Spirit of a Fighter – Chapter 1272
मेरी जेब में जो काग़ज़ खटका था, वो मैंने खोला और मेरे हाथ काँपने लगे। और जब माँ ने चौकी पर बैठे-बैठे कहा "मत आना, बेटा", तो मेरे पैर जैसे जम गए।
पर मैं रुका नहीं। रुकना क्या था — मैं उल्टा उसी तरफ़ बढ़ा, चौकी की तरफ़, जहाँ माँ बँधी थी। नंदकिशोर मेरे और माँ के बीच आ खड़ा हुआ, हाथ में वो छोटा काग़ज़ लहराते हुए।
"लो, अब मानो," वो मुस्कुराया। "मैंने तो सिर्फ़ लिखा था। सच तो तुम्हारी माँ बताएगी। पूछो ना, पूछो — उस रात हवेली की नींव पर कौन था?"
मैंने उस काग़ज़ को उसके हाथ से छीनकर अपनी नाक के पास लाया। स्याही ताज़ी थी, हाँ, पर उसके नीचे एक और गंध थी। कपूर। और हल्दी। वो हल्दी जो माँ अपने माथे पर लगाती है, सुबह-सुबह, चक्की चलाने से पहले।
मेरा दिमाग़ जैसे धीरे-धीरे खुलने लगा।
"ये काग़ज़ तूने नहीं लिखा," मैंने धीरे से कहा।
नंदकिशोर की मुस्कान ज़रा-सी हिली।
"हूँ?" उसने कहा।
"तूने स्याही बदली होगी," मैंने काग़ज़ सूँघते हुए कहा। "पर काग़ज़ पुराना है। इसके कोने मुड़े हैं — महीनों पुराने। और इस पर हल्दी लगी है। तेरे हाथों पर हल्दी कहाँ से आएगी? तू तो दिन-रात चंदन और तेल में रहता है।"
मैंने मुड़कर माँ की तरफ़ देखा। माँ की आँखें बंद थीं, और उनके होंठ हिल रहे थे — कुछ पढ़ रही थीं, कुछ याद कर रही थीं।
"माँ," मैंने कहा। "ये काग़ज़ तूने लिखा था। कब?"
माँ ने आँखें खोलीं। उनकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ में वो ढलान नहीं थी जो टूटे आदमी की होती है। आवाज़ सीधी थी।
"बीस साल पहले," उन्होंने कहा। "उस रात।"
अँधेरे में सन्नाटा छा गया। शेराज़ के हाथ की मशाल की आवाज़ — फड़फड़, फड़फड़ — बस वही सुनाई दे रही थी। नंदकिशोर की आँखें छोटी हो गईं।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई। "तू उस रात हवेली की नींव पर थी?"
माँ ने सीधे मेरी आँखों में देखा। और फिर उन्होंने वो किया जो मैंने आज तक कभी नहीं देखा था — उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई भारी बोझ उतार रही हों।
"मैं तेरे बाप को बचाने गई थी," उन्होंने कहा। "पर मैं देर से पहुँची।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"तू… तू वहाँ कैसे पहुँची?" मैंने पूछा। "तुझे कैसे पता चला?"
"कालू काका आए थे," माँ ने कहा। "रात को। उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया और कहा — 'सरस्वती, भवानी को बचाना है। हवेली की नींव में।' और मैं उठी। तू सो रहा था, तेरी बहन सो रही थी। मैंने तुझे उठाया, क्योंकि मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ सकती थी। तू मेरी गोद में था, और मैं दौड़ी।"
मेरी साँस रुक गई।
"तू मुझे ले गई थी?" मैंने कहा। "वहाँ? उस रात?"
"हाँ," माँ ने कहा। "और जब मैं पहुँची, तेरे बाप वहाँ नहीं थे। वहाँ कुछ और था।"
नंदकिशोर ने एक कदम आगे बढ़ाया, पर मैंने हाथ उठाया और वो रुक गया। मेरे हाथ में वो काग़ज़ था, और मेरी आँखों में वो सब था जो अभी टूट रहा था और जुड़ रहा था, एक साथ।
"वहाँ क्या था, माँ?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी, बहुत धीमी। "क्या था उस नींव पर?"
