Spirit of a Fighter – Chapter 1270
गंगा देवी चौकी के पास खड़ी थी। सफ़ेद साड़ी, हाथ में मशाल नहीं, एक ताँबे का दीपक। उसका चेहरा पहले जैसा ही था — साफ़, शांत, बुढ़ापे की झुर्रियाँ भी ऐसी जैसे गुस्से की नहीं, बर्दाश्त की हों। पर आज उसकी आँखों में कुछ और था। भूख। वो भूख जो बीस साल से पेट में पली हो।
"मैं जानती थी तू आएगा," उसने कहा। "जिस दिन भवानी की लाश उठी थी, उस दिन भी मैंने यही सोचा था — इस घर से एक बेटा निकलेगा जो सच को नहीं छोड़ेगा। बीस साल लग गए, पर निकला।"
मैंने बोरी नीचे रखी। मेरी आवाज़ शांत रखने की कोशिश की, पर वो काँप रही थी।
"आपने क्या किया था, गंगा देवी? आपने भैरव को क्या दिया था जिससे वो बीस साल तक पहलवानों को ज़हर देता रहा?"
वो मुस्कुराई। वो मुस्कान मुझे ठंडी लगी।
"मैंने कुछ नहीं दिया," उसने कहा। "पर मैंने कुछ छुपाया ज़रूर।"
वो चौकी के पास रखी एक पुरानी तिपाई पर बैठ गई। दीपक उसने अपने घुटनों पर रखा। और जब बोली, तो आवाज़ धीमी थी, जैसे कोई पुरानी बही खोल रही हो।
"जिस दिन भवानी मरा, उस रात मैं हवेली में थी। नीचे, तहखाने में। मैंने भवानी को देखा — खून में लेटा, होंठ काले, आँखें खुली। और उसकी मुट्ठी में एक काग़ज़ था। मैंने वो काग़ज़ खींचकर निकाला। उस पर भवानी की लिखाई थी — उसने अपने भाई जगदीश का नाम लिखा था। उसने लिखा था कि जगदीश ने अखाड़ा माँगा था, न मिलने पर पानी में ज़हर दिया था।"
मैंने अपनी साँस रोकी। मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।
"और तुमने वो काग़ज़ क्या किया?"
"मैंने सोचा।" उसने आँखें नीची कर लीं। "मैंने सोचा — जगदीश भवानी का भाई है। भाई का भाई से झगड़ा है। अगर मैं ये काग़ज़ जगदीश को दूँगी, तो वो शायद शरमाएगा। माफ़ी माँगेगा। ये घर बच जाएगा। मेरा बेटा बलवंत बच जाएगा।"
वो रुकी। उसका हाथ दीपक की लौ पर गया, और फिर हट गया।
"मैंने काग़ज़ जगदीश को दे दिया। और जगदीश ने…" उसकी आवाज़ पहली बार टूटी, "…जगदीश ने वो काग़ज़ भैरव को दे दिया। और भैरव ने उस काग़ज़ को पढ़कर अपने हाथ में एक हथियार पा लिया — भवानी का डर। बीस साल तक वो उसी काग़ज़ को दिखाकर पहलवानों को डराता रहा, कहता रहा कि देखो, भवानी ने खुद अपने भाई का नाम लिखा था, तो मैं कौन हूँ।"
मेरे पैर के नीचे ज़मीन खिसक गई। मैं एक कदम पीछे हटा। मेरी नज़र माँ पर गई। माँ का सिर झुका हुआ था, और मैं समझ गया — माँ को ये पता था। शायद बीस साल से।
"तो सच की जड़ में…" मैंने धीरे से कहा, "आप खड़ी थीं। मेरे बाप की मौत का काग़ज़ आपने उठाया। और आपने उसे उसी आदमी को दे दिया जिसने मेरे बाप को मारा था।"
गंगा देवी चौकी से उठी। और फिर वो मेरे पैरों पर गिर पड़ी। उसके घुटने आँगन की मिट्टी पर टकराए। दीपक उसके हाथ से छूटकर लुढ़क गया, और तेल आँगन में फैल गया।
"माफ़ कर दे, बेटा," वो रोई। "मैंने अपने लालच में अपने ही भाई की मौत का काग़ज़ बेच दिया। मैंने सोचा था मैं अपने बेटे को बचा रही हूँ। पर मैंने बीस साल तक हर उस माँ का बेटा मारा जो अखाड़े में आया। माफ़ कर दे।"
मैंने उसे उठाया। उसकी कलाई पकड़ी, और उसके हाथ की हड्डियाँ मेरी मुट्ठी में पतली लगीं। मैंने उसे उठाकर चौकी पर बैठाया।
"बुआ," मैंने कहा। मेरी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। जो था, वो शायद थकान थी। "माफ़ी माँगने से कुछ नहीं होता। जो होना था, हो गया। मेरे बाप मरे। सत्रह पहलवान मरे। उनकी माँएँ आज भी रोती हैं। अब आप मुझे एक बात बताओ — वो काग़ज़ कहाँ है? जिस पर मेरे बाप ने अपने भाई का नाम लिखा था? वो काग़ज़ जिसे आपने उठाया था?"
