Spirit of a Fighter – Chapter 1269
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। "तो चल। गंगा देवी से सीधे पूछते हैं।"
"रुक।" मैंने रास्ता रोका। "अगर भैरव सच बोल रहा है, तो गंगा देवी को पता है कि हम जान गए हैं। और जो औरत बीस साल से सबके पीछे छुपी है, वो अब हमला करेगी।"
"तो क्या करें?"
मैंने जेब से पीली शीशी निकाली। चाँदनी में उस पर भवानी का नाम चमक रहा था।
"मैं माँ के पास जाऊँगा," मैंने कहा। "अगर शीशी माँ के पास से आई है, तो उन्हें पता होना चाहिए कि गंगा देवी ने वो शीशी उन्हें कब दी। और क्यों दी।"
हम गाँव की तरफ़ चले। रास्ते में मीरा ने कुछ नहीं पूछा। बस एक बात कही, नहर के पुल के पास। "वीर, तेरे पास नींद नहीं है। दो रात से तू सोया नहीं है। तेरे हाथ काँप रहे हैं।"
"मुझे पता है।"
"तो तू मेरी बात सुन।" उसने मेरा हाथ पकड़कर रोका। "जो भी हो, तू अकेले नहीं जाएगा। जब तक तेरी आँखों में ये चमक है, मैं तेरे साथ हूँ। पर जब वो चमक चली जाए, तो मेरी बात मानना।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। चाँदनी में उसका चेहरा थका हुआ था — मुझसे भी ज़्यादा। दो रात से वो मेरे साथ चली आ रही थी। उसने एक बार नहीं कहा कि मैं घर जाऊँ।
"मीरा," मैंने कहा, "तेरे हाथ में दवा की पोटली है। अपने लिए कुछ बचा।"
"मैं ठीक हूँ," वो बोली। फिर मुस्कुराई। "पर तू अगर पंचायत में बेहोश हो गया, तो टिंकू मुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेगा।"
मैं हँसा। दो रात बाद पहली बार।
पर माँ के घर पहुँचकर वो हँसी गायब हो गई। दरवाज़ा खुला था। अंदर अंधेरा था। मैंने आवाज़ दी — कोई जवाब नहीं। मेरा दिल धक्क से रह गया।
"माँ!" मैं दौड़ा अंदर। चक्की का पत्थर वैसे ही था। चूल्हा बुझा हुआ। माँ की चारपाई खाली। गुड़िया की किताबें ज़मीन पर बिखरी थीं।
"माँ!" फिर मैंने गुड़िया का नाम लिया। कोई नहीं।
मीरा ने मेरा कंधा पकड़ा। "वीर, घबरा मत। देख, दीया जल रहा है।"
मैंने देखा। कोने में छोटा-सा दीया जल रहा था। उसके पास एक काग़ज़ रखा था। मेरे हाथ काँप रहे थे जब मैंने उसे उठाया।
काग़ज़ पर माँ की लिखाई थी, पर लिखाई लरज़ रही थी — जैसे हाथ काँपते वक़्त लिखी हो।
"वीर, गंगा देवी ने मुझे बुलाया है। कह रही है शीशी का सच खुद बताएगी। मैं गुड़िया के साथ जा रही हूँ। तू मत आना। यहाँ मत आना।"
और नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में: "पर अगर आना ही पड़े, तो तहखाने की मिट्टी अपने साथ ले आना। वो मिट्टी कुछ भी सह लेती है।"
मैंने काग़ज़ मीरा की तरफ़ बढ़ाया। "माँ इस गाँव में हैं," मैंने कहा। "गंगा देवी की हवेली में। और शायद सबसे बड़ा सच भी।"
मीरा ने काग़ज़ पढ़ा। उसका चेहरा सख़्त हो गया। "वीर, अगर ये औरत बीस साल से सबके पीछे छुपी बैठी है, तो उसने तुझे अब तक क्यों नहीं मारा? तेरे पास शीशी थी। तू अकेला आता-जाता रहा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। यही सवाल मेरे दिमाग़ में भी था। और जवाब सिर्फ़ एक था।
"क्योंकि वो चाहती थी," मैंने कहा, "कि मैं खुद वहाँ पहुँचूँ। खुद उसके जाल में आऊँ।"
मैंने अपनी मुट्ठी कसी। फिर याद आया — तहखाने की मिट्टी। मैंने इधर-उधर देखा। बोरी। माँ की सिलाई की हुई थी। मैंने उसमें मिट्टी भरी। भरी हुई बोरी कंधे पर रखी। वो भारी थी, और मुझे उसी भार की ज़रूरत थी।
"मीरा," मैंने कहा, "तू मेरे साथ नहीं आएगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर वो औरत मेरी माँ और बहन को बंधक बनाकर मुझसे कुछ माँगेगी, तो मैं उसका सौदा लूँगा। और तब मुझे तेरी चिंता करने का मौक़ा नहीं मिलना चाहिए।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में गुस्सा था। "तू मुझे कमज़ोर समझता है?"
