Spirit of a Fighter – Chapter 1284
"सिर्फ़ क्या?" मैंने कहा।
"सिर्फ़ एक चिट्ठी थी," उसने कहा। "तेरे नाम की। तेरे बाप ने मेरे मरने से पहले ये चिट्ठी लिखी थी। मैंने उसे बीस साल नहीं पढ़ा। मैं डरता था कि कहीं उसमें मेरी माँ का नाम न हो।"
मैंने डिबिया खोली। अंदर एक छोटा काग़ज़ था, मोड़ा हुआ, पीला पड़ा हुआ। मैंने उसे खोला।
लिखाई भवानी की थी। मैंने उसे पहचाना — वही लिखाई जो डायरी में थी। पढ़ते हुए मेरे हाथ काँपने लगे।
«वीर, बेटा।
अगर तू ये पढ़ रहा है तो मैं नहीं हूँ। ये चिट्ठी मैंने उस आदमी के लिए लिखी है जो मुझे मारेगा, पर उसे तू पढ़ेगा।
मैं जानता हूँ तुझे मेरी गंध याद नहीं होगी, तू छोटा था। पर मैं चाहता हूँ तू एक बात जाने — मैंने तुझे अपने हाथों से मिट्टी में लेटाया था, उस रात, जब तू पैदा हुआ। और मैंने तेरे कान में कहा था, 'ये मिट्टी तेरी है।'
वो मिट्टी आज भी अखाड़े में है, बेटा। वो तुझे कभी नहीं छोड़ेगी।
तेरा बाप।»
मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ लिया। मेरी आँखों के आगे अंधेरा सा आ गया और मुझे अपने घुटनों पर झुकना पड़ा।
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो पहले नहीं था — शायद शर्म।
"मैंने उसे बहुत बार पढ़ा," उसने धीरे से कहा। "बीस साल में। और हर बार लगा कि वो मुझे ही लिखी है। कि वो मुझे माफ़ कर रहा है। पर वो तुझे लिखी थी। हमेशा तुझे ही लिखी थी।"
मैंने सिर उठाया।
"तूने मेरे बाप को मारा," मैंने कहा। "तूने मेरी माँ को बीस साल डर में रखा। तूने सत्रह पहलवानों को ज़हर दिया। तेरे पास माफ़ी माँगने का हक़ नहीं है।"
"मैं माफ़ी नहीं माँग रहा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो गरमी आई जो अखाड़े में थी। "मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि इस डिबिया में और भी कुछ है। उसके नीचे एक और काग़ज़ है। और वो काग़ज़ तेरे बाप का नहीं है — वो मेरा है।"
मैंने डिबिया को पलटा। नीचे, हल्के से चिपका हुआ, एक और काग़ज़ था। मैंने उसे निकाला। उस पर कांपती लिखाई थी, अधूरे अक्षर, जैसे किसी ने मरते-मरते लिखा हो।
«मैं विक्रम हूँ। भवानी सिंह का शिष्य। मुझे उसने अखाड़े से निकाल दिया था। मैंने उसका बदला लिया।
पर आज, इस चारपाई पर, मुझे लगता है कि मैंने जो किया, वो बदला नहीं था। वो सिर्फ़ ज़हर था।
अगर कोई इसे पढ़े, तो ये बताना कि भैरव सिंह नाम का आदमी मरते वक़्त भी डरा हुआ था। सिर्फ़ एक बात का डर — कि उसका बेटा उसे माफ़ नहीं करेगा।»
मैंने काग़ज़ को मोड़कर अपनी जेब में रखा। मैंने भैरव की तरफ़ देखा। उसने अपना सिर नीचे कर लिया था।
"तेरा बेटा करण," मैंने कहा, "अभी भी तुझे अपना बाप मानता है। वो तेरे पास आना चाहता है। पर वो डरता है।"
भैरव ने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था, और उसने उसे पोंछा नहीं।
"मैं उसके लायक नहीं हूँ," उसने कहा।
"सही बोला," मैंने कहा। "पर वो तेरा बेटा है। और बेटे बाप के लायक होने का इंतज़ार नहीं करते। वो बस आते हैं।"
मैं पलटा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
"वीर सिंह," भैरव ने पीछे से कहा।
मैं रुका, पर पलटा नहीं।
"तेरे बाप ने मुझे कभी नहीं मारा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "उस रात, जब मैंने उसके पानी में ज़हर डाला, वो जानता था। उसने पी लिया। और पीने से पहले उसने मेरी तरफ़ देखा और कहा — 'विक्रम, तू बेटा बनके रह सकता था, पर तूने दुश्मन बनना चुना। मैं तुझे माफ़ करता हूँ।' वो मुझे माफ़ करके मरा। और मैं बीस साल उसकी माफ़ी का बोझ ढो रहा हूँ। ये सज़ा है, वीर। मेरी सबसे बड़ी सज़ा यही है।"
मैंने दरवाज़ा खोला। बाहर की हवा ठंडी थी और उसमें अखाड़े की मिट्टी की गंध थी।
