Spirit of a Fighter – Chapter 1273
"क्या?" मैंने कहा। "क्या किया उसने?"
नंदकिशोर ने अपना हाथ उठाया और मशाल की तरफ़ इशारा किया।
"अरे, तू तो अभी-अभी उसकी गोद में बैठकर उसकी बातें सुन रहा था," उसने कहा। "उसने खुद कबूल किया ना? कि उसने भवानी की मुट्ठी से काग़ज़ निकाला। कि उसने वो काग़ज़ जगदीश को दिया। पर उसने तुझे ये नहीं बताया कि उस काग़ज़ को निकालने के लिए उसे भवानी की मुट्ठी खोलनी पड़ी थी। और भवानी की मुट्ठी तब खुलती है जब आदमी मर चुका होता है।"
मेरा दिल धक् से रह गया।
"तो उसने देखा," नंदकिशोर ने धीरे से कहा, जैसे कोई बच्चे को कहानी सुना रहा हो, "कि भवानी मर चुका है। और फिर उसने वो किया जो हर समझदार औरत करती है — उसने सबूत मिटा दिया।"
"सबूत मिटाया?" मैंने कहा। "कैसे?"
नंदकिशोर ने मशाल की तरफ़ देखा। "तेरी माँ से पूछ। उसने भी तो देखा था।"
मैं पलटा। माँ का चेहरा सफ़ेद था। बिलकुल सफ़ेद। और उनके होंठ काँप रहे थे। मैंने उन्हें ऐसा कभी नहीं देखा था। माँ जो हमेशा मज़बूत रही, जो हमेशा चुप रही, जो दाल में नमक कम डालकर बेटे को सोचने पर मजबूर कर देती थी — वो माँ अब काँप रही थी।
"माँ," मैंने धीरे से कहा। "क्या किया उसने?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में वो सच था जो बीस साल से उनके सीने में धधक रहा था।
"तेरे बाप की लाश," उन्होंने कहा, और आवाज़ बस फुसफुसाहट थी, "वहीं पड़ी थी। नींव के गड्ढे में। और उसके ऊपर मिट्टी डालने वाले थे।"
"कौन?" मैंने पूछा।
"जगदीश के आदमी," माँ ने कहा। "पर तब तक गंगा देवी ने कुछ किया।"
"क्या?"
माँ ने आँखें बंद कर लीं, जैसे वो दृश्य देखना नहीं चाहती हों।
"उसने मशाल उठाई," माँ ने कहा, "और उसने तेरे बाप की लाश पर… आग लगा दी।"
शब्द हवा में लटक गए।
"आग?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ किसी और की लगी।
"हाँ," माँ ने कहा। "उसने कहा कि अगर लाश जल जाएगी, तो कोई सबूत नहीं बचेगा। कोई ज़हर नहीं मिलेगा। कोई निशान नहीं। सिर्फ़ राख। और राख को कोई अदालत में नहीं ले जाता।"
मेरे घुटने काँपने लगे। मैंने चौकी का सहारा लिया।
नंदकिशोर ने हल्की हँसी हँसी।
"अब समझा?" उसने कहा। "तेरी माँ ने तुझे बचाया, हाँ। पर उसने तुझे ये नहीं बताया कि उसने अपनी आँखों से देखा कि तेरे बाप को जलाया जा रहा है। और वो चुप रही। बीस साल।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, और वो उन्हें पोंछ भी नहीं रही थीं। वो बस मेरी तरफ़ देख रही थीं। मेरी तरफ़। जैसे मेरे चेहरे पर वो जवाब ढूँढ रही हों जो वो बीस साल से नहीं दे पाई थीं।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ टूट रही थी। "तूने मुझे ये क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ बस फुसफुसाहट थी, "अगर मैं तुझे बता देती, तो तू उसी रात हवेली जलाने चला जाता। और मैं तुझे खो देती।"
"तो तूने चुप रहना चुना?" मैंने कहा। "बीस साल? माँ, तूने मुझे ये क्यों नहीं बताया कि तू वहाँ थी? कि तूने देखा? कि तू जानती थी?"
"क्योंकि मैं तेरी माँ हूँ," उन्होंने कहा, और अब उनकी आवाज़ में वो गरमी लौट आई थी जो मैं जानता था। "और माँ वो बताती है जो बेटे को बचा सके। बाकी सब वो अपने सीने में दबा लेती है।"
मैं चुप हो गया।
नंदकिशोर ने ताली बजाई। एक, दो। धीरे-धीरे।
"वाह," उसने कहा। "क्या बात है। माँ-बेटे का प्यार। बीस साल का सच। और सब एक रात में।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरी आँखों में आँसू थे, पर मेरी आवाज़ साफ़ थी।
"क्यों बता रहा है ये सब?" मैंने पूछा। "तुझे क्या मिलेगा?"
