Spirit of a Fighter – Chapter 1280
"बेटा," उन्होंने कहा, "मैं तुझे एक बात बताना चाहता हूँ। आज से बीस साल पहले, उस रात, जब मैंने वो आवाज़ सुनी थी — मैं सीढ़ियों पर था। और मैंने उस औरत को देखा नहीं था। बस उसकी आवाज़ सुनी थी। पर उस आवाज़ में एक बात थी जो मुझे आज तक चुभती है। वो कह रही थी — 'भवानी, तू मर गया, पर तेरी चीज़ मेरे पास है। और मैं इसे तेरे बेटे को नहीं दूँगी।'"
"पर क्यों, काका?" मेरी आवाज़ फट गई। "मैं उसका पोता हूँ। वो मेरी दादी है। वो मुझे क्यों नहीं देना चाहती थी?"
कालू काका ने अपनी आँखें मींच लीं। "शायद वो चीज़ ऐसी थी जिससे वो तुझे बचाना चाहती थी। या शायद वो खुद उस चीज़ से डरती थी।"
रात का अंधेरा गहरा हो रहा था। चबूतरे पर अब सिर्फ़ तीन-चार लोग बचे थे। सुक्खी बुआ अपने आँचल से अपना चेहरा पोंछ रही थीं, और उनके हाथ में पान का बीड़ा अब भी था, जो उन्होंने इस पूरी हलचल में नहीं खाया था।
इंस्पेक्टर शर्मा मेरे पास आए। उन्होंने अपनी टोपी उतारी और उसे हाथ में लेकर खड़े रहे।
"वीर सिंह," उन्होंने कहा, "मैंने जगदीश सिंह को ले जाने का हुक्म दे दिया है। गाड़ी आधे घंटे में आ जाएगी। पर एक बात — तुम्हारी माँ ने जो कहा, वो अदालत में गवाही बनेगा। और तुम्हारी दादी… अगर वो ज़िंदा है, तो उसका बयान सबसे ज़रूरी है। तुम्हें उसे ढूँढना होगा।"
"मैं ढूँढूँगा, सर," मैंने कहा।
इंस्पेक्टर शर्मा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें थकी थीं, पर उनमें वो बात थी जो पुलिस वालों की आँखों में कभी-कभी आ जाती है — इंसानियत।
"तुम्हारे पिता भवानी सिंह के बारे में मैंने बहुत सुना है," उन्होंने कहा। "मैं उन दिनों यहाँ तैनात नहीं था, पर मेरे सीनियर ने बताया था कि उनकी मौत का केस बंद कर दिया गया था — 'प्राकृतिक मौत' लिखकर। मुझे आज भी वो फ़ाइल याद है। उस पर जिस आदमी के दस्तखत थे, वो आज जगदीश सिंह के साथ गाड़ी में बैठा है।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ। "मतलब वो फ़ाइल…"
"वो फ़ाइल भी सबूत है," इंस्पेक्टर शर्मा ने कहा। "मैं उसे निकलवा रहा हूँ।"
वो चले गए। टिंकू मेरे पास आया और उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो हल्कापन था जो मुश्किल वक़्त में भी उसे छोड़ता नहीं, "तू आज कुछ ज़्यादा ही चुप हो गया है। मुझे डर लग रहा है। तू कुछ सोच रहा है ना?"
"टिंकू," मैंने कहा, "तेरे पास मिठाई है?"
"क्या?"
"मिठाई। खीर। कुछ भी।"
टिंकू ने अपना सिर खुजाया। फिर उसका चेहरा खिला।
"अरे, मेरी दुकान में तो आज कुछ नहीं बचा। सुबह सब बाँट दिया था। पर रुक, मेरे पास एक डिब्बा है जो मैंने किसी खास दिन के लिए बचा रखा था। लड्डू हैं — बीस दिन पुराने, पर अभी भी खराब नहीं हुए। जब से मैंने घी कम करके शक्कर बढ़ा दी है, वो लंबे चलते हैं।"
मैं हँसा। सच में हँसा। और वो हँसी अजीब थी — जैसे बीस साल का जमा हुआ पानी किसी बाँध के टूटने से बह निकला हो।
"तो ला," मैंने कहा। "हम सब मिलकर खाएँगे। माँ, गुड़िया, कालू काका, सुक्खी बुआ, और तू भी।"
टिंकू दौड़कर गया। मैं मुड़ा और माँ की तरफ़ देखा।
"माँ," मैंने कहा, "आज रात मुझे कुछ करना है। अकेले। तू मना मत करना।"
माँ ने मेरी आँखों में देखा। फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और उस पर अपना माथा रख दिया।
"मैं नहीं मना करूँगी," उन्होंने कहा। "बस वापस आ जाना। मेरे पास सिर्फ़ तू है और गुड़िया। अगर तू भी…"
"मैं लौटूँगा," मैंने कहा।
गुड़िया मेरी बगल में आ गई और उसने मेरी उँगली पकड़ ली। उसकी उँगलियाँ छोटी थीं, पर पकड़ कसी हुई।
"भैया," उसने कहा, "मैंने आज सुना कि दादी ज़िंदा है। तो अब हमारे घर में एक औरत बढ़ेगी?"
