Spirit of a Fighter – Chapter 1281
मैं उसकी तरफ़ देखता रहा। फिर मैंने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया और रोया। धीरे-धीरे, बिना आवाज़। मेरे कंधे हिल रहे थे और मेरी साँस टूट रही थी।
मीरा ने मेरे सिर पर हाथ रखा और उसे सहलाया। उसने कुछ नहीं कहा। उसकी साँसें शांत थीं और उसका हाथ स्थिर था।
हम देर तक वैसे ही बैठे रहे। अखाड़े की मिट्टी मेरे नीचे ठंडी हो रही थी। दूर कहीं मुर्गे ने बाँग दी।
मैंने अपना सिर उठाया। मेरी आँखें सूजी हुई थीं, पर मेरे अंदर कुछ हल्का था।
"मुझे भूख लगी है," मैंने कहा।
मीरा हँसी। "तू अभी-अभी रो रहा था और अब भूख?"
"रोने से भूख लगती है। तुझे नहीं पता?"
"मुझे नहीं पता था," उसने कहा। "मैं तो आयुर्वेद पढ़ती हूँ, इसमें ये नहीं लिखा है।"
हम दोनों हँसे। और फिर फाटक पर दस्तक हुई।
मैं उठा और फाटक खोला। बाहर टिंकू खड़ा था, हाथ में एक थाली और उस पर एक कटोरी, और कटोरी से भाप उठ रही थी।
"खीर," उसने कहा, और उसके चेहरे पर वो मुस्कान थी जो हर मुश्किल में आ जाती थी। "मैंने सोचा, तू आज कुछ खाया नहीं होगा। माँ सो गई थी, तो मैंने चुपके से चूल्हा जलाया। एक कटोरी तेरे लिए, एक मेरे लिए।"
"और मेरे लिए?" मीरा ने कहा।
टिंकू ने अपना सिर खुजाया। "अरे, मैडम, मुझे पता नहीं था तुम भी हो। एक कटोरी में दोनों को दे दो।"
"नहीं," मैंने कहा। "मैं अपनी पूरी कटोरी खाऊँगा। तू अपनी दे दे।"
"अरे भाई, मैंने दो घंटे मेहनत से बनाई है।"
"और मैंने बीस साल इंतज़ार किया है।"
टिंकू मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने अपनी कटोरी मीरा की तरफ़ बढ़ा दी और कहा, "ले मैडम, तू खा। ये आदमी आज बहुत नखरे कर रहा है।"
मैं हँसा और बैठ गया। मैंने खीर का पहला निवाला मुँह में डाला। वो गरम थी और मीठी थी और उसमें इलायची की गंध थी।
"टिंकू," मैंने कहा, "आज से तू मेरी मिट्टी में खीर नहीं, मिठाई बनाएगा।"
"क्या?"
"सुन। मेरा पहला मुकाबला है — भारत केसरी। उसके बाद मैं जीतूँ या हारूँ, मेरे लिए ये अखाड़ा सब कुछ है। और तू मेरा भाई है। तो तेरी मिठाई उसी अखाड़े में बँटेगी।"
टिंकू का चेहरा भर आया। उसने अपना मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया और अपनी आँखें रगड़ने लगा।
"अरे, तू तो रोने लगा," मीरा ने कहा।
"नहीं रो रहा," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ भारी थी। "बस आँख में खीर का दाना चला गया।"
दूर, अखाड़े की दीवार पर एक परछाई हिली। मैंने अपना सिर उठाया। माँ और गुड़िया वहाँ खड़ी थीं। गुड़िया के हाथ में एक लालटेन थी और माँ के हाथ में एक छोटी डिब्बी।
माँ अंदर आईं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें मेरी आँखों से मिलीं।
"तेरे होंठ फिर हँसे हैं," उन्होंने कहा। "बहुत दिनों बाद।"
"माँ, तू सोई नहीं?"
"कैसे सोती?" उन्होंने कहा। "मेरा बेटा अखाड़े में अकेला बैठा था।"
गुड़िया दौड़कर मेरे पास आई और मेरी गोद में बैठ गई। "भैया," उसने कहा, "मैंने सुना है तेरा मुकाबला है। मैं जाऊँगी।"
"तू स्कूल जाएगी।"
"स्कूल कल भी रहेगा," गुड़िया ने कहा। "पर भैया का मुकाबला रोज़ नहीं होता।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। माँ ने वो डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"ये क्या है, माँ?"
"पीतल की चूड़ी," उन्होंने कहा। "तेरी दादी की। उसने उस रात मुझे दी थी — भवानी की मौत के बाद। कहा था कि ये तेरे बेटे के हाथ में डाल देना जिस दिन वो पहलवान बने।"
मैंने डिब्बी खोली। अंदर एक पुरानी पीतल की चूड़ी थी, जिस पर हरे रंग की हल्की नक्काशी थी।
"माँ," मैंने कहा, "दादी कहाँ हो सकती है?"
माँ ने अपना सिर हिलाया। "मुझे नहीं पता, बेटा। पर एक बात है — वो इस गाँव में है। मैं उसे महसूस कर सकती हूँ।"
"कैसे?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "क्योंकि मैंने उसकी आवाज़ तेरी आवाज़ में सुनी है, वीर। आज तूने जिस तरह कहा कि 'मैं लौटूँगा' — वो उसकी आवाज़ का ढंग था। बिलकुल उसकी तरह।"
मैं चुप हो गया। मैंने अपनी मुट्ठी में मिट्टी और चूड़ी दोनों पकड़ लीं।
तभी अखाड़े के फाटक पर ज़ोर से दस्तक हुई। तीन बार। ज़ोर से। इतनी ज़ोर से कि माँ की आँखें फैल गईं।
मैं उठा। टिंकू ने अपने हाथ में खाली कटोरी उठा ली, जैसे वो हथियार हो। मीरा अपने बैग में हाथ डालकर खड़ी हो गई।
"कौन है?" मैंने पूछा।
बाहर से आवाज़ आई। आवाज़ भारी थी, पर जवान। और उसमें वो थकान थी जो सिर्फ़ लंबे सफ़र की होती है।
"वीर सिंह," आवाज़ ने कहा, "मैं बलवंत हूँ।"
मैंने फाटक खोला।
बाहर बलवंत खड़ा था। उसने अपने कपड़े बदल लिए थे — अब वो अखाड़े की वर्दी में नहीं था। सादा सफ़ेद कुर्ता और धोती पहने था, और उसके कंधे पर एक छोटी पोटली थी। उसके हाथों में कोई हथियार नहीं था। उसके हाथ खाली थे और वो खुले थे — मेरी तरफ़ फैले हुए।
"मैं तेरा भाई हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ भारी थी, जैसे वो शब्द उसके गले से निकलने में डर रहे थे। "भवानी का बेटा। और मैं तेरे साथ अखाड़े में उतरना चाहता हूँ — तेरे खिलाफ़ नहीं, तेरे साथ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो आग नहीं थी जो पहले थी। उसकी आँखों में पानी था। और उसके हाथ अभी भी फैले हुए थे।
मैंने अपने पीछे मुड़कर देखा। माँ खड़ी थीं और उनकी आँखों से पानी बह रहा था। गुड़िया मेरी बगल में आ गई और उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"भैया," गुड़िया ने धीरे से कहा, "ये वही है जो तेरे साथ लड़ा था?"
"हाँ," मैंने कहा।
"तो इसे अंदर बुला," गुड़िया ने कहा। "अगर ये तेरा भाई है, तो इसे भी खीर मिलनी चाहिए।"
टिंकू ने कटोरी देखी। "अरे, खीर तो खत्म हो गई।"
"तो फिर बना," गुड़िया ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो माँ से आई थी। "आज हमारे घर में एक और भाई आया है। खीर बनेगी।"
मैं हँसा। फिर मैंने अपनी मुट्ठी खोली जिसमें मिट्टी थी और अपना हाथ बलवंत की तरफ़ बढ़ाया।
"अंदर आ," मैंने कहा। "अभी अखाड़े की मिट्टी गरम है। इसे पहले हम दोनों मिलकर छुएँगे, फिर बात करेंगे।"
बलवंत ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी हथेली पर छाले थे। उसने मिट्टी को अपनी हथेली में लिया और उसे सूंघा, जैसे मैं सूंघता हूँ। और उसकी आँखें भर आईं।
"ये भवानी की मिट्टी है," उसने धीरे से कहा। "मैंने इसे बहुत साल पहले सूंघा था। जब मैं छोटा था और वो मुझे अपने कंधे पर बैठाते थे।"
मैंने उसे अंदर खींच लिया और फाटक बंद कर दिया। पीछे से माँ की आवाज़ आई।
"बलवंत," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी, "तू जानता है तेरी माँ कहाँ है?"
बलवंत ने अपना सिर झुकाया। "मुझे नहीं पता, मौसी। पर मैं ढूँढूँगा। आज से मैं वीर के साथ हूँ। जो उसका है, वो मेरा है। और जो मेरा है, वो उसका।"
माँ ने अपने आँचल से अपना चेहरा पोंछा।
"तो फिर सुनो," उन्होंने कहा, "आज रात कोई नहीं सोएगा। आज रात हम तय करेंगे कि तहखाने में क्या है और उसे कैसे खोलना है।"
मैंने अखाड़े की मिट्टी पर पैर रखा। मेरे नीचे मिट्टी ठंडी थी, पर उसमें वो जान थी जो सिर्फ़ मुझे महसूस होती थी।
और मैंने अपनी मुट्ठी में मिट्टी को भींच लिया।
"कल," मैंने कहा, "जब सूरज निकलेगा, हम तहखाने में जाएँगे। और जो भी वहाँ है — चाहे मेरी दादी हो, चाहे भवानी की आख़िरी चीज़ — वो आज बाहर आएगा।"
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