Spirit of a Fighter – Chapter 1268
जेल के अंदर की हवा अलग थी। गीली, बंद, और उसमें मूँज और पसीने की बