Spirit of a Fighter – Chapter 1279
मीरा मेरे पीछे आई। मैंने उसकी साँस सुनी — वो चार कदम पीछे रुकी थी, फिर आगे आई। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसके हाथ की गंध में तुलसी और अदरक था, और मुझे उस पल में ऐसा लगा कि मैं साँस ले सकता हूँ।
इंस्पेक्टर शर्मा ने आगे आकर जगदीश की बाँह पकड़ी और उसे उठाया। जगदीश ने अपना चेहरा पोंछा, पर उसकी आँखें अब भी भरी थीं। वो मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने अपनी जेब से कुछ निकाला — एक छोटी पीतल की डिबिया, मैली और घिसी हुई।
"ये मैंने बीस साल अपनी जेब में रखी है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ रुकी-रुकी थी। "इसके अंदर तेरे बाप की आख़िरी साँस है — मिट्टी की तरह सूखी, पर मैंने इसे नहीं फेंका। मुझे नहीं पता क्यों। शायद इसलिए कि मैं उसे अपने साथ लिए घूमना चाहता था।"
मैंने डिबिया नहीं ली। मैंने इंस्पेक्टर शर्मा की तरफ़ देखा।
"साहब," मैंने कहा, "ये सबूत है। इसे अपने साथ रखिए।"
शर्मा ने रुमाल से डिबिया पकड़ी और उसे एक शीशे के थैली में रख लिया। जगदीश ने एक लंबी साँस ली, जैसे कई सालों बाद।
शर्मा उसे गाड़ी तक ले गए। पूरा रामपुर देख रहा था — सुक्खी बुआ, रमेश चाचा, गोकुल, चंदा, और वे सब पहलवान जो कभी इसी अखाड़े में घुटने टेकते थे। मैंने चंदा की तरफ़ देखा। वो अपने पिता को देख रही थी और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — गुस्सा भी नहीं, सिर्फ़ एक अकेलापन। मैंने अपना सिर नीचे कर लिया।
गाड़ी का दरवाज़ा खुला। जगदीश एक कदम चढ़ा, फिर रुक गया। उसने अपना सिर घुमाया। पूरा चबूतरा फिर सन्न हो गया।
"वीर," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब बहुत धीमी थी, पर मैंने उसे साफ़ सुना। "तेरे बाप की एक आख़िरी बात मैंने छुपाई थी। मैं उसे कभी नहीं बताता, पर आज… आज मुझे लग रहा है कि अगर मैंने ये नहीं कहा, तो मैंने जो आज किया, वो अधूरा रहेगा।"
मैंने अपना सिर ऊपर किया।
"वो मरते वक़्त तेरे लिए नहीं कह रहा था," जगदीश ने कहा। उसकी आँखें मेरी आँखों में थीं। "वो अपने मुँह में मिट्टी डालने के लिए कह रहा था — ज़रा-सी। जैसे हम अखाड़े में पहली बार उतरते वक़्त मुँह में डालते हैं। उसने कहा — 'मेरी मिट्टी इसे दे देना।' फिर उसने कहा — 'अगर ये बड़ा हो और अखाड़े में आए, तो इसके मुँह में भी डाल देना। और अगर ये न आए, तो इसे मत बताना कि मैंने कभी ये कहा था।'"
मेरे घुटने काँपने लगे। मैंने अपना हाथ मिट्टी पर टिकाया। मेरी आँखों में पानी आ गया, और मैंने उसे पोंछा नहीं।
"अब जा," जगदीश ने कहा, और उसकी आवाज़ फिर टूट गई। "वो मिट्टी तेरे बाप ने तेरे लिए बचाई थी। उसे मुझ पर मत बरबाद कर।"
गाड़ी चल पड़ी। उसके पहियों की आवाज़ दूर होती गई, और चबूतरे पर लोग धीरे-धीरे बोलने लगे — पहले फुसफुसाहट, फिर आवाज़ें।
टिंकू मेरे पास आया। उसने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। उसका हाथ काँप रहा था, पर वो हटा नहीं।
"भाई," उसने धीरे से कहा, "ये मिट्टी वाली बात… मैंने कभी सुनी नहीं थी।"
"मैंने भी नहीं," मैंने कहा।
कालू काका मेरे दूसरी तरफ़ आए। उन्होंने अपने हाथ मेरे सिर पर रखे। उनकी हथेली में अखाड़े की मिट्टी की गंध थी — वही गंध जो मैं बचपन से सूंघता आया था।
"मिट्टी झूठ नहीं बोलती, बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो पुरानी सी बात थी जो उन्होंने पहले भी कही थी, पर इस बार वो मुझे नई लगी। "आज मिट्टी ने अपना हिसाब रख लिया। तेरे बाप का हिसाब। और तेरा हिसाब अभी बाकी है।"
"क्या बाकी है, काका?"
