Spirit of a Fighter – Chapter 1278
"हाँ," उसने कहा। "और तू मेरे सामने खड़ा था, और तूने मुझे नहीं पहचाना। मैं तुझे देख रहा था और सोच रहा था — ये वही बच्चा है जिसे मैंने बीस साल पहले उस रात आँगन में रोते देखा था। तेरी माँ तुझे छाती से लगाए बैठी थी। और मैं दरवाज़े के बाहर खड़ा था।"
मेरी मुट्ठी कस गई। मैंने एक कदम आगे रखा, पर माँ ने मेरी कलाई पकड़ ली।
"रुक, बेटा," माँ ने धीरे से कहा। उनकी आवाज़ में वो कंपन था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना था।
जगदीश ने माँ की तरफ़ देखा और उसके चेहरे पर कुछ बदला।
"सरस्वती," उसने कहा, "तू आज भी वैसी ही है। जब मैं पहली बार तुझे देखने आया था, तब भी तू ऐसे ही चुप खड़ी थी। भवानी ने कहा था — 'ये मेरी होने वाली है।' और तूने उस वक़्त मेरी तरफ़ देखा भी नहीं था।"
"क्योंकि मैं तुझे देखना नहीं चाहती थी," माँ ने कहा। उनका हाथ मेरी कलाई पर और कस गया। "और आज भी नहीं चाहती।"
चबूतरे पर खड़े लोगों में से कोई फुसफुसाया। सुक्खी बुआ ने अपना मुँह अपने दुपट्टे से ढक लिया, पर उनकी आँखें चमक रही थीं — वो बात पकड़ रही थीं जो सबसे बड़ी थी।
जगदीश ने अपना सिर ऊपर किया। वो अब भी उसी आवाज़ में बोल रहा था, पर उस आवाज़ में पहली बार कुछ नरमी आ गई थी — जैसे कोई पुरानी रस्सी ढीली पड़ रही हो।
"मैंने बीस साल तक भैरव को तेरे बाप के खिलाफ़ भड़काया," उसने कहा। "मैंने उसे बताया कि भवानी ने उसे अखाड़े से निकाल दिया है, कि भवानी उससे बड़ा पहलवान नहीं बनने देना चाहता। और भैरव मान गया, क्योंकि वो बेचारा भूखा था — भूखा अपनी माँ की गोद से निकले बच्चे की तरह। मैंने उसके हाथ में वो पानी पकड़ाया जो उमर खा जाता है, और मैंने उससे कहा — 'पिला दे, भैरव। ये तेरे बाप का अखाड़ा है, तेरे बाप की मिट्टी है। जो तेरे सामने आए, उसे गिरा दे।'"
रमेश चाचा ने बीच में से आवाज़ दी, "तो तूने भवानी को खुद मारा?"
जगदीश ने रमेश चाचा की तरफ़ देखा और धीरे से हँसा।
"नहीं," उसने कहा। "मैंने अपने हाथ से नहीं मारा। मैंने उसे अपनी आँखों के सामने मरते देखा, और मैं चुप खड़ा रहा। ये ज़्यादा बड़ी बात है, रमेश। मैंने उसे बचाया नहीं। मेरा भाई तहखाने में तड़प रहा था और मैं दरवाज़े के बाहर खड़ा था। और मैंने आग लगवाई — उस हवेली में, जिसमें मैं बड़ा हुआ था। मैंने अपनी भाभी को उसी आग में जलने के लिए छोड़ दिया और अपनी भतीजी को —"
वो रुका। उसकी आवाज़ पहली बार टूटी। उसने अपना हाथ उठाया और उसे फिर नीचे गिरा दिया।
"मैंने बच्ची को नहीं बचाया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब फुसफुसाहट थी। "वो मेरा खून थी, और मैंने उसे उसी आग में छोड़ दिया। और बीस साल तक मैंने खुद को ये समझाया कि मैंने ये सब अखाड़े के लिए किया। अखाड़े के लिए।" उसने अपना सिर हिलाया। "अखाड़ा किसी का होता है, वीर? मिट्टी किसी की होती है?"
मैंने अपना हाथ माँ की पकड़ से छुड़ाया। मैं उसके सामने जाकर खड़ा हो गया। मेरे और उसके बीच अब सिर्फ़ एक हाथ का फ़ासला था। मेरी साँस तेज़ चल रही थी और मेरे हाथों की उँगलियाँ कस गई थीं — इसलिए नहीं कि मैं उसे मारना चाहता था, बल्कि इसलिए कि अगर मैंने उसे नहीं कसा होता, तो मेरे हाथ काँपने लगते।
"तू मेरे बाप का भाई था," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी, पर चबूतरे के आख़िरी कोने तक पहुँच रही थी। "तूने अपने ही भाई को क्यों मारा?"
