Spirit of a Fighter – Chapter 1274
नंदकिशोर ने एक कदम पीछे किया। पहली बार।
"तो इतने साल," मैंने कहा, "तूने ये मिट्टी सहेजकर रखी थी?"
"हाँ," माँ ने कहा। "और जब तू बड़ा हुआ, तो मैंने इसे कुएँ के पास दबा दिया। ताकि कोई ढूँढ न सके। और जब तू अखाड़े जाने लगा, तो मैंने इसे वहाँ से निकालकर तेरी थैली में डाल दिया।"
"मेरी थैली में?" मैंने कहा।
"हाँ," माँ ने कहा। "गुड़िया हर रोज़ तुझे अखाड़े की मिट्टी देती थी। पर वो मिट्टी खाली नहीं थी। उसमें मैंने ये मिला दी थी। थोड़ी-थोड़ी। ताकि तेरे हाथ उस मिट्टी को पहचानें। ताकि एक दिन जब तू उस जगह पर खड़ा हो, तो तेरे शरीर को पता चले कि तेरा बाप कहाँ है।"
मेरे हाथ काँप रहे थे।
नंदकिशोर हँसा। पर उसकी हँसी में अब वो आत्मविश्वास नहीं था।
"बहुत भावुक," उसने कहा। "पर इससे तेरे बाप के कातिल को क्या मिलेगा? तेरे पास मिट्टी है। और मेरे पास सबूत हैं। काग़ज़ हैं। गवाह हैं।"
मैंने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।
"तेरे पास गवाह हैं?" मैंने पूछा। "कौन?"
"गंगा देवी," उसने कहा।
"गंगा देवी?" मैंने कहा, और मैं मुस्कुराया — पहली बार उस रात। "गंगा देवी तो अभी मेरे साथ खड़ी थी। और उसने कबूल किया कि उसने काग़ज़ तुझे दिया। मेरे सामने।"
नंदकिशोर ने अपना सिर घुमाया।
"गंगा?" उसने कहा। "कहाँ है वो?"
मैंने पलटकर देखा। हवेली के पिछले आँगन में, जहाँ मैंने उन्हें अभी-अभी खड़े देखा था, वहाँ अब कोई नहीं था। बस मशाल की रोशनी थी और ज़मीन पर गिरी एक चूड़ी।
मेरा दिल धक् से रह गया।
"वो गई," शेराज़ ने कहा, और उसकी आवाज़ में भी हैरानी थी। "अभी तो यहीं थी।"
"कहाँ गई?" मैंने कहा।
तभी हवेली के बाहर से एक आवाज़ आई। एक ढोल की आवाज़। दूर से। और उसके साथ कई पैरों की आवाज़।
नंदकिशोर ने बाहर की तरफ़ देखा और उसकी आँखें खुल गईं।
"ये…" वो बोला, "ये अदालत नहीं है। ये…"
मैं दौड़कर हवेली के बाहरी दरवाज़े तक पहुँचा। और जो मैंने देखा, वो मैंने कभी नहीं सोचा था।
हवेली के बाहर, पूरे रामपुर का चबूतरा भरा हुआ था। मशालें थीं। लालटेनें थीं। और सैकड़ों लोग थे — औरतें, बच्चे, बूढ़े। और सबके सामने रणवीर सिंह खड़े थे। व्हीलचेयर से नीचे उतरकर, दो आदमियों के सहारे, पर खड़े।
और उनके साथ, एक तरफ़, गंगा देवी खड़ी थीं। उनके हाथ में एक काग़ज़ था — कई पन्नों का, मुड़ा हुआ, पुराना।
और उनके दूसरी तरफ़, इंस्पेक्टर शर्मा खड़े थे, अपने सिपाहियों के साथ।
नंदकिशोर मेरे पीछे आया। उसने वो दृश्य देखा और उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
"ये क्या है?" वो बोला।
मैंने पलटकर उसे देखा।
"ये अदालत है," मैंने कहा। "तूने कहा था ना — अदालत में जाने का नतीजा यही है? तो अब देख।"
गंगा देवी ने अपना काग़ज़ उठाया और उन्होंने आवाज़ दी — ऊँची, साफ़, वो आवाज़ जो बीस साल से दबी थी।
"मैं गंगा देवी हूँ," उन्होंने कहा। "भवानी सिंह की बीवी। और ये सारे काग़ज़ मेरे पति की लिखाई हैं। जो उन्होंने अपनी मौत से पहले लिखे। और जो मैंने बीस साल हवेली की नींव में छिपाकर रखे।"
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
"और आज," गंगा देवी ने कहा, "मैं ये सब खोल रही हूँ। क्योंकि मेरा भाई जगदीश सिंह आज पकड़ा जाएगा। और उसके साथ वो सब पकड़े जाएँगे जिन्होंने बीस साल इस गाँव को ज़हर पिलाया।"
नंदकिशोर ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पहली बार डर था।
"तूने ये किया?" वो बोला।
मैंने अपना सिर हिलाया।
"नहीं," मैंने कहा। "मैंने नहीं किया। मेरी माँ ने किया। बीस साल पहले। उस रात। जब तूने सोचा था कि तूने सब मिटा दिया।"
नंदकिशोर ने पीछे हटना चाहा। शेराज़ ने भी। पर इंस्पेक्टर शर्मा के सिपाही पहले से दोनों तरफ़ खड़े थे।
मैं माँ की तरफ़ मुड़ा। वो अभी भी चौकी पर बैठी थीं। उन्होंने अपना सिर उठाया और मुझे देखा।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भर आई, "तूने मुझे क्यों नहीं बताया कि तूने ये सब किया?"
