Spirit of a Fighter – Chapter 1276
"वो उसी आदमी की थी," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ में पहली बार थोड़ी दया आई — मेरे लिए। "मैंने तुझे कभी नहीं बताया, बेटा। मैंने सोचा कि अगर तू जान जाएगा कि तेरे बाप की लाश कहीं नहीं है, तो तू पागल हो जाएगा। तू बीस साल से उस कब्र पर फूल चढ़ाता आया है, जिसमें कोई नहीं है।"
मेरे पैर लड़खड़ाए। मैं चबूतरे की सीढ़ी पर बैठ गया। मेरे हाथों ने पत्थर को पकड़ा — वो सर्द था। मुझे लगा जैसे मेरा पूरा बचपन एक झूठ पर खड़ा रहा है। वो कब्र, वो फूल, वो पिता जिसे मैंने कभी देखा नहीं पर जिसके लिए रोज़ दुआ माँगी — सब धुएँ में उड़ गया।
"वीर।"
ये आवाज़ रणवीर सिंह की थी। वो अपनी व्हीलचेयर में बैठे थे, और उनके हाथ उनकी गोद में काँप रहे थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "मैं जानता था," उन्होंने कहा। "मैं उस रात से जानता था। मैंने तेरी माँ को आग लगाते देखा था — दूर से, हवेली की छत से। और मैं कुछ नहीं कर सका, क्योंकि मैं उस वक़्त खुद घायल था।" उन्होंने अपनी टाँगों की तरफ़ देखा। "और मैं तेरी माँ को दोष नहीं देता। मैं उस रात भी नहीं देता था।"
नंदकिशोर ने हँसी दबाई। "बहुत भावुक। बहुत भावुक। पर सच ये है—"
"तू चुप रह।"
ये मैंने नहीं कहा। ये गुड़िया ने कहा। वो माँ के पीछे खड़ी थी, दोनों चोटियाँ बिखरी हुईं, स्कूल की कॉपी हाथ में दबी हुई। उसकी आवाज़ बारह साल की लड़की की नहीं थी। उसमें माँ की आवाज़ थी।
"तू चुप रह," गुड़िया ने दोहराया, और उसकी आँखें चमक रही थीं। "तूने मेरे भैया को बीस साल अनाथ रखा। तूने मेरी माँ को रोज़ रोने पर मजबूर किया। और अब तू चबूतरे पर खड़े होकर हमें हमारा ही सच सुना रहा है?"
नंदकिशोर मुस्कुराया। पर मैंने देखा — उसकी मुस्कान में अब वो चिकनाहट नहीं थी। थोड़ी देर के लिए उसके होंठ काँपे।
"तो अब क्या?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो तेल अब कम था। "तुम सब यही सोचते रहो कि मैं बुरा हूँ और तुम अच्छे। और फिर देखते हैं, तेरी माँ को जज क्या कहता है — जिसने अपने पति की लाश जलाई।"
वो जितना बोलता, उतना ही मुझे लगता कि वो वक़्त खरीद रहा है। मेरी नाक में एक गंध आई — पसीना, गुड़ की चाशनी, और जले हुए कपड़े की। और मुझे पता चल गया कि शेराज़ पीछे खड़ा है।
मैंने चबूतरे की सीढ़ी पर बैठे-बैठे सुना — हवा में एक हल्की सी सरसराहट। चप्पल का घिसटता हुआ पैर। मैंने अपना सिर नहीं घुमाया। मैंने बस अपनी मुट्ठी कसी।
और फिर वो आया।
शेराज़ पीछे से आया — मेरी गर्दन पर हाथ डालने के लिए। पर मैं तैयार था। मैं एक तरफ़ झुका, और उसका हाथ हवा में लगा। फिर मैं पलटा। वो मेरे सामने था — लंगड़ा पैर, बिखरे बाल, आँखों में वो पुरानी नफ़रत। मैंने उसकी कलाई पकड़ी और उसके घुटने पर अपना घुटना मारा। वो गिरा — चबूतरे के पत्थर पर, और उसकी पीठ से एक आवाज़ निकली जो मुझे सालों याद रहेगी।
पर वो उठ गया। उसके हाथ में चाकू था — छोटा, चमकता हुआ। मैंने उसकी आँखों में देखा और समझ गया कि वो भाग नहीं रहा। वो कोई काम पूरा करने आया था।
वो मेरी तरफ़ झपटा।
और फिर एक आवाज़ आई — लोहे की, तेज़, दबी हुई।
टिंकू चबूतरे की सीढ़ियों से कूदकर आया था। उसके हाथ में लोहे का तवा था — वही जिस पर वो रोज़ मिठाई का शीरा बनाता था। मैंने उसे पहले कभी इतनी तेज़ी से चलते नहीं देखा था। वो आया और उसने तवा शेराज़ के हाथ पर दे मारा। चाकू उड़कर सीढ़ियों पर गिरा और खड़खड़ाता हुआ नीचे लुढ़क गया।
शेराज़ चीखा और अपनी कलाई पकड़कर पीछे हटा।
टिंकू वहीं खड़ा रहा। उसकी साँस फूल रही थी। उसके हाथ काँप रहे थे, पर तवा उसने नहीं छोड़ा। उसके माथे पर पसीना था और उसकी टोपी तिरछी हो गई थी।