कालू काका ने अपना सिर उठाया और उनकी आँखें उस गाड़ी की तरफ़ देखने लगीं जो अब दूर नीम के पेड़ के पास पहुँच रही थी।
"वो चीज़," उन्होंने कहा, "जो जगदीश ने कहा — तहखाने में अभी भी बाकी है। वो चीज़ जिसके लिए बीस साल तक इतने लोग मरे। मुझे डर है, बेटा, कि जो अब तक खुला है, वो सिर्फ़ बाहरी कपड़ा है। असली चीज़ तहखाने में है।"
माँ मेरे पास आईं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे उठाया। उनके हाथ ठंडे थे, पर उनकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो सिर्फ़ माँ के पास होती है।
"कालू भाई," माँ ने कहा, "तू मुझे सच बता। उस तहखाने में क्या है? तू जानता है। तू बीस साल से जानता है।"
कालू काका ने नीचे ज़मीन देखी। उनकी सफ़ेद दाढ़ी हिली। फिर उन्होंने अपना सिर उठाया और उनकी आँखों में पानी था।
"सरस्वती," उन्होंने कहा, "मैंने बीस साल उस तहखाने में जाने से डर के मारे मना किया। पर एक बात मैंने कभी किसी को नहीं बताई। भवानी की मौत वाली रात, मैंने वहाँ से एक आवाज़ सुनी थी — जो आवाज़ आज भी मेरे कानों में बजती है। वो आवाज़ किसी मरने वाले की नहीं थी। वो किसी ज़िंदा की थी।"
मेरी साँस रुक गई।
"कौन?" मैंने पूछा। "कौन था वहाँ, काका?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर था जो बीस साल से सोया नहीं था।
"मैंने उस रात एक औरत की आवाज़ सुनी थी," उन्होंने धीरे से कहा। "वो कह रही थी — 'भवानी, तू मर गया, पर तेरी चीज़ मेरे पास है। और मैं इसे तेरे बेटे को नहीं दूँगी।'"
चबूतरे पर हवा फिर रुक गई। मैंने अपना हाथ माँ की पकड़ से छुड़ाया और उनकी तरफ़ देखा।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी, "वो औरत कौन थी?"
माँ का चेहरा सफ़ेद था। उन्होंने मेरी आँखों में देखा और उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उन्होंने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा और मेरे कान के पास झुककर, इतना धीरे कहा कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ —
"वो औरत तेरी दादी थी, वीर। तेरे बाप की माँ। जिसे सबने बीस साल पहले मरा हुआ मान लिया था।"
दूर नीम के पेड़ के नीचे बैलगाड़ी की घंटी फिर बजी। और इस बार मैंने उस आवाज़ में कुछ सुना — जैसे कोई मुझे अपने नाम से बुला रहा हो।
॥
घंटी की आवाज़ दूर हो गई, पर मेरे कानों में वो नाम बजता रहा — दादी।
मैं चबूतरे पर खड़ा था, और मेरे चारों तरफ़ लोग धीरे-धीरे बिखरने लगे थे। कोई अपनी चप्पल उठा रहा था, कोई बच्चे को गोद में ले रहा था, कोई मुँह दबाकर बात कर रहा था। पर हर आदमी एक बार मुड़कर मेरी तरफ़ ज़रूर देख रहा था। उनकी नज़र में वो बात थी जो मैं खुद नहीं समझ पा रहा था।
माँ मेरे पास खड़ी थीं, और उनका हाथ अब भी मेरे कंधे पर था। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत।
"माँ," मैंने कहा, "तू अभी तक चुप क्यों रही?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो थकान थी जो सिर्फ़ बीस साल की चुप्पी से आती है।
"क्योंकि मैं खुद उसे मरी हुई मान चुकी थी, बेटा," उन्होंने कहा। "उस रात के बाद मैंने उसे नहीं देखा। न उसकी लाश मिली, न उसका नाम। बस एक आवाज़ सुनी थी और बस। फिर मैंने सोच लिया कि सब खत्म हो गया।"
"पर वो ज़िंदा है?"
माँ ने अपना सिर हिलाया। "अगर आज तहखाने में जो आवाज़ कालू भाई ने सुनी थी, वो सच है, तो वो ज़िंदा है। और अगर वो ज़िंदा है, तो उसने बीस साल मुझसे कुछ छिपाया है, वीर। मुझसे। अपनी बहू से।"
मैंने आँखें बंद कर लीं। नीम के पेड़ के नीचे बैलगाड़ी अब दिखती नहीं थी। बस धूल का एक हल्का बादल हवा में लटक रहा था, जो धीरे-धीरे पतला हो रहा था।
कालू काका ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
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