Spirit of a Fighter – Chapter 1275
"ये काग़ज़," इंस्पेक्टर शर्मा ने कहा, "बीस साल पुराना है। पर इसमें लिखा है कि भवानी सिंह ने अपनी मौत से एक रात पहले देखा था कि उनके भाई जगदीश ने हवेली के कुएँ में कुछ मिलाया था। और इसकी जाँच होनी चाहिए।"
जगदीश हँसा। ठंडी, सूखी हँसी। "जाँच? पच्चीस साल बाद? किस चीज़ की जाँच? कुएँ में अब कुआँ भी नहीं है।"
"तो तू मान रहा है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद मेरे कानों में अजीब लगी, "कि तूने कुछ मिलाया था?"
वो मेरी तरफ़ मुड़ा। उसकी आँखों में अब भी वो घमंड था, पर उसके होंठ काँप रहे थे। "मैं कोई बात नहीं मान रहा," वो बोला। "तू अपने बाप की लाश पर से उठ, फिर बात करना।"
माँ चौकी से उठीं। धीरे-धीरे। उनके घुटने दुख रहे थे — मैंने देखा, उन्होंने सहारे के लिए चौकी का किनारा पकड़ा — पर वो खड़ी हो गईं और जगदीश के सामने आ गईं। उनके बीच अब सिर्फ़ दो कदम थे।
"तूने मेरे पति को मारा," माँ ने कहा। धीमी आवाज़। सिर्फ़ उसके लिए। "तूने मेरे बेटे को अनाथ किया। और तूने मुझे बीस साल अपने ही घर में क़ैद रखा।"
"मैंने तुझे क़ैद नहीं रखा," जगदीश ने कहा। "तू खुद रही। क्योंकि तू जानती थी कि अगर तू बोली, तो मैं तुझे भी उसी कुएँ में… "
वो रुक गया। बहुत देर हो चुकी थी।
इंस्पेक्टर शर्मा ने अपने सिपाहियों को इशारा किया। दो सिपाही आगे बढ़े और जगदीश की कलाइयों में हथकड़ी डाल दी। लाठी उसके हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिरी और चबूतरे की सीढ़ियों से नीचे लुढ़क गई। जगदीश कुछ नहीं बोला। वो बस माँ को देखता रहा, और उसकी आँखों में वो नफ़रत थी जो हार के बाद भी नहीं मरी।
शेराज़ पहले ही भाग चुका था। किसी ने देखा — "वो पीछे के रास्ते से निकला," सुक्खी बुआ चिल्लाई, "काला कुत्ता!"
पर नंदकिशोर वहीं खड़ा था। एक सिपाही उसके पास पहुँचा, पर वो हाथ बढ़ाकर रुक गया।
"एक मिनट," नंदकिशोर ने कहा। और फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो मुस्कान लौट आई थी — वही चिकनी, तेल जैसी मुस्कान। "वीर, अच्छा खेला। सच में। तेरी माँ ने तुझे अच्छा सिखाया।"
"चुप रह," मैंने कहा।
"पर एक बात," वो बोला, और उसने अपना सिर थोड़ा झुकाया, "जो तेरी माँ ने उस रात किया, वो तूने कभी सोचा? उसने तेरे बाप की लाश जलाई। अपने ही हाथों से। तेरे बाप की लाश को आग दी।"
मेरे पैर जम गए। माँ ने मेरा कंधा पकड़ा — उनकी उँगलियाँ मेरी कमीज़ में गड़ गईं।
"क्यों?" नंदकिशोर ने धीरे से पूछा, जैसे कोई बच्चे से कोई सवाल पूछता है। "क्यों जलाया? ताकि सबूत न बचे? ताकि कोई जाँच न करे? ताकि भवानी सिंह की मौत का राज़ हमेशा के लिए दब जाए?"
"नींव में तेरा बाप नहीं, तेरी माँ है।"
माँ का हाथ मेरे कंधे से फिसल गया।
नंदकिशोर मुस्कुराया। "अच्छा, तो ये बात है। तो सुन ले, वीर। तेरी माँ ने उस रात एक और काम किया था। उसने अपने ही हाथों से तेरे बाप की लाश जलाई थी, ताकि कोई सबूत न बचे। और वो सबूत," उसने माँ की तरफ़ देखा, "वो सबूत तूने खुद जलाया था। अपने हाथों से।"
॥
माँ का हाथ मेरे कंधे से फिसल गया, और उस पल मुझे लगा कि ज़मीन मेरे पैरों के नीचे से खिसक गई है। चबूतरे पर सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि दूर नीम के पेड़ पर बैठा कौआ भी चुप हो गया।
नंदकिशोर की बात हवा में लटकी रही। "उसने अपने ही हाथों से तेरे बाप की लाश जलाई।"
मैं धीरे-धीरे माँ की तरफ़ मुड़ा। मेरी गर्दन भारी थी। मेरे हाथ काँप रहे थे, और मैं उन्हें रोक नहीं पा रहा था। माँ खड़ी थीं। उनकी आँखें नीची थीं। माथे का हल्दी का टीका उतरा हुआ था, बाल बिखरे हुए थे, और उनके होंठ धीरे-धीरे सिकुड़ रहे थे — जैसे कोई बहुत बड़ी बात मुँह से निकलने से पहले खुद को छोटा कर रही हो।
"माँ," मैंने कहा। मेरी आवाज़ फटी हुई निकली। "ये सच है?"
वो नहीं बोलीं। बस एक बार साँस ली, और उनकी साँस काँपी।
"माँ!"
"हाँ," उन्होंने कहा। बहुत धीमे। इतने धीमे कि मुझे लगा मैंने सुना नहीं, सिर्फ़ समझ लिया। "मैंने जलाई।"
मेरे पैर के नीचे की मिट्टी जैसे पानी बन गई। मैंने एक कदम पीछे रखा। मुझे खुद पर शर्म आई कि मैं पीछे हट रहा हूँ — अपनी माँ से — पर मेरा शरीर मुझसे पूछ नहीं रहा था।
"क्यों?" मैंने पूछा। और मेरी आवाज़ में वो गुस्सा था जिसे मैं बीस साल से नहीं जानता था। "क्यों, माँ? तुमने ऐसा क्यों किया?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी नहीं था। उससे भी बुरी चीज़ थी — थकान। इतनी पुरानी थकान कि वो आँसू बनने से पहले ही सूख गई थी।
"उस रात," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ अब बैठ गई थी, "तेरे बाप की लाश हवेली के पिछवाड़े पड़ी थी। मैंने उन्हें देखा। मैंने उनका चेहरा देखा। मैंने उनके हाथ पकड़े — ठंडे। बर्फ़ जैसे।" उन्होंने रुककर साँस ली। "और फिर मैंने सुना — भैरव के आदमी आ रहे थे। दो आदमी, मशाल लेकर। मैं जानती थी कि अगर उन्हें भवानी की लाश मिली, तो वो सबूत मिटाने के लिए कुछ भी करेंगे। और उस रात तू मेरी गोद में था, वीर। तीन महीने का। तेरी साँस इतनी छोटी थी कि मुझे डर लगता था कहीं तू रुक न जाए।"
मेरा गला भर आया। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"मैंने सोचा," माँ बोलीं, "अगर उन्हें लाश जली हुई मिलेगी, तो वो समझेंगे कि सबूत खत्म। वो बाकी की तलाश नहीं करेंगे। तो मैंने… मैंने उनके शरीर पर पुआल रखा। और मशाल लगा दी।" उनकी आवाज़ टूटी। पहली बार उस रात। "अपने हाथों से, वीर। अपने ही हाथों से। और मैं कसम खाती हूँ, जब आग उनके शरीर को छू रही थी, तब मेरा कलेजा जल रहा था। मैं चिल्लाना चाहती थी, पर मेरे गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी। क्योंकि मेरी गोद में तू सो रहा था, और अगर मैंने आवाज़ दी, तो वो तुझे भी नहीं छोड़ते।"
मैंने आँखें खोलीं। माँ के हाथ अब भी चौकी का किनारा पकड़े हुए थे। उनकी उँगलियों के जोड़ सफ़ेद हो गए थे।
कुछ देर किसी ने कुछ नहीं कहा। फिर मेरा दिमाग़ काम करने लगा — धीरे-धीरे, जैसे चक्की के बिना पत्थर घूम रहा हो।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। "तो फिर संदूक में जो हड्डियाँ मिलीं… वो किसकी थीं?"
माँ ने अपना सिर उठाया। उस चबूतरे पर खड़े सब लोगों ने साँस रोक ली।
"उस रात हवेली में एक और आदमी मरा था," माँ ने कहा। "जगदीश का अपना आदमी। वो पिछवाड़े की दीवार से गिर गया — दो आदमी लड़ रहे थे, मुझे नहीं पता किस बात पर। मैंने उसकी लाश देखी। और मैंने सोचा — अगर भवानी की लाश जल गई है, तो किसी और की लाश को भवानी बना दिया जाए। तो मैंने उसकी हड्डियाँ उठाईं और भवानी के नाम पर रख दीं। उसकी अँगूठी उतारी, उसकी चप्पल पहनाई। ताकि जो भी जाँच करे, वो यही समझे कि भवानी सिंह जलकर मर गए।"
मेरे हाथ अब भी काँप रहे थे। पर अब वो गुस्से से नहीं, किसी और चीज़ से काँप रहे थे। मैंने अपनी मुट्ठी देखी — मेरी मुट्ठी में भवानी की चाँदी की अंगूठी थी। जो मैंने संदूक से निकाली थी। जो असल में किसी और की थी।
"तो वो चाँदी की अंगूठी," मैंने धीरे से कहा, "जो मैं अपने बाप की समझकर अपनी जेब में रखे घूम रहा था…"
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