"आज मैंने पहली बार कसरत की है," वो बोला, हाँफते हुए, "बिना खीर खाए।" उसने तवा शेराज़ की तरफ़ उठाया। "और सच बताऊँ, भाई? मज़ा आया।"
मुझे उस पल हँसी आई — बिलकुल गलत वक़्त पर, बिलकुल गलत जगह पर। पर मैं रोक नहीं पाया।
शेराज़ टिंकू की तरफ़ बढ़ा, पर दो सिपाही आगे आ चुके थे। उन्होंने उसकी बाँहें पकड़ लीं। इंस्पेक्टर शर्मा ने मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया — जैसे कह रहे हों, "ठीक है, अब ये हमारा काम है।"
नंदकिशोर ने पीछे की तरफ़ एक कदम रखा। धीरे से। मुझे पता था वो क्या कर रहा है — वो चबूतरे के पीछे वाले रास्ते से भागने की कोशिश कर रहा था, जहाँ से शेराज़ भागा था।
पर गुड़िया को भी पता था।
वो अब भी वहीं खड़ी थी, पर उसके हाथ में अब स्कूल की कॉपी नहीं थी। उसके हाथ में रस्सी थी — वो रस्सी जिससे माँ का हुक्का बँधा रहता था। मैं नहीं जानता वो उसे कब उठा लाई। शायद जब मैं शेराज़ से लड़ रहा था, तब वो चुपचाप सीढ़ी के पास से गुज़री थी।
नंदकिशोर ने दूसरा कदम रखा।
गुड़िया ने रस्सी फेंकी।
रस्सी उसके पैरों में उलझी और नंदकिशोर गिरा — सीधा चबूतरे के पत्थर पर, अपनी ठुड्डी के बल। उसके मुँह से एक आवाज़ निकली जो किसी आदमी की नहीं, किसी जानवर की थी। उसके होठ फट गए और खून की एक पतली लकीर उसकी ठुड्डी से नीचे बहने लगी।
गुड़िया उसके ऊपर झुकी। उसकी आँखों में आँसू थे, पर आवाज़ साफ़ थी।
"मेरे भैया को छेड़ा न करो," उसने कहा।
चबूतरे पर जो भी खड़ा था — सुक्खी बुआ, हरनाम, गाँव के बूढ़े, मुंशीजी के पीछे खड़े लोग — सब चुप हो गए। सिर्फ़ एक बच्ची की आवाज़ गूँजती रही।
मैंने अपना हाथ गुड़िया के कंधे पर रखा। उसका शरीर काँप रहा था। मैंने उसे अपनी तरफ़ खींचा और उसका सिर अपनी छाती से लगा दिया।
"बहादुर," मैंने उसके कान में कहा।
"भैया," वो फुसफुसाई, और उसकी आवाज़ टूट गई, "मुझे डर लग रहा था।"
"मुझे भी," मैंने कहा। "पर अब खत्म।"
इंस्पेक्टर शर्मा आगे आए। उनके चेहरे पर वो भावना नहीं थी जो पुलिस वालों के चेहरे पर आमतौर पर होती है। उनके चेहरे पर गुस्सा था — असली गुस्सा।
उन्होंने नंदकिशोर की कलाई पकड़ी और उसे घसीटकर उठाया। नंदकिशोर के घुटने काँप रहे थे। उसके होंठ फटे हुए थे और उसकी आँखों में पहली बार कुछ और था — डर।
"तेरा असली नाम क्या है?" इंस्पेक्टर शर्मा ने पूछा। उनकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो सिर्फ़ सच के सामने आती है। "क्योंकि इन काग़ज़ों में तीन नाम हैं। जगदीश सिंह, नंदकिशोर… और एक तीसरा, जो सब जगह मिटाया गया है। बता, तू कौन है?"
नंदकिशोर ने अपना सिर उठाया। उसके होठों से खून टपक रहा था। वो हँसा — पर वो हँसी नहीं थी, वो कुछ और था। किसी टूटे हुए आदमी की आख़िरी हिम्मत।
"मैं वही हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अब कोई तेल नहीं था, "जिसे तुम सब भवानी का भाई समझते थे।"
उसने एक बार मेरी तरफ़ देखा। फिर माँ की तरफ़। फिर वो धीरे से बोला, जैसे कोई पुरानी किताब का पन्ना पलट रहा हो —
"मैं ही जगदीश सिंह हूँ।"
चबूतरे पर सन्नाटा और गहरा हो गया। मैंने अपनी माँ की तरफ़ देखा। माँ ने अपनी आँखें बंद कर लीं, और उनके होंठ हिले — कुछ ऐसा जो सिर्फ़ वो जानती थीं।
मैंने अपनी मुट्ठी खोली। उसमें चाँदी की अंगूठी थी — वो जो मैंने अपने बाप की समझी थी। अब मुझे पता था वो किसी और की थी। और शायद उसी आदमी की, जिसने मेरे बाप को मारा।
मैंने अंगूठी को अपनी जेब में रखा। अभी वो काम की नहीं थी। अभी काम की चीज़ कुछ और थी — वो सच, जो अब पूरा खुल चुका था।
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