"नहीं।" मैंने उसका हाथ पकड़ा। "मैं तुझे कमज़ोर नहीं समझता। मैं तुझे अपनी ताकत समझता हूँ। और इसीलिए तुझे दूर रखना चाहता हूँ — क्योंकि जिस पल मैं तेरी तरफ़ देखूँगा, उस पल मेरा ध्यान भटकेगा। और वो पल मुझे नहीं चाहिए।"
वो कुछ देर चुप रही। फिर उसने अपना हाथ छुड़ाया और अपने बाल पीछे किए।
"मैं दूर नहीं जाऊँगी," वो बोली। "मैं रास्ते पर रहूँगी। अगर सुबह तक तू नहीं आया, तो मैं अंदर आऊँगी। चाहे जो हो।"
मैंने सिर हिलाया।
फिर मैंने काग़ज़ जेब में रखा। और उस पल मेरे हाथ में कुछ और आया। माँ की चारपाई के नीचे, एक छोटी-सी पोटली। मैंने खोली। उसमें सूखी हल्दी का एक टुकड़ा, एक नारियल का टुकड़ा, और एक चाँदी की अँगूठी थी।
वही अँगूठी। जो मुझे पहले कहीं मिली थी। मैंने उसे उँगली पर घुमाया। उस पर वही निशान था — बाहरी पानी वाले आदमी का।
मैंने अँगूठी सीने से लगाई। "माँ," मैंने धीरे से कहा, "तू मुझे बुला रही है। और मैं आ रहा हूँ।"
मीरा ने मेरा कंधा थपथपाया। "रास्ते में सुन।" उसने अपना बैग खोला। "ये हरी शीशी। अदरक और तुलसी की। अगर वो औरत कुछ पिलाए, तो इसे जेब में रखना। और ये छोटी बात सुन — अगर वो तुझे वहाँ बंधक बनाकर कुछ माँगे, तो तू बस एक काम करना। मेरी तरफ़ देखना। मैं तेरे लिए रास्ता बनाऊँगी।"
मैंने हरी शीशी ली। उसकी ठंडक मेरी हथेली से सीधे दिल तक गई।
"मीरा," मैंने कहा, "तू अगर मेरे लिए रास्ता बनाएगी, तो वो रास्ता तेरे लिए भी खुला रहना चाहिए।"
"मैं जानती हूँ।" उसने मुस्कुराकर कहा। "अब चल। देर मत कर।"
मैं हवेली की तरफ़ चला। बोरी कंधे पर थी। काग़ज़ जेब में। और दिल में एक ही बात — माँ ने लिखा था "यहाँ मत आना।"
पर मैं आ रहा था। क्योंकि जो माँ कहती है "मत आना," वो असल में कहती है "आ जा, बेटा। जल्दी आ जा।"
हवेली का दरवाज़ा खुला था। अंदर से मशालों की रोशनी आ रही थी, और हवा में कपूर और बादाम के तेल की गंध थी। मैंने दरवाज़े पर कदम रखा।
और फिर मैंने वो आवाज़ सुनी जो मुझे अंदर बुला रही थी। मीठी, धीमी, और बहुत पुरानी।
"आ जा, भवानी के बेटे। मैं तेरी ही बाट जोह रही थी।"
मैं रुका। मेरा हाथ बोरी पर कस गया।
"गंगा देवी," मैंने कहा, "मैं आ गया। पर एक बात पहले बता — मेरी शीशी तेरे पास से मेरे पास कैसे पहुँची?"
अंदर से हँसी आई। ठंडी, हल्की, जैसे किसी बंद कमरे में हवा फँस गई हो।
"अंदर आ," उसने कहा। "तेरी माँ भी यहीं है। और तेरी बहन भी। तीनों सवालों के जवाब एक साथ मिल जाएँगे।"
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"अंदर आ," उसने कहा। "तेरी माँ भी यहीं है। और तेरी बहन भी। तीनों सवालों के जवाब एक साथ मिल जाएँगे।"
पर मैं अंदर नहीं गया। मेरा एक पैर दहलीज़ पर था, दूसरा बाहर। मशालों की रोशनी दरवाज़े से बाहर आकर मेरे पैरों पर पड़ रही थी, और उस रोशनी में मेरी परछाईं मेरे पीछे लंबी खिंची जा रही थी, जैसे कोई मुझे पीछे खींच रहा हो।
क्योंकि अब मैं जानता था। भैरव ने जेल में जो बातें बताई थीं, वो रात भर मेरे सिर में घूमती रहीं। कालू काका ने, जब मैं हवेली की तरफ़ निकला, मेरा हाथ पकड़कर कहा था — "बेटा, ध्यान से। गंगा देवी की आवाज़ मीठी है, पर उसकी मिठास में नशा है।"
"बोल, गंगा देवी," मैंने दहलीज़ से ही कहा। "क्या देखना है?"
"तू मेरा चेहरा देख," उसने कहा। "बीस साल से कोई मेरी आँखों में नहीं देखता। सब मुझे भवानी की बीवी कहते हैं, बलवंत की माँ कहते हैं। पर आज मैं तुझे वो दिखाना चाहती हूँ जो मैं असल में हूँ।"
मैं अंदर गया।
हवेली के आँगन में मशालें जल रही थीं — चार, छह, आठ। कितनी, गिनता नहीं रहा। आँगन के बीच एक चौकी पर माँ बैठी थीं, हाथ रस्सी से बँधे, और गुड़िया माँ की गोद में सिर रखे लेटी थी। गुड़िया की आँखें सूजी हुई थीं। माँ की आँखें सूखी। माँ ने मुझे देखा, और उनके होंठ हिले — कुछ नहीं बोलीं। बस होंठ हिले।
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