Spirit of a Fighter – Chapter 1271
"उस रात," रणवीर सिंह ने कहा, "मैंने हवेली में एक औरत की रोने की आवाज़ सुनी थी। मैं दौड़कर आया। दरवाज़ा खुला था। अंदर कोई नहीं था। पर नींव के पास एक खुला गड्ढा था — ताज़ा खोदा हुआ। और उस गड्ढे से एक पोटली निकली थी। मैंने पोटली उठाई। उसमें सुहानी का कंगन था और एक काग़ज़ — वही काग़ज़ जिस पर भवानी ने अपने भाई का नाम लिखा था।"
वो रुके। उन्होंने अपने हाथों को देखा, जैसे उनमें आज भी वो पोटली हो।
"और फिर मुझे पीछे से किसी ने धक्का दिया। मैं गड्ढे में गिरा। मेरी कमर पत्थर पर लगी। और ऊपर खड़े आदमी ने मिट्टी डालनी शुरू कर दी — एक फावड़ा, दो फावड़ा, तीन। मैंने उसका चेहरा नहीं देखा। मैंने सिर्फ़ उसकी आवाज़ सुनी — उसने कहा, 'अब तू भी उसी नींव में सोएगा, जिसे तूने खोदा है।'"
गंगा देवी ने अपने हाथ चेहरे से हटाए। उसकी आँखें बड़ी हो गई थीं।
"पर तू बच गया," वो फुसफुसाई। "तू बाहर निकला।"
"मैं बच गया," रणवीर सिंह ने कहा, "क्योंकि उस रात हवेली में एक और आदमी था। कोई और। उसने मिट्टी डालने वाले को रोका। उसने मुझे खींचकर बाहर निकाला। और वो आदमी मेरे पास रात भर बैठा रहा, और मुझे लेकर अपने घर गया, और मेरी कमर पर पट्टी बाँधी।"
मैंने रणवीर सिंह की आँखों में देखा। मेरी साँस रुक गई थी।
"कौन था वो आदमी?"
"तेरा बाप," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आँखों में पानी आ गया। "भवानी सिंह। वो उस रात हवेली में आया था सुहानी की हड्डियाँ निकालने। और उसने मुझे बचाया। पर उसने मुझे बचाने के लिए अपना सबसे बड़ा सबूत छोड़ दिया — वो काग़ज़, जो मेरे हाथ से गड्ढे में गिर गया था। भवानी उसे निकाल नहीं पाया, क्योंकि मिट्टी गिर रही थी। और अगले दिन उसे ज़हर दे दिया गया।"
मैं आँगन की मिट्टी पर बैठ गया। मेरे पैर मुझे नहीं उठा रहे थे। मेरी नज़र अपनी बोरी पर गई — वो मिट्टी जो मैंने तहखाने से लाई थी। मैंने बोरी खोली और उसमें हाथ डाला। मिट्टी ठंडी थी, और उसमें एक गंध थी — ताज़ी खोदी मिट्टी की। पर उसके नीचे, और गहरे में, एक और गंध थी — कपूर की, और बादाम के तेल की, और किसी पुराने धुएँ की।
मैंने अपनी हथेली अपनी नाक के पास लाई। और मेरी आँखें बंद हो गईं।
"ये मिट्टी…" मैंने धीरे से कहा, "ये मिट्टी तहखाने की नहीं है।"
सब चुप हो गए।
"ये मिट्टी उसी नींव की है जिसकी बात आप कर रहे हैं," मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखते हुए कहा। "ये मिट्टी सुहानी की हड्डियों के पास से आई है।"
गंगा देवी की आवाज़ आई, और उसमें पहली बार सच्चा डर था।
"तू… तूने ये मिट्टी कहाँ से ली?"
