरे आगे बढ़ी, और मेरा हाथ छोड़कर मिट्टी की तरफ़ बढ़ी। उसने घुटनों के बल बैठकर अपनी उँगलियाँ मिट्टी में डालीं। फिर उसने हथेली भर मिट्टी उठाई, उसे सूँघा, और अपने माथे पर लगा लिया।
"मेरे भवानी की मिट्टी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी। "आज भी गरम है।"
मेरी आँखों से आँसू बह निकले। मैं उसके पास बैठ गया और उसका माथा चूम लिया। उसने मेरा चेहरा दोनों हाथों में पकड़ा और देर तक देखती रही।
पीछे से कालू काका आए। वो उसके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
"माँ जी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में बीस साल की गलती थी।
बूढ़ी औरत ने उन्हें देखा। "कालू?" उसकी आँखों में कुछ पहचाना। "तू अभी ज़िंदा है?"
कालू काका की आँखें भर आईं। "मैं ज़िंदा हूँ, माँ जी। और मैंने बीस साल तुम्हारे बेटे को… भवानी को…"
"मुझे पता है," उसने कहा। "सब मुझे पता है। मैं पागल नहीं हूँ। मैं सिर्फ़ भूलना चाहती थी। पर भूल नहीं पाई।"
टिंकू आगे आया। उसके हाथ में मिठाई की डिब्बी थी। उसने झुककर उसे बूढ़ी औरत के सामने रख दिया।
"दादी," उसने कहा। "मैं टिंकू हूँ। भवानी का… भवानी का बेटा।"
बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ़ देखा। फिर उसने टिंकू का चेहरा दोनों हाथों से पकड़ा।
"तू भवानी का बेटा है?" उसने पूछा।
टिंकू ने सिर हिलाया। उसकी आँखें भर आईं।
बूढ़ी औरत ने उसे अपने सीने से लगा लिया। "तू तो बहुत दुबला है," उसने कहा। "भवानी भी दुबला था। पर उसकी हड्डियाँ लोहे की थीं।"
टिंकू हँसा, और उसकी हँसी में रोना था।
सरस्वती आईं और बूढ़ी औरत के पास बैठ गईं। उन्होंने उसके हाथ पकड़े। उनके हाथ अब भी काँप रहे थे, पर अब उनमें डर नहीं था।
"माँ," माँ ने कहा। "अब सब ठीक हो जाएगा।"
बूढ़ी औरत ने माँ की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ बदला।
"तूने भवानी की लाश जलाई थी," उसने कहा। यह आरोप नहीं था। यह सिर्फ़ एक बात थी, जो वो जानती थी।
माँ ने सिर नीचा कर लिया। "हाँ, माँ। मुझे डर था कि सबूत मिट जाएगा। मुझे नहीं पता था कि…"
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