Spirit of a Fighter – Chapter 1277
दूर नीम के पेड़ के नीचे से एक बैलगाड़ी गुज़री। उसकी घंटी की आवाज़ आई — धीरे, दूर से, जैसे कोई पुरानी याद खटखटा रही हो।
इंस्पेक्टर शर्मा ने जगदीश की कलाई पर हथकड़ी कस दी। दूसरी हथकड़ी उन्होंने उसके दूसरे हाथ पर लगाई। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"वीर सिंह," उन्होंने कहा, "तूने जो काग़ज़ दिए, वो काफ़ी हैं। पर एक बात पूछूँ?"
"पूछिए, सर।"
"तेरे पास और सबूत हैं? ऐसा कुछ, जो इस आदमी को हमेशा के लिए अंदर कर दे?"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। उसमें भवानी का ख़त था, माँ की चिट्ठी थी, और एक टूटा काँच का टुकड़ा था — वो जो मैंने तहखाने में उठाया था। मैंने इंस्पेक्टर शर्मा को सब दिया।
"इससे बढ़कर," मैंने कहा, "मेरे पास एक गवाह है।"
"कौन?"
मैंने चबूतरे के कोने की तरफ़ देखा। वहाँ, एक पुराने पीपल के पेड़ के नीचे, कालू काका खड़े थे। वो अब तक चुप थे। उनके हाथ में लाठी थी और उनकी आँखों में वो डर था जो बीस साल का था। पर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और अपनी लाठी ज़मीन पर टिका दी।
"मैं गवाही दूँगा," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर साफ़ थी। "बीस साल पहले जो मैंने देखा था, वो अब बोलूँगा। चाहे मुझे कुछ भी हो जाए।"
जगदीश ने कालू काका की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो कह रहा था — "तू भी?"
पर उसने कुछ नहीं कहा। शायद उसने देख लिया था कि अब बोलने का कोई फ़ायदा नहीं।
एक सिपाही जगदीश को लेकर चला। वो चबूतरे की सीढ़ियों से उतरा, और जब वो आख़िरी सीढ़ी पर पहुँचा, तो उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा। उसकी आँखें माँ पर टिकीं।
"सरस्वती," उसने कहा। और उसकी आवाज़ में अब कोई ज़हर नहीं था, सिर्फ़ एक पुरानी थकान। "तूने अच्छा किया। उस रात। मैं तुझे मारने आ रहा था। पर तूने लाश जला दी, और मेरे आदमियों ने सोचा कि काम हो गया। तू बच गई।"
माँ ने उसकी तरफ़ नहीं देखा।
"मैं तुझे माफ़ नहीं करती," माँ ने कहा। "और मेरा बेटा भी नहीं करेगा।"
जगदीश हँसा। फिर सिपाही उसे ले गए।
और तभी टिंकू ने अपना तवा नीचे रखा और अपनी कलाई देखने लगा।
"भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब वो हीरो वाली नहीं थी, बस टिंकू वाली थी, "मेरी कलाई में दर्द हो रहा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी कलाई पर एक लाल निशान था — उसके अपने ही तवे का। मुझे हँसी आई, और इस बार मैंने उसे रोका नहीं।
"तू तवा ऐसे पकड़ता है," मैंने कहा, "जैसे कोई बच्चा रोटी पकड़ता है।"
"तो तू बता," टिंकू ने कहा, और उसकी आँखें चमक रही थीं, "तूने कभी शेराज़ को तवे से मारा है?"
"नहीं।"
"तो चुप रह," वो बोला, और उसने अपनी कलाई सहलाई। "पहली बार में इतना ही होता है।"
मीरा ने उसकी कलाई पकड़ी। उसने अपना बैग खोला और उसमें से एक छोटी शीशी निकाली — हरी। उसने उसकी कलाई पर लगाया।
"अगली बार," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो नरमी थी जो सिर्फ़ उसके पास थी, "तू तवा ऐसे नहीं पकड़ेगा। मैं तुझे सिखाऊँगी।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा और आँख मारी। मैंने सिर हिलाया।
फिर गुड़िया ने मेरा हाथ खींचा।
"भैया," उसने कहा, "माँ को कुछ नहीं हुआ। मैंने उन्हें बचाया। वो हवेली में मुझे डरा रहे थे, पर मैंने उन्हें एक बात कही — कि मेरे भैया आ जाएंगे। और वो हँसे। पर मैं रोई नहीं। सच।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। उसके बालों में धूल थी और उसकी चोटी की रबर टूट गई थी।
"तू बहुत बहादुर है," मैंने कहा।
"मुझे पता है," वो बोली, और उसने अपना सिर गर्व से ऊपर किया। "पर भैया, मेरी कॉपी कहाँ है? वो जिस पर मैंने लिखा था।"
मैंने अपनी जेब से उसकी कॉपी निकाली। वो फटी हुई थी और उस पर मेरी माँ के आँसुओं के निशान थे। मैंने उसे उसे दे दिया।
गुड़िया ने कॉपी अपनी छाती से लगाई, जैसे कोई खज़ाना मिल गया हो।
तभी सुक्खी बुआ आगे आईं। उनके हाथ में अब भी पान का बीड़ा था, पर उनका चेहरा उतरा हुआ था।
"वीर," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में अब वो चुगली वाली चमक नहीं थी, "मैंने एक बात सुनी है।"
"अब क्या, बुआ?"