मैं हँसा। "लगता है हाँ।"
"तो फिर," गुड़िया ने सोचकर कहा, "अपनी दादी से मैं चक्की पर बैठकर कहानी सुनूँगी। माँ हमेशा कहती है कि दादी की कहानियाँ सबसे अच्छी थीं।"
माँ ने गुड़िया के सिर पर हाथ रखा और कुछ नहीं बोलीं। पर उनकी आँखों में पानी था।
रात करीब दस बजे गाँव सोने लगा। मैंने टिंकू से कहा कि वो माँ और गुड़िया को घर छोड़ आए और वहीं रुक जाए। मैंने मीरा को इशारा किया और हम दोनों अखाड़े की तरफ़ चल पड़े।
अखाड़े का फाटक खुला था। हम अंदर गए और मैंने फाटक बंद कर दिया। चारों तरफ़ चुप्पी थी। सिर्फ़ झींगुरों की आवाज़ और दूर कहीं कुत्ते के भौंकने की आवाज़।
अखाड़े की मिट्टी चाँदनी में चमक रही थी। लाल मिट्टी अब भी गीली थी, और उस पर पैरों के निशान थे — किसी के दौड़ने के, किसी के गिरने के।
मैं मिट्टी के बीच में बैठ गया। मेरे घुटनों में दर्द था। मेरी पीठ में वो थकान थी जो हड्डियों तक उतर गई हो।
मीरा मेरे पास आकर बैठ गई। उसके हाथ में एक छोटी डिबिया थी — पीतल की, ढक्कन वाली।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"वो मिट्टी," उसने कहा। "जो तेरे पापा ने तहखाने में छोड़ी थी। कालू काका ने मुझे दी थी। कहा था कि इसे वीर को देना।"
उसने डिबिया मेरी तरफ़ बढ़ाई। मैंने ढक्कन खोला। अंदर काली-भूरी मिट्टी थी, जो अखाड़े की लाल मिट्टी से बिलकुल अलग थी। इसकी गंध भारी थी — जैसे बारिश के बाद खोदी गई ज़मीन।
मैंने उसे अपनी हथेली पर डाला। मिट्टी ठंडी थी। मैंने उसे सूंघा।
और मेरी साँस रुक गई।
उसमें भवानी की गंध थी। उसके पसीने की गंध — वो गंध जो मैंने अखाड़े की दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीर में सिर्फ़ एक बार सूंघी थी, जब कालू काका ने मुझे वो तस्वीर दिखाई थी।
पर उसके साथ एक और गंध थी। दूध की गंध। गरम दूध, जो उबलकर ऊपर आ रहा हो।
और अचानक मेरे सामने एक तस्वीर बन गई। मैं तीन-चार साल का था। मैं किसी की गोद में था। बड़े हाथ मेरी कमर पर थे। मेरे सामने एक चेहरा था — मूँछों वाला, चौड़ा, जिसकी आँखों में हँसी थी। वो मुझे ऊपर उठा रहा था और कह रहा था — "मेरा शेर, मेरा वीर।"
मैंने अपनी आँखें खोलीं और मेरी आँखों से पानी बह रहा था। मैंने उसे पोंछा नहीं।
"वीर?" मीरा ने धीरे से कहा।
"मुझे याद आया," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ टूट रही थी। "मुझे वो याद आया। मैं उसे भूल गया था। बीस साल में मैं अपने बाप का चेहरा भूल गया था। और आज ये मिट्टी…"
मेरी आवाज़ रुक गई। मैंने मिट्टी अपनी मुट्ठी में भींच ली। मेरे हाथ काँप रहे थे।
"वो मुझे गोद में लेता था," मैंने कहा। "वो मुझे शेर बुलाता था। और मैं… मैं ये सब भूल गया था। मैंने उसकी कब्र भी नहीं देखी। मैंने उसके लिए एक आँसू भी नहीं बहाया। मैं बस काम करता रहा, ईंटें ढोता रहा, और सोचता रहा कि मेरा बाप मर गया।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने मेरा हाथ पकड़ा और उसे धीरे से खोला। मिट्टी मेरी हथेली पर फैली हुई थी।
फिर उसने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा। उसकी हथेली गरम थी।
"ये मिट्टी अब तेरी है," उसने कहा। "और मैं भी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। चाँदनी में उसका चेहरा साफ़ था। उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो पहले दिन थी, जब उसने मुझे मिट्टी से बाहर धकेला था। पर उसके साथ कुछ और भी था — वो नरमी जो उसने कभी किसी को नहीं दिखाई थी।
"मीरा," मैंने कहा, "मैं तुझे क्या दूँगा? मेरे पास कुछ नहीं है। न घर, न पैसा, न नाम।"
"तू मूर्ख है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में हल्की झिड़की थी। "मैंने तुझसे कभी कुछ माँगा है? मैंने तुझसे ये माँगा था कि तू सच बोले? कि तू अपने बाप के लिए लड़े? तू लड़ा। बस।"
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