माँ ने अपनी आँखों से आँसू पोंछे — नहीं, उन्होंने पोंछे नहीं, आँसू अपने आप बह रहे थे, और वो उन्हें रोक नहीं रही थीं। यही उनकी सबसे बड़ी बात थी। माँ कभी रोती नहीं थीं, और आज उनके आँसू उनकी मर्ज़ी से नहीं, उनके शरीर से बह रहे थे।
"वहाँ एक औरत थी," माँ ने कहा। "उसकी साड़ी पर मिट्टी थी, और उसके हाथ में कटोरी थी। और वो कटोरी में… वो कटोरी…"
माँ की आवाज़ रुक गई। उन्होंने अपना हाथ ऊपर उठाया, और अपने गले की तरफ़ इशारा किया — जैसे कुछ अटक रहा हो।
"पीली शीशी," मैंने कहा।
माँ ने सिर हिलाया।
"और वो औरत कौन थी?" मैंने पूछा।
माँ ने नंदकिशोर की तरफ़ देखा। और फिर उन्होंने वो नाम लिया जो मेरे दिल में चाकू की तरह उतरा।
"गंगा देवी," उन्होंने कहा। "वही औरत।"
मैंने पलटकर गंगा देवी की तरफ़ देखा। वो अभी भी वहीं खड़ी थी — हवेली के पिछले आँगन में, जहाँ मैंने उन्हें अभी-अभी सब कुछ कबूल करते सुना था। उनका चेहरा पत्थर जैसा था। वो पहले ही कह चुकी थीं कि उस रात वो वहाँ थीं। पर मैंने सोचा था कि वो बाद में आई थीं। काग़ज़ उठाने के लिए। पर नहीं — वो पहले से वहाँ थीं। बीस साल पहले। उसी रात। उसी गड्ढे के पास।
मेरी आँखों के सामने पूरी तस्वीर बनने लगी।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप रही थी। "तूने मुझे वहाँ क्यों लिया? तू वहाँ मुझे क्यों ले गई?"
माँ ने अपना हाथ बढ़ाया और उन्होंने मेरा चेहरा पकड़ा। उनके हाथ ठंडे थे, और काँप रहे थे। उन्होंने मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया, और उनकी आँखों में वो सारा दर्द था जो बीस साल से दबा हुआ था।
"क्योंकि उस रात," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ फट गई, "मुझे पता था कि तेरे बाप को कोई मारने वाला है। और मुझे यह भी पता था कि अगर मैं उन्हें नहीं बचा पाई, तो मैं उनका सबसे कीमती चीज़ बचा लूँगी।"
उन्होंने मेरे चेहरे को और कसकर पकड़ा।
"मैं वहाँ तेरे बाप की लाश नहीं उठाने गई थी, वीर। मैं तुझे उठाने गई थी।"
मेरी आँखों से आँसू नहीं आए। नहीं, मेरे अंदर कुछ और टूटा — वो कुछ जो मैंने बीस साल से अपने दिल में सहेज रखा था, वो शिकायत कि माँ ने मुझे कभी बताया नहीं। कि माँ ने सब छिपाया। कि माँ चुप रही।
वो शिकायत अब हवा में उड़ रही थी।
"तू वहाँ गई थी," मैंने धीरे से कहा। "तू मुझे लेकर गई थी। और मैं तेरी गोद में था।"
"हाँ," माँ ने कहा। "और जब मैं पहुँची, तो तेरे बाप पहले से गिरे हुए थे। उनकी आँखें खुली थीं। उन्होंने मुझे देखा, और उन्होंने पहले तुझे देखा। और फिर उन्होंने मुझसे कहा…"
माँ रुक गईं। उनका गला भर आया।
"क्या कहा, माँ?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ भी भर आई थी।
"उन्होंने कहा — 'इसे अखाड़े की मिट्टी में ले जाना। एक दिन ये वहाँ खड़ा होगा।'"
अँधेरा था, मशाल की रोशनी थी, और मेरे सामने मेरी माँ थी — बीस साल की चुप्पी वाली माँ। वो औरत जो सुबह चार बजे उठती थी, चक्की चलाती थी, दाल में नमक कम डालती थी ताकि बेटा सोचे कुछ बदला है। वो औरत जो जानती थी कि बेटा रातों को अखाड़े के बाहर खड़ा रहता है, पर कभी नहीं बोली।
मैंने उनके हाथ पकड़े और उन्हें अपने माथे पर रखा।
"तू डरी थी?" मैंने पूछा।
"बहुत," उन्होंने कहा। "और मैं आज तक डरी हुई हूँ। हर रोज़। हर सुबह जब तू घर से निकलता है। हर रात जब तू देर से लौटता है। मैं हर वक़्त सोचती हूँ — कहीं आज वही रात न हो जो बीस साल पहले थी।"
नंदकिशोर ने ठंडी आवाज़ में कहा, "बहुत मीठा है। पर मुझे तुम्हारे आँसुओं से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।"
मैंने पलटकर उसकी तरफ़ देखा। मेरी आँखों में अब पानी नहीं था। अब उसमें कुछ और था — वो आग जो रणवीर सिंह ने कहा था कि तहखाने की मिट्टी में है।
"तू," मैंने कहा, "बहुत बोल रहा है आज।"
नंदकिशोर मुस्कुराया। "क्योंकि आज मेरा दिन है। तेरी माँ ने तुझे बचाया, बहुत अच्छा। पर तूने सुना नहीं जो उसने कहा? वो औरत वहाँ थी — गंगा देवी। तो अब बताओ, किसकी माँ महान है? तेरी, जो तुझे लेकर भागी? या वो, जो अपने ही हाथों से…"
वो रुका, और मुस्कुराया, और उसकी मुस्कान में वो सब था जो मुझे डराता था।
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