"वो जगदीश… वो जाते-जाते कुछ बोला था। मैंने सुना।" उन्होंने आगे झुककर धीरे से कहा। "उसने कहा — 'तहखाने में अभी भी एक चीज़ बाकी है।'"
मेरे पैर जम गए।
मैंने इंस्पेक्टर शर्मा की तरफ़ देखा। वो जगदीश को गाड़ी में बैठा रहे थे। मैंने मीरा की तरफ़ देखा — उसकी आँखें बड़ी हो गई थीं।
"कौन-सी चीज़?" मैंने पूछा।
सुक्खी बुआ ने कंधे उचकाए। "मुझे क्या पता। पर वो हँस रहा था, वीर। हँस रहा था।"
मैंने अपनी मुट्ठी कसी। मेरी नाक में अब भी वो गंध थी — कपूर, बादाम का तेल, और जली हुई मिट्टी। तहखाने की गंध। और मुझे पता था कि जगदीश की हँसी का मतलब कुछ तो है।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। माँ ने मेरी आँखों में देखा और उनका चेहरा पीला पड़ गया।
"वीर," माँ ने धीरे से कहा, "तहखाने में… तेरे बाप की हड्डियाँ नहीं हैं।"
"तो क्या है, माँ?"
माँ ने अपने होंठ सींचे। उनके हाथ काँप रहे थे।
"वो चीज़," उन्होंने कहा, "जिसके लिए जगदीश बीस साल से ज़िंदा था। और जिसके लिए उसने तेरे बाप को मारा।"
दूर नीम के पेड़ के नीचे बैलगाड़ी की घंटी फिर बजी। और इस बार वो आवाज़ मुझे किसी अपने की लगी — जैसे कोई बुला रहा हो।
मैंने गुड़िया का हाथ पकड़ा और माँ की तरफ़ बढ़ा।
"चलो," मैंने कहा। "तहखाना देखना है।"
॥
मैंने गुड़िया का हाथ पकड़े रखा था, पर मेरे पैर वहीं जम गए थे। चबूतरे पर अब भी सैकड़ों लोग खड़े थे, और हवा में एक अजीब-सी चुप्पी थी — ऐसी चुप्पी जो बारिश से पहले आती है।
इंस्पेक्टर शर्मा ने जगदीश सिंह की बाँह पकड़ी थी। जगदीश का चेहरा धूल से भरा था, और उसके होंठ फटे थे। पर वो मुस्कुरा रहा था। मुझे उस मुस्कान से नफ़रत थी — वो मुस्कान जो कहती थी, "तूने जो पाया, वो आधा है।"
"साहब," इंस्पेक्टर ने कहा, "गाड़ी में बैठिए।"
जगदीश ने इंस्पेक्टर की तरफ़ नहीं देखा। उसने अपना सिर घुमाया और सीधे मेरी तरफ़ देखा। और उसी पल मुझे एहसास हुआ — यही आदमी था जो कुछ दिन पहले अखाड़े में बूढ़े भवानी के भेस में आया था। वही झुकी हुई कमर, वही धीमी आवाज़, वही चलने का ढंग। मैंने उस वक़्त उसे नहीं पहचाना था। आज पहचान रहा था, और पहचानकर मेरे अंदर कुछ काँप गया।
"इंस्पेक्टर साहब," जगदीश ने कहा, और उसकी आवाज़ बिलकुल साफ़ थी, "ज़रा रुकिए। मुझे कुछ कहना है। इन सबके सामने।"
"जो कहना है, थाने में कहिए।"
"नहीं।" जगदीश ने अपना सिर हिलाया। "बीस साल का हिसाब है। मैं इसे अपने घर के आँगन में नहीं छोड़ूँगा।"
वो मेरी तरफ़ मुड़ा। उसने अपनी जेब से एक मैला रुमाल निकाला और अपना चेहरा पोंछा। धूल के नीचे से एक बूढ़ा चेहरा निकला — झुर्रियाँ, सफ़ेद दाढ़ी के ठूँठ, और आँखों के नीचे काले घेरे। पर आँखें वही थीं — चंदा की आँखें। मेरी साँस रुक गई।
"तू मुझे पहचानता है, वीर?" उसने पूछा।
"तू वही है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ मेरे कानों में भारी लगी, "जो अखाड़े में मेरे बाप का भेस बनाकर आया था।"
वो हँसा। पर वो हँसी खोखली थी, जैसे सूखे कुएँ में पत्थर गिरा हो।
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