"वो माफ़ी तेरे लिए नहीं थी," मैंने कहा, बिना पलटे। "वो माफ़ी उसने खुद को दी थी, ताकि वो मरते वक़्त भी साफ़ रहे। तेरा बोझ तेरा है, भैरव। इसे कोई नहीं उतारेगा।"
मैं बाहर आया। बलवंत फाटक पर खड़ा था, और उसके पीछे टिंकू और मीरा। बलवंत ने मेरी तरफ़ देखा और उसने कुछ नहीं पूछा, बस मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"चल," उसने कहा। "घर चलें।"
हम चले। रास्ते में मीरा ने मेरी जेब से वो काग़ज़ निकाला — भवानी की चिट्ठी — और उसे चाँदनी में खोलकर पढ़ा। उसकी आँखें भर आईं, और उसने काग़ज़ को मोड़कर वापस मेरी जेब में रख दिया।
"तेरे बाप ने तुझे मिट्टी में लेटाया था," उसने कहा।
"हाँ," मैंने कहा।
"तो कल तहखाने में जब हम जाएँगे," उसने कहा, "मैं तेरे साथ मिट्टी में बैठूँगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। चाँदनी में उसका चेहरा साफ़ था, और उसकी आँखों में वो यकीन था जो किसी चीज़ से नहीं हिलता।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर मिट्टी ठंडी है।"
"मुझे ठंड लगती है," उसने कहा। "इसीलिए तुझे साथ रखूँगी।"
टिंकू ने पीछे से खाँसा। "मैं भी आऊँगा," उसने कहा। "पर मैं मिट्टी में नहीं बैठूँगा। मैं ऊपर खीर बनाऊँगा। तहखाने से निकलकर तुम दोनों को गरम खीर मिलेगी।"
बलवंत हँसा। "तू हर जगह खीर ले आता है।"
"खीर ही मेरी पहचान है," टिंकू ने कहा।
हम आँगन में पहुँचे। माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ में दीया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और मेरे चेहरे से सब पढ़ लिया। उन्होंने कुछ नहीं पूछा, बस दीया मेरे हाथ में दिया और अंदर चली गईं।
मैंने दीया उठाया और आँगन की मिट्टी को देखा। अखाड़े की दीवार पर वो बूढ़ी औरत के हाथ का निशान अभी भी था — ताज़ा, गीला।
मैंने दीया उसकी तरफ़ किया। निशान चमक उठा, और उसके नीचे, मिट्टी में उँगली से लिखा हुआ कुछ दिखा।
मैं झुका और पढ़ा।
«कल सुबह, सूरज निकलने से पहले। तहखाने की सीढ़ी पर। अकेला आ। — दादी»
मैंने पलटकर देखा। आँगन खाली था। बलवंत मेरे पीछे खड़ा था और उसने भी वो लिखा हुआ पढ़ लिया था।
"अकेला?" उसने कहा।
मैंने दीया नीचे रखा और अपनी जेब से भवानी की चिट्ठी निकाली। मैंने उसे एक बार फिर पढ़ा — «ये मिट्टी तेरी है।»
फिर मैंने बलवंत की तरफ़ देखा।
"वो अकेला आने को कह रही है," मैंने कहा। "पर मैं अकेला नहीं जाऊँगा।"
"मुझे पता था," बलवंत ने कहा।
"तुझे कैसे पता?"
"क्योंकि तू मेरा भाई है," उसने कहा। "और भाई अकेले नहीं जाते।"
॥
"तो फिर तय रहा," बलवंत ने कहा और उसने मेरे कंधे से हाथ नहीं हटाया। "सूरज निकलने से पहले। तहखाने की सीढ़ी पर।"
"तू बाहर रुकेगा," मैंने कहा।
"मैं बाहर नहीं रुकूँगा।"
"बलवंत —"
"वीर," उसने मेरी बात काटी, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो अब मैं पहचानने लगा था। "मैं बीस साल भैरव का बेटा बनकर रहा। उसने मुझे अपना नाम दिया, अपना खाना दिया, अपनी मिट्टी में खड़ा किया। और मैं उसी आदमी के लिए लड़ता रहा जिसने मेरे बाप को मारा। अब जब मैं अपने बाप के तहखाने में पहली बार जाऊँगा, तो मैं अकेला नहीं जाऊँगा। और तुझे भी अकेले नहीं जाने दूँगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं और उनकी आँखें हम दोनों पर थीं। गुड़िया माँ की कमर से चिपकी थी और उसकी उँगली मुँह में थी।
"माँ," मैंने कहा। "तू क्या कहती है?"
माँ ने दीये की लौ को हवा से बचाया और धीरे से बोलीं, "मैं कहती हूँ कि दादी ने 'अकेला' लिखा है, तो वो तेरे साथ कोई बात करना चाहती है। पर तेरा भाई तेरे पीछे-पीछे चलेगा, दूर से, और ये मेरी शर्त है।"
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