जगदीश ने मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखों में वो ठंडक आज भी थी, पर उसके पीछे कुछ और भी था — जैसे कुएँ के तल में एक सिक्का पड़ा हो।
"क्योंकि भवानी ने अखाड़ा मुझे नहीं दिया," उसने कहा। "मैं बड़ा था। मेरा हक़ था। मेरे बाप ने मुझे सिखाया था — जो बड़ा है, वो अखाड़े का मालिक। पर भवानी ने एक दिन मेरे सामने मिट्टी में पैर रखा और कहा — 'जगदीश, तू अखाड़े का नहीं है। तू बाहर का है। तेरे हाथ में ताकत है, पर तेरे दिल में मिट्टी नहीं है।' और सबने उसे पूजा। सबने। मेरे बाप ने भी। मेरे गुरु ने भी। मैं उनका बेटा था, वीर। बड़ा बेटा। और मैं दरवाज़े के बाहर खड़ा रह गया।"
"तो तूने उसे मार दिया?" मैंने पूछा। "तूने अपनी भाभी को जलने दिया? तूने अपनी भतीजी को — उसकी माँ को —"
"मैंने खुद को समझाया कि ये सब अखाड़े के लिए है," जगदीश ने कहा, और उसकी आवाज़ फिर से टूटी। "बीस साल तक मैंने खुद को यही बोला। पर आज, इस चबूतरे पर, जब मैंने तेरी माँ को देखा — मुझे याद आया कि उस रात मैंने किस चीज़ की तरफ़ हाथ बढ़ाया था और फिर पीछे खींच लिया था।"
वो अपने घुटनों पर बैठ गया। चबूतरे पर सन्नाटा था। किसी ने कुछ नहीं कहा।
रणवीर सिंह अपनी व्हीलचेयर से आगे आए। उनके पहियों की आवाज़ उस चुप्पी में बहुत तेज़ लगी। उन्होंने जगदीश की तरफ़ देखा और उनका चेहरा कठोर था।
"अखाड़ा जागीर नहीं होता, जगदीश," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ में वो गरज थी जो पहलवानों की आवाज़ में होती है — धीमी, पर ज़मीन हिला देने वाली। "अखाड़ा बाप का नहीं होता। वो मिट्टी उसकी होती है जो उसमें पसीना डालता है। भवानी ने तुझे अखाड़ा इसलिए नहीं दिया क्योंकि तूने कभी उस मिट्टी से बैर नहीं छोड़ा। तूने उससे पूछा नहीं, तूने उसे बेचना चाहा। और जो मिट्टी को बेचता है, वो मिट्टी का नहीं होता, वो खुद बिक जाता है।"
जगदीश ने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में पहली बार कुछ चमका — जैसे बरसों से बंद कमरे में रोशनी आई हो।
"मैं जानता हूँ," उसने कहा। "मैं ये सब जानता हूँ, रणवीर। पर जानने से क्या होता है? मैं अब भी यही हूँ।"
मैं उसके सामने खड़ा था। मेरे अंदर कुछ था जो मुझे उसके गले पर हाथ रखने को कह रहा था — उसी गले पर जिसने मेरे बाप की साँस रोकी थी। पर मैंने अपना हाथ नहीं उठाया।
क्योंकि मुझे मेरे बाप की आवाज़ याद आई। वो आवाज़ नहीं जो उन्होंने आख़िरी रात कही थी, बल्कि वो आवाज़ जो कालू काका ने बताई थी — जब भवानी मरते वक़्त कालू काका की तरफ़ हाथ बढ़ा रहे थे। वो हाथ किसी को बचाने के लिए बढ़ा था। गिराने के लिए नहीं।
मैं धीरे से नीचे बैठ गया। मेरे घुटने मिट्टी से सने थे। मैंने अपना हाथ उसके पैरों पर रखा — उसके धूल भरे पैरों पर, जिनमें अब भी वो बड़ी हड्डियाँ थीं जो भवानी की तस्वीर में दिखती थीं।
"चाचा," मैंने कहा।
वो झटके से मेरी तरफ़ देखने लगा। मैंने उसकी आँखों में देखा और मेरी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़।
"मैं तुझे माफ़ नहीं करूँगा," मैंने कहा। "आज नहीं, कल नहीं, कभी नहीं। तूने मेरे बाप को छीना और मैं उस चीज़ को अपने सीने में लिए जीऊँगा जो तूने मेरे हाथ में दी है।"
उसकी आँखें भर आईं।
"पर मैं तेरे लिए दुआ करूँगा," मैंने कहा। "हर रात। क्योंकि मेरे बाप ने तुझे कभी गाली नहीं दी। मैंने उनकी डायरी पढ़ी है। वो तुझे अपना भाई कहते थे। वो कहते थे — 'जगदीश बड़ा है, उसे समझाना पड़ेगा।' वो तुझे माफ़ करने की बात करते थे, चाचा। और मैं उनका बेटा हूँ, मैं उनके शब्दों से बाहर नहीं जा सकता।"
जगदीश ने अपना चेहरा अपनी हथेलियों में छुपा लिया। और फिर वो रोया। चबूतरे पर, सैकड़ों लोगों के सामने, बीस साल की गुस्से वाली आग उसकी आँखों से निकली और वो रोता रहा। उसके कंधे हिल रहे थे और उसकी साँस टूट रही थी। मैं उसके पास बैठा रहा। मेरा हाथ उसके पैरों पर था। मैंने अपना हाथ नहीं हटाया।
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