गंगा देवी ने अपनी आँखें पोंछीं। उसकी आवाज़ अब रोने जैसी नहीं थी। अब उसमें वो सख्ती लौट आई थी जो मुझे पहले मिली थी।
"वो काग़ज़ जगदीश के पास है। जगदीश ने उसे कहीं ऐसी जगह छिपाया है जहाँ से तू कभी नहीं निकाल पाएगा।"
"कहाँ?"
वो उठी। मेरे पास आई। उसने मेरी आँखों में देखा, और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे सुनने के लिए झुकना पड़ा।
"उसी हवेली की नींव में। जहाँ सुहानी की लाश दबी है।"
मेरा दिल एक पल के लिए रुक गया। सुहानी। वो नाम मैंने सुना था — बलवंत की माँ, रघुवीर की बीवी, जो मर चुकी थी। और अब पता चल रहा था कि वो हवेली की नींव में दबी है।
"सुहानी की लाश…" मैंने दोहराया।
"जगदीश ने उसे मारा नहीं था," गंगा देवी ने कहा। "वो खुद मरी थी — बुखार से। पर जगदीश ने उसकी लाश को जलाया नहीं। उसने उसे उसी कमरे की नींव में दबा दिया जहाँ भवानी ने अपनी डायरी छिपाई थी। और उसी नींव में उसने भवानी का काग़ज़ भी डाल दिया। ताकि जो उस काग़ज़ को ढूँढने जाए, वो पहले सुहानी की हड्डियों से टकराए। और फिर…"
वो रुकी।
"और फिर क्या?"
"और फिर वो कभी बाहर न आए। क्योंकि उस नींव में जगदीश ने एक और चीज़ छिपाई थी। एक ऐसी चीज़ जो सुहानी की हड्डियों से भी पुरानी है।"
तभी पीछे से आवाज़ आई।
"वीर, रुक!"
मैं पलटा।
हवेली के फाटक पर रणवीर सिंह की व्हीलचेयर खड़ी थी। पीछे उन्हें धकेल रहा था टिंकू — हाँफता हुआ, माथे पर पसीना। और रणवीर सिंह के हाथ काँप रहे थे। उनकी आँखों में पहली बार डर साफ़ दिख रहा था — वो डर जो बीस साल से वो छिपा रहे थे।
"हवेली की नींव मत छूना, वीर!" उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में वो गरज नहीं थी, सिर्फ़ घबराहट थी। "वहाँ जगदीश ने बीस साल पहले एक और चीज़ छिपाई थी — मेरे पैरों की असली वजह।"
मैंने गंगा देवी की तरफ़ देखा। वो अपने होंठ काट रही थी।
"अब और मत छुपाओ, बुआ," मैंने कहा। "रणवीर सिंह, आप अंदर आइए। आज रात सबको सच बोलना पड़ेगा।"
टिंकू रणवीर सिंह की व्हीलचेयर धकेलकर आँगन में लाया। चौकी के पास पहुँचकर उसने व्हीलचेयर रोकी और खुद मेरे पास आकर खड़ा हो गया। उसका हाथ मेरे कंधे पर आया। उसका हाथ काँप रहा था, पर वो मेरे साथ खड़ा था।
रणवीर सिंह ने गंगा देवी को देखा। बीस साल का गुस्सा उनकी आँखों में था।
"तू जानती थी," उन्होंने कहा। "तू बीस साल से जानती थी कि मेरे पैर कैसे गए, और तूने कभी नहीं बताया।"
गंगा देवी ने अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया।
"मैं डरती थी," वो फुसफुसाई। "अगर मैंने बोला, तो जगदीश बलवंत को मार देता।"
"तो तूने मेरे पैरों की कीमत अपने बेटे की जान से चुकाई," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर हर शब्द सिक्के की तरह गिर रहा था। "और मैंने बीस साल तक सोचा कि मेरे पैर उस पानी से गए जो मैंने खुद पिया था।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"तो आपने वो पानी नहीं पिया था?"
रणवीर सिंह ने अपनी मुट्ठी कसी। उन्होंने आँखें बंद कीं, और फिर खोलीं।
"मैंने पिया था," उन्होंने कहा। "पर एक घूँट। बस एक। और उस एक घूँट ने मेरे पैर नहीं लिए। उस एक घूँट ने तो सिर्फ़ मेरे हाथ कमज़ोर किए थे। मेरे पैर तो…" वो रुके। उनका गला भर गया। "मेरे पैर तो उस रात गए जब मैं उसी नींव के पास गया था। जब मैंने वहाँ से सुहानी की हड्डियाँ निकालने की कोशिश की थी।"
मेरा दिमाग़ सुन्न हो गया। मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। टिंकू की तरफ़ देखा, वो भी मुझे देख रहा था, और उसके मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी।
"आप नींव के पास गए थे?" मैंने पूछा। "आपने सुहानी की हड्डियाँ निकालने की कोशिश की थी?"
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