Spirit of a Fighter – Chapter 1287
दादी वहाँ नहीं थी। दीया बुझा हुआ था। और मिट्टी पर, उस जगह जहाँ दादी बैठी थी, एक लाल रंग का कपड़ा पड़ा था — और उस कपड़े पर सूखा खून।
मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने वो कपड़ा उठाया और सूँघा।
गुड़ की चाशनी। कपूर। और ठाकुर महेंद्र सिंह के हाथ का तेल।
बलवंत ने मेरी तरफ़ देखा।
"वो यहाँ आया," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप रही थी। "वो दादी को ले गया।"
॥
वो कपड़ा मेरे हाथ में था और मेरी उँगलियाँ उसे भींच रही थीं। सूखा खून जम गया था, लाल भूरे रंग में बदल गया था। मैंने उसे फिर सूँघा। गुड़ की चाशनी, कपूर, और वो तेल — जो मैंने हवेली में पहली बार सूँघा था, जो ठाकुर महेंद्र सिंह की उँगलियों से आता है।
"कालू काका कहाँ हैं?" मैंने बलवंत से कहा।
बलवंत सीढ़ियों की तरफ़ देख चुका था। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"नीचे कोई नहीं है," उसने कहा। "दीया बुझा है। ज़मीन पर सिर्फ़ ये।"
मैंने सीढ़ियाँ दो-दो छोड़कर चढ़ीं और मैदान में आया। कालू काका आम के पेड़ के नीचे बैठे थे, दोनों हाथ घुटनों पर, सिर झुका हुआ। उनकी साँस तेज़ चल रही थी।
"काका," मैं दौड़कर उनके पास गया।
उन्होंने सिर उठाया। उनकी आँखें लाल थीं।
"मैं यहाँ सो रहा था," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी। "रात को। मैदान में। तीन आदमी आए। मुँह पर काला कपड़ा था। उन्होंने मुझे पेड़ से बाँध दिया। मैं कुछ नहीं कर सका।"
मैंने देखा — उनकी कलाइयों पर रस्सी के निशान थे।
"कौन था?" मैंने पूछा।
"एक लंगड़ा रहा," कालू काका ने कहा। "मैं उसकी चाल पहचानता हूँ। शेराज़। और दो और। पर मैंने सुना — एक आवाज़। बड़ी आवाज़। वो बोली, 'जल्दी करो, सुबह होने वाली है।'"
"वो ठाकुर था," बलवंत ने कहा।
"हाँ," कालू काका ने कहा और उनकी आवाज़ फिर टूटी। "वो बूढ़ी माँ को उठाकर ले गए। वो रोई। वो बोली — 'वीर, वीर!'"
मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसक गई।
"और तुम कुछ नहीं कर सके?" बलवंत ने कहा, और उसकी आवाज़ में गुस्सा था।
कालू काका ने अपना हाथ उठाया। उस हाथ में रस्सी के निशान थे।
"मैं सत्तर साल का हूँ, बेटा," उन्होंने कहा। "मेरी कमर में दर्द है। मेरी आँखों में धुँधलापन है। पर मैंने अपनी पूरी ताकत लगाई। एक गुर्गा गिरा भी। पर फिर ठाकुर ने मेरे सिर पर कुछ मारा।"
मैंने उनका सिर देखा। बालों के नीचे सूजन थी।
"काका," मैंने धीरे से कहा।
"मुझे माफ़ कर दे," कालू काका ने कहा, और उनकी आँखों से पानी बहने लगा। "मैं तेरे बाप को बचा नहीं सका। बीस साल पहले। और आज मैं तेरी दादी को भी नहीं बचा सका।"
मैं उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
"काका," मैंने कहा। "तुमने बीस साल मेरी मिट्टी सींची है। तुमने मुझे अखाड़ा दिया। तुमने मेरे बाप की मिट्टी मेरे हाथ में रखी। तुमने कुछ गलत नहीं किया।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ बदला।
"वो आदमी हार नहीं मानता," उन्होंने कहा। "मैंने उसे बीस साल देखा है। जब वो हारता है, तो वो और गहरा वार करता है। जब उसका जाल टूटता है, तो वो जाल जलाता है। वो भागेगा नहीं। वो यहाँ आएगा।"
बलवंत ने मेरी तरफ़ देखा। "हम उसे ढूँढेंगे। गाँव में। नहर के पास। हर जगह।"
मैंने सिर हिलाया। "नहीं," मैंने कहा।
"क्या?" बलवंत ने कहा।
"वो भागा नहीं है," मैंने कहा। "डरपोक आदमी भागता है। ठाकुर डरपोक नहीं है। वो ज़िद्दी है। वो मेरी दादी को इसलिए ले गया ताकि मैं उसे ढूँढने जाऊँ। वो चाहता है कि मैं उसकी शर्त पर आऊँ। पर वो जानता है कि मैं नहीं आऊँगा। इसलिए वो खुद आएगा।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा, और धीरे से मुस्कुराए। "तू अपने बाप की तरह सोचता है," उन्होंने कहा।