"तहखाने से," मैंने कहा। "जहाँ कालू काका ने मुझे भेजा था। पर ये मिट्टी तहखाने की नहीं है। ये वहाँ से आई है जहाँ कोई पहुँच नहीं सकता।" मैंने मुट्ठी भर मिट्टी उठाई और उसे आँगन की मशाल की रोशनी में देखा। "क्योंकि तहखाने की मिट्टी लाल है। और ये मिट्टी…" मैंने उसे टिंकू की तरफ़ बढ़ाया। "…काली है।"
टिंकू ने उसे सूंघा। उसका चेहरा पीला पड़ गया।
"ये तो…" वो फुसफुसाया, "…ये तो तालाब के नीचे वाली मिट्टी है।"
आँगन में सन्नाटा छा गया। मशालें चटक रही थीं। माँ ने अपना सिर उठाया, और उनकी आँखों में वो चमक लौट आई जो मैं बचपन से देखता आया हूँ — वो चमक जो माँ के पास तभी आती है जब वो कुछ जानती है और उसे बोलना पड़ता है।
"गंगा," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ रस्सी से बँधी थी, पर साफ़ थी। "अब बता। तूने सुहानी की लाश कहाँ दबाई है? सच बता। क्योंकि अगर तूने सुहानी को नींव में दबाया है, तो वो लाश आज भी वहीं है। और अगर जगदीश ने उसे कहीं और ले जाकर दबाया है, तो तू जानती है कहाँ।"
गंगा देवी ने माँ की तरफ़ देखा। और फिर उसने वो किया जो मैंने उससे उम्मीद नहीं की थी।
वो माँ के पास गई। और माँ के पैरों पर बैठ गई।
"सरस्वती," वो रोई, "मैंने तेरे भाई की मौत का काग़ज़ उठाया था। मैंने तेरे पति को बचाने की कोशिश नहीं की। पर आज मैं तुझसे वादा करती हूँ — अगर मैं ज़िंदा रही, तो मैं अदालत में खुद खड़ी होकर सब बोलूँगी। जगदीश के खिलाफ़। भैरव के खिलाफ़। और अपने खिलाफ़ भी।"
माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा। और फिर माँ ने वो कहा जो सिर्फ़ माँ कह सकती है।
"उठ," माँ ने कहा। "अभी रोने का वक़्त नहीं है। अभी तेरी गवाही चाहिए। अदालत कल है।"
मैंने अपनी बोरी उठाई। उसका वज़न पहले से भारी लग रहा था। मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"टिंकू, सुबह होते ही पंचायत के चबूतरे पर सबको बुला। रणवीर सिंह, इंस्पेक्टर शर्मा को इत्तिला दीजिए। और गंगा देवी…" मैंने उनकी तरफ़ देखा, "…आप अपनी गवाही लिखवा लीजिए। कल अदालत में पढ़ने के लिए।"
गंगा देवी ने सिर हिलाया। उनकी आँखों में अब वो शांति नहीं थी जो पहले थी। अब वहाँ कुछ और था — शायद हल्कापन।
मैं हवेली से बाहर आया। बाहर की हवा ठंडी थी। आसमान में तारे थे, और दूर कहीं एक मुर्गा बाँग दे रहा था। सुबह होने वाली थी।
मीरा रास्ते पर खड़ी थी। जैसा उसने कहा था — वो दूर नहीं गई थी। वो वहीं खड़ी थी, और उसके हाथ में लालटेन थी, और उसकी आँखें मुझे ढूँढ रही थीं।
मैं उसके पास पहुँचा। मेरे हाथ में मिट्टी की बोरी थी, और मेरी आँखों में वो सब था जो मैंने आज रात सुना था।
"निकल आया?" उसने पूछा।
"निकल आया," मैंने कहा। "पर मेरे बाप ने रणवीर सिंह की जान बचाई थी। और उसी रात उन्हें ज़हर दिया गया।"
मीरा ने लालटेन नीचे रखी। उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी हथेली गरम थी।
"और वो काग़ज़?" उसने पूछा।
"वो काग़ज़ हवेली की नींव में है। उसी जगह जहाँ सुहानी की हड्डियाँ हैं। और उसी जगह जगदीश ने एक और चीज़ छिपाई है — वो चीज़ जिसने रणवीर सिंह के पैर लिए।"
मीरा ने मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखों में वो ज़िद लौट आई थी जो मुझे पहले दिन मिली थी।
"तो कल सुबह," उसने कहा, "हम उस नींव को खोदेंगे।"
"कल सुबह," मैंने कहा, "पहले पंचायत। और फिर नींव। और मीरा…"
"हाँ?"
"अगर उस नींव में वो काग़ज़ मिला, तो मेरे बाप का कातिल पकड़ा जाएगा। पर अगर वो काग़ज़ मिला ही नहीं, तो मेरे बाप की मौत आज भी बिना सबूत की रहेगी।"
मीरा ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ा।
"तो मिलेगा," उसने कहा। "क्योंकि तू है। और तेरे बाप ने अपनी जान देकर उस काग़ज़ को बचाया था। वो काग़ज़ तेरे बाप का आख़िरी शब्द है। और आख़िरी शब्द कभी खोता नहीं।"
मैंने उसका हाथ छोड़ा और आसमान की तरफ़ देखा। पूरब में लाली फूट रही थी।
"सुबह हो रही है," मैंने कहा।
"हाँ," मीरा ने कहा। "और आज सुबह के बाद कोई रात नहीं होगी, वीर।"
मैंने बोरी कंधे पर रखी और चल पड़ा। मेरे पीछे मीरा थी, और मेरे आगे वो सुबह थी जिसका इंतज़ार मेरे बाप ने बीस साल किया था।
पर जब मैं चबूतरे की तरफ़ बढ़ रहा था, मेरी जेब में कुछ खटका। मैंने हाथ डाला। एक काग़ज़ था — छोटा, मुड़ा हुआ, और उस पर ताज़ी स्याही की गंध थी।
मैंने उसे खोला। मशाल की रोशनी में पढ़ा।
"नींव में तेरा बाप नहीं है। नींव में तेरी माँ है। — जगदीश"
मेरे हाथ से बोरी फिसल गई। मिट्टी आँगन में फैल गई, और उस काली मिट्टी से एक गंध उठी — कपूर, बादाम का तेल, और माँ के आँचल की गंध।
मैं पलटा। माँ चौकी पर बैठी थीं, रस्सी बँधी, और उनकी आँखें मुझ पर टिकी थीं। उनके होंठ हिले। और इस बार मैंने सुना।
"मत आना, बेटा।"
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