"मिलेगा?" नंदकिशोर हँसा। "कुछ नहीं। बस तेरी शक्ल देखनी है। जब तू जान जाएगा कि तेरी माँ ने क्या किया, तो तू खुद टूट जाएगा। और टूटा आदमी अदालत में नहीं लड़ता। टूटा आदमी घर बैठ जाता है।"
"मैं नहीं टूटूँगा," मैंने कहा।
"अच्छा?" उसने ठुड्डी उठाई। "तो अभी बताओ — तेरी माँ ने उस रात गंगा देवी को रोका क्यों नहीं? क्यों नहीं चिल्लाई? क्यों नहीं भागी? क्यों नहीं किसी को बताया?"
मैंने माँ की तरफ़ देखा।
माँ ने अपना सिर उठाया। और उनकी आँखों में वो चीज़ लौट आई थी जो मैं जानता था — वो आग जो चूल्हे में नहीं, दिल में जलती है।
"मैंने रोका," उन्होंने कहा, और आवाज़ साफ़ थी, "लेकिन मेरे हाथों में तू था। तू, वीर। और मैं अकेली थी। मेरे सामने जगदीश के चार आदमी थे। मैं क्या करती?"
वो रुकीं।
"और फिर," उन्होंने कहा, "गंगा देवी ने मेरी तरफ़ देखा। उसने तुझे देखा। और उसने कहा — 'इसे ले जा। और अगर ये ज़िंदा रहा, तो मैं इसे अपने बेटे की तरह पालूँगी।'"
मेरे पैरों तले ज़मीन हिल गई।
"क्या?" मैंने कहा।
"हाँ," माँ ने कहा। "उसने वादा किया था। पर वो वादा नहीं निभाया। बीस साल तक उसने हमें देखा, और चुप रही। और जब मैंने उससे पूछा, तो उसने कहा — 'मैं ऐसे ही ज़िंदा हूँ, सरस्वती। अगर मैं बोलूँगी, तो मेरा भाई मुझे भी मार देगा।'"
नंदकिशोर ने ताली बजाई फिर से। इस बार ज़ोर से।
"क्या कहानी है," उसने कहा। "मतलब गंगा देवी ने तुझे बचाया, तेरी माँ ने तुझे बचाया, और तेरा बाप मर गया। और अब तू सबको बचाने आया है? तेरे पास क्या है, वीर सिंह? एक बोरी मिट्टी? एक पुराना काग़ज़? एक टूटी अंगूठी?"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। वहाँ वो चाँदी की अँगूठी थी जो मुझे भैरव ने दी थी। और माँ की पीतल की चूड़ी। और टिंकू की शीशी का ढक्कन।
मेरे पास कुछ नहीं था। सिवाय उस मिट्टी के जो मैं अपने साथ लाया था।
और उसी पल मुझे कुछ याद आया। रणवीर सिंह की आवाज़। उन्होंने कहा था — "मिट्टी झूठ नहीं बोलती।"
मैंने अपनी बोरी खोली। काली मिट्टी मेरे हाथों में आई। तालाब के नीचे की मिट्टी। ठंडी। भारी। और उसमें से एक गंध उठी — नमी, पुरानी जड़ें, और कुछ और। कुछ जो मैंने पहले कभी नहीं सूँघा था।
मैंने मिट्टी को अपनी नाक के पास लाया। और मेरी आँखें बंद हो गईं।
"ये मिट्टी," मैंने धीरे से कहा, "अभी तक ज़िंदा है।"
नंदकिशोर की मुस्कान थोड़ी-सी फीकी पड़ी।
"क्या बक रहा है?" उसने कहा।
"ये मिट्टी," मैंने कहा, और मैंने अपनी आँखें खोलीं, "तालाब के नीचे की नहीं है। ये कुएँ के नीचे की है। तहखाने की मिट्टी।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"कैसे पता?" उन्होंने पूछा।
"क्योंकि इसमें लोहे और पुराने पत्थर की गंध है," मैंने कहा। "और उसमें एक और गंध है। सूखी लकड़ी की। जली हुई लकड़ी की।"
मैंने मुट्ठी भर मिट्टी उठाई और उसे मशाल की रोशनी में देखा। और उसमें मुझे कुछ चमकता दिखा।
छोटा-सा। सुनहरा। एक दाना।
मैंने उसे अपनी उँगली पर रखा और अपनी नाक के पास लाया।
और मेरी साँस रुक गई।
"ये… ये हल्दी है," मैंने कहा। "कच्ची हल्दी। वही हल्दी जो माँ माथे पर लगाती है।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी, "तूने ये मिट्टी यहाँ कब छोड़ी?"
माँ ने मेरी आँखों में देखा। और उनकी आँखों में वो शांति थी जो सच बोलने के बाद आती है।
"बीस साल पहले," उन्होंने कहा। "उस रात। जब मैं वहाँ से तुझे लेकर भागी थी। मैंने अपने हाथ में मिट्टी भरी थी — एक मुट्ठी। और उसे अपनी झोली में बाँध लिया। क्योंकि मुझे पता था कि एक दिन कोई पूछेगा — 'तेरे बाप की लाश कहाँ है?' और मैं कह सकूँगी — 'ये देखो। यही मिट्टी।'"
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