मैंने चारों तरफ़ देखा। अखाड़ा खाली था और सुबह की धूप मिट्टी पर फैल रही थी।
"हम इंतज़ार करेंगे," मैंने कहा। "और तैयारी करेंगे।"
वो पूरा दिन लंबा था।
हमने अखाड़े में पानी के बर्तन भर दिए। कालू काका ने कुएँ से बाल्टियाँ भर-भरकर लाकर रखीं। टिंकू दुकान से आया और उसने अपनी सारी मिठाई की डिब्बियाँ अखाड़े में रख दीं — किसी ने पूछा क्यों, तो उसने कहा "मुझे नहीं पता, पर वीर ने कहा तैयार रहो, तो मैं तैयार हूँ।"
मीरा आई। उसके बाल बँधे थे और उसके हाथ में एक छोटी पोटली थी। "पट्टियाँ हैं," उसने कहा। "और कुछ दवा।"
"तुम्हें कैसे पता चला?" मैंने पूछा।
उसने मेरी तरफ़ देखा। "कालू काका ने गुड़िया को गाँव भेजकर खबर भिजवाई।" फिर वो ज़रा रुकी। "और मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ती।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो मिट्टी में खड़ी थी, कुर्ता-सलवार, कंधे पर बैग, हाथों में पोटली। और मुझे लगा कि मैंने ज़िंदगी में इससे सुंदर कुछ नहीं देखा।
"तुम्हें यहाँ नहीं रुकना चाहिए," मैंने कहा।
"सबूत के बिना आरोप नहीं," उसने कहा, "और आरोप के बिना चुप्पी नहीं। ये मेरी लड़ाई भी है, वीर सिंह। मेरे पिता के पैर उसी आदमी ने लिए।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
शाम को रणवीर सिंह आए। उनकी व्हीलचेयर गाँव के रास्ते से आ रही थी और उनके पीछे चार आदमी थे — पुराने पहलवान, जिनके बाल सफ़ेद थे पर कंधे अब भी चौड़े थे।
"मैंने सुना," रणवीर सिंह ने कहा। "बूढ़ी माँ को ठाकुर ले गया।"
"हाँ," मैंने कहा।
"तो ये लड़ाई तेरी अकेले की नहीं," उन्होंने कहा और अपने पीछे वालों की तरफ़ इशारा किया। "ये वो लड़के हैं जिनके साथी भैरव के पानी से मरे। इनके बच्चे भूखे रह गए। इन्होंने बीस साल चुप्पी सही है। आज नहीं सहेंगे।"
उनमें से एक बूढ़ा आगे आया। उसके हाथ में लाठी थी और उसकी आँखों में पानी।
"मेरा बेटा," उसने कहा। "उसका नाम चंदर था। वो पहलवान बनना चाहता था। सत्रह साल का था। भैरव ने उसे पानी दिया। छह महीने में वो चलने लायक नहीं रहा।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसका हाथ काँप रहा था।
"आज वो ठाकुर आएगा," मैंने कहा। "और आज हम उसे रोकेंगे।"
रात आई।
अखाड़े में मशालें जलाई गईं। मिट्टी लाल दिख रही थी, और हवा में गुड़ की चाशनी की गंध नहीं थी, बस धुएँ की और मिट्टी की गंध थी। मैंने अपनी धोती पहनी। मेरे हाथ साफ़ थे। मैंने मिट्टी को हाथ में उठाया और उसे अपने माथे पर लगाया।
"बाप," मैंने धीरे से कहा। "आज मैं तेरे सामने खड़ा हूँ।"
मीरा मेरे पास खड़ी थी। उसने कुछ नहीं कहा। उसने बस मेरा हाथ पकड़ा और फिर छोड़ दिया।
रात के लगभग दस बजे होंगे, तभी अखाड़े के फाटक पर आवाज़ आई।
एक आदमी अकेला आया। उसके हाथ में मशाल थी और उसका चेहरा मशाल की रोशनी में दिख रहा था — ठाकुर महेंद्र सिंह। उसके कपड़े मैले थे और उसकी आँखों में एक अजीब चमक थी।
वो मैदान के बीच आया और रुका।
"वीर सिंह!" वो चिल्लाया। उसकी आवाज़ अखाड़े की दीवारों से टकराकर लौटी। "मैं तेरे बाप की तरह मरूँगा नहीं। मैं ये अखाड़ा जलाऊँगा!"
मैं उसके सामने आया। मेरे पीछे बलवंत था, टिंकू था, मीरा थी, कालू काका थे, रणवीर सिंह व्हीलचेयर पर थे।
"तू जलाएगा?" मैंने कहा। "तूने हवेली जलाई। तूने भट्ठा जलाया। तूने मेरी दादी को उठाया। और अब तू ये जलाएगा?"
"हाँ!" ठाकुर ने कहा। "क्योंकि ये अखाड़ा मेरे बाप का था। मेरे भाई का था। तेरे बाप ने इसे मुझसे छीना।"
"मेरे बाप ने कुछ नहीं छीना," मैंने कहा। "तूने खुद अपने हाथ गंदे किए।"
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