माँ ने धीरे से मुस्कुराया। वो मुस्कान जो मैंने बहुत कम देखी थी। वो मुस्कान जो सिर्फ़ दाल में नमक कम डालने के बाद आती थी।
"क्योंकि," उन्होंने कहा, "मैं तेरी माँ हूँ। मैं बोलती नहीं, बेटा। मैं करती हूँ।"
मैंने उनके हाथ पकड़े और उन्हें अपने माथे पर रखा। उनके हाथ अब भी काँप रहे थे, पर उनमें वो गरमी थी जो बीस साल से मेरे सिर पर थी।
बाहर ढोल फिर बजा। और इस बार, भीड़ में से एक आवाज़ आई — सुक्खी बुआ की।
"अरे मैंने तो सुना है," वो चिल्लाई, "कि आज रात रामपुर की नींव हिलेगी!"
और भीड़ हँसी। और रोई। और मैंने माँ के हाथ और कसकर पकड़े।
पर तभी, भीड़ के बीच से एक आवाज़ आई। धीमी। ठंडी।
"नींव हिलेगी, बिलकुल।"
सब पलटे। और मशालों की रोशनी में, चबूतरे की सीढ़ियों पर, एक बूढ़ा आदमी खड़ा था। सफ़ेद दाढ़ी। काला कोट। हाथ में लाठी।
जगदीश सिंह।
"पर नींव हिलने से पहले," उसने कहा, "मैं एक बात साफ़ कर दूँ। तुम सब यहाँ मेरे खिलाफ़ गवाही देने आए हो। पर क्या तुम जानते हो कि तुम्हारी गवाही किसके हाथ में है?"
उसने अपनी लाठी उठाई और सीधे मेरी तरफ़ इशारा किया।
"इसकी माँ के हाथ में," उसने कहा। "जिसने अपने ही हाथों से अपने पति की लाश जलाई थी।"
भीड़ में खुसफुसाहट फैली।
"और अगर तुम्हें मेरी बात पर यकीन नहीं," जगदीश ने कहा, "तो उससे पूछो। उसने खुद मेरे सामने कबूल किया था। है ना, सरस्वती?"
मैंने माँ की तरफ़ देखा।
माँ ने अपना सिर उठाया। और उन्होंने वो किया जो मैंने कभी नहीं सोचा था। उन्होंने अपने हाथ जोड़े। और उन्होंने आवाज़ दी — ऊँची, साफ़, पूरे चबूतरे को सुनाई देने वाली।
"हाँ," उन्होंने कहा। "मैंने जलाई थी।"
भीड़ सन्न रह गई।
"पर आग मैंने नहीं लगाई थी," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ काँपी नहीं। "आग गंगा देवी ने लगाई थी। और मैंने सिर्फ़ वो किया जो एक माँ करती है — मैंने अपने पति की जलती लाश से अपने बेटे को बचाया।"
वो सीधी जगदीश की तरफ़ देखने लगीं।
"और तू," उन्होंने कहा, "तू उस रात वहाँ था। तूने अपने भाई की लाश को जलते देखा और तू मुस्कुराया था। मैंने देखा था। बीस साल मैंने वो मुस्कान अपने सीने में रखी।"
जगदीश की लाठी हिली।
"और अब," माँ ने कहा, और उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया, "मेरे पास वो मिट्टी है जो उस रात की है। और मेरे पास वो काग़ज़ है जो तेरे भाई ने लिखा था। और मेरे पास वो गवाह है जो बीस साल तेरे साथ रहा — तेरी ही बहन।"
गंगा देवी आगे आईं। उनके हाथ में काग़ज़ था, और उनकी आँखों में पानी।
गंगा देवी ने काग़ज़ आगे बढ़ाया, पर जगदीश ने हाथ नहीं बढ़ाया। वो अपनी लाठी पर झुका रहा, जैसे अंदर से कोई चीज़ उसे खोखला कर रही हो।
"बोल, जगदीश," गंगा देवी ने कहा। उनकी आवाज़ में अब भी वो ठंडक थी जो हवेली के पत्थरों से आती थी। "बोल या मैं ये काग़ज़ इंस्पेक्टर शर्मा को दे दूँ।"
"दे दे," जगदीश ने कहा। पर उसकी आवाज़ में वो दम नहीं था जो अभी सीढ़ियों पर था। "जो होगा, देखा जाएगा।"
इंस्पेक्टर शर्मा ने काग़ज़ अपने हाथ में लिया और एक-एक लाइन पढ़ने लगे। उनका चेहरा गंभीर होता गया। भीड़ में एक बूढ़ी औरत रोने लगी — वो भवानी सिंह की बुआ थीं, जो अब रामपुर में अकेली रहती थीं।
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