Spirit of a Fighter – Chapter 1286
उसने डिबिया मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"ये मेरी जीत की मिट्टी है," उसने कहा। "हारने की नहीं।"
मैंने डिबिया ली। मिट्टी को उँगलियों में उठाया। उसमें वो गंध थी जो मैंने कभी नहीं सूँघी थी — पसीना, धूल, और कुछ और। कुछ जो पुरानी चीज़ों में होता है।
"दादी," मैंने कहा। "एक सवाल और। माँ ने कहा कि उस रात तू तहखाने में थी। भवानी की मौत वाली रात। तूने क्या देखा?"
दादी की आँखें बंद हो गईं। एक लंबी साँस ली। फिर खोलीं।
"मैंने देखा कि मेरा बेटा ज़मीन पर पड़ा है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ और था — वो आवाज़ जो सिर्फ़ उस माँ के पास होती है जिसने अपने बेटे को मरते देखा हो। "और उसके सिरहाने खड़ा था जगदीश। और जगदीश के हाथ में थी वो पीली शीशी। और जगदीश रो रहा था — रो रहा था, वीर। अपने भाई के ऊपर रो रहा था, और शीशी अपनी जेब में रख रहा था।"
"तूने उसे रोका नहीं?"
"मैंने उसका हाथ पकड़ा," दादी ने कहा। "और उसने मुझे धकेल दिया। मैं सीढ़ियों से गिरी और मेरी कमर टूट गई। मैं यहाँ पड़ी रही। बाहर भीड़ थी, आग थी, और मैं यहाँ पड़ी रही। सुबह उठी तो भवानी की लाश जल चुकी थी और तेरी माँ ने उसकी हड्डियाँ सँभाल ली थीं।"
मैंने आँखें बंद कर लीं। तहखाने में सन्नाटा था। दीये की लौ चटक रही थी।
"फिर तू बाहर क्यों नहीं आई?"
"क्योंकि मैं जानती थी कि जगदीश मेरे पीछे आएगा," दादी ने कहा। "और मुझे उस मिट्टी को बचाना था। मैं यहाँ रही, कालू मुझे खाना लाता रहा, और मैं इंतज़ार करती रही।"
"किसका?"
"तेरा," उसने कहा, और उसकी आँखों से आँसू गिरे — सूखे चेहरे पर गीली लकीर। "मैं जानती थी कि भवानी का बेटा एक दिन आएगा। और जब तू आया, मैंने दीवार पर हाथ रखा और सोचा — आ गया।"
उसने अपना हाथ बढ़ाया और मेरे सिर पर रखा। उसकी हथेली हल्की थी, पंख जैसी।
"तू मेरे बेटे जैसा दिखता है," उसने कहा।
मेरी आँखें भर आईं। मैंने उसका हाथ पकड़ा और अपने माथे से लगाया।
मैं ऊपर आया तो सूरज निकल रहा था। बलवंत सीढ़ी के मुँह पर खड़ा था और उसका चेहरा पीला था।
"क्या हुआ?" उसने पूछा।
"दादी ज़िंदा है," मैंने कहा। "और वो सब जानती है।"
बलवंत ने कोई सवाल नहीं पूछा। उसने मेरी आँखों में देखा और उसका सिर झुक गया।
"चल," मैंने कहा। "पहले जेल। भैरव से एक बात कहनी है।"
थाने के पीछे वो कमरा था जहाँ कैदियों से मिलना होता था। लोहे की जाली, एक बेंच, और ऊपर एक छोटी खिड़की से आती रोशनी।
भैरव जंज़ीरों में बैठा था। दाढ़ी बढ़ी हुई, आँखें धँसी हुईं, और उसके हाथों की उँगलियाँ पतली हो गई थीं। उसकी कलाई पर पट्टी बँधी थी। उसने मुझे देखा और उठा — धीरे-धीरे, जैसे शरीर बोझ से भरा हो।
"आ गया," उसने कहा। आवाज़ कर्कश थी।
मैं खड़ा रहा। कुछ नहीं बोला।
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा और फिर उसने अपना सिर झुकाया। वो झुका, जंज़ीर खनकी, और उसकी आवाज़ आई, "मैंने बीस साल में जितने घर उजाड़े, उनकी कोई माफ़ी नहीं है। पर एक बात कहूँ — तूने मुझे हराया नहीं। मेरी ही मिट्टी ने मुझे हराया। वो मिट्टी जिसमें मैंने ज़हर घोला, उसी ने मेरे पैर खींचे।"
मैं चुप खड़ा रहा।
"तू सोचता है तू बड़ा पहलवान है?" उसने कहा, और उसकी आँखों में वो पुरानी चमक लौटी — थोड़ी देर के लिए। "तू मिट्टी से आया है और मिट्टी में जाएगा। फर्क सिर्फ़ यह है कि मैंने मिट्टी से बैर किया और तूने नहीं।"
"ये तेरी माफ़ी नहीं है," मैंने कहा। "ये तेरा हिसाब है। और माफ़ी मैं नहीं दूँगा। माफ़ी वो माँएँ देंगी जिनके बेटे नहीं लौटे। तेरे पास जाकर कोई नहीं आएगा, भैरव। क्योंकि तेरे हाथ में जो था, वो तूने बेच दिया।"
भैरव चुप हो गया। उसकी आँखों में पानी आया — और वो पानी सूखी आँखों से बहता हुआ उसकी दाढ़ी में गिरा।
"करण कैसा है?" उसने धीरे से पूछा।
"वो अब अखाड़े में आता है," मैंने कहा। "तेरे नाम से नहीं, अपने काम से। वो मिट्टी सींचता है। कालू काका के साथ। और वो अच्छा पहलवान बन रहा है।"
भैरव ने सिर झुकाया और रोया। उसके कंधे हिल रहे थे और जंज़ीर हर हिचकी पर खनक रही थी।
मैंने अपनी जेब से वो डिबिया निकाली — वो जो दादी ने दी थी, नहीं, वो नहीं — एक और डिबिया, जो मैंने रास्ते में अखाड़े से भरी थी। उसे जाली के नीचे रख दिया।
"ये तेरी मिट्टी है," मैंने कहा। "अखाड़े की। इसे सूँघता रह। शायद तेरी नींद लौट आए।"
भैरव ने डिबिया की तरफ़ देखा और उसके हाथ काँपने लगे।
मैं पलटा।
"वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूटी हुई थी। "मैंने तेरे बाप को मारा। उसने मुझे माफ़ किया। पर मैं खुद को माफ़ नहीं कर सका। बीस साल। बीस साल मैं उसकी आवाज़ सुनता रहा।"
मैं रुका। पलटा नहीं।
"मैं तुझे माफ़ नहीं करता," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ साफ़ थी, ठंडी नहीं, बस साफ़। "पर मैं तेरे बेटे को अपने साथ रखूँगा। वो मेरा भाई है। और मैं उसे तेरी मिट्टी में नहीं खड़ा होने दूँगा। वो अपनी मिट्टी में खड़ा होगा।"
भैरव ने कुछ नहीं कहा।
मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। पीछे से सिर्फ़ जंज़ीर की आवाज़ आई — जैसे किसी ने अपना सिर दीवार से टिका लिया हो।
बाहर आकर मैंने दरवाज़ा बंद किया। सूरज पूरा निकल आया था और आँगन में धूप फैल रही थी।
इंस्पेक्टर शर्मा बाहर खड़े थे, हाथ में फ़ाइल। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"मिल लिया?" उन्होंने पूछा।
"हाँ," मैंने कहा।
मैं कुछ कदम चला। फिर रुका।
"इंस्पेक्टर साहब," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो सवाल था जो सुबह से मेरे सीने में अटका था। "ठाकुर महेंद्र सिंह कहाँ है?"
इंस्पेक्टर शर्मा ने फ़ाइल खोली, उसमें देखा, फिर बंद कर दी। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में वो बात थी जो कोई पुलिस वाला तब देखता है जब कुछ बहुत गलत हो गया हो।
"वो कल रात जेल से भाग गया," उन्होंने कहा।
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"भाग गया?" मैंने कहा। "पर वो तो पकड़ा गया था। चबूतरे पर। सबके सामने।"
"हाँ," इंस्पेक्टर ने कहा। "पर रात में उसके खाने के साथ कोई चीज़ गई। दो सिपाही बेहोश मिले। और सुबह उसकी कोठरी खाली थी।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। बलवंत दरवाज़े पर खड़ा था और उसने सब सुन लिया था। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"वो कहाँ जाएगा?" बलवंत ने कहा।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। उसमें वो पीतल की डिबिया थी, और उसके नीचे — कुछ और। मैंने निकाला। एक काग़ज़ का टुकड़ा, मुड़ा हुआ, जिस पर मेरा नाम लिखा था। मेरे हाथ काँपे। मैंने खोला।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, और वो लाइन मैंने कभी नहीं लिखी थी, पर मैं उसे पहचानता था — वो लिखाई जो चबूतरे पर मेरी जेब में रखी गई थी।
«तहखाने में जो मिला, वो तेरा नहीं है। वो मेरा है। और मैं उसे लेने आ रहा हूँ।»
नीचे तारीख़ थी — आज की।
मैंने बलवंत की तरफ़ देखा।
"वो तहखाने में है," मैंने कहा।
बलवंत ने मेरा हाथ पकड़ा। "तो चल।"
हम भागे। थाने से अखाड़े तक की सड़क खाली थी और धूप तेज़ हो रही थी। मेरे फेफड़े जल रहे थे पर मैं रुका नहीं।
अखाड़े का फाटक खुला था। कालू काका वहाँ नहीं थे। मिट्टी पर पैरों के निशान थे — ताज़े, कीचड़ वाले।
मैं सीढ़ी की तरफ़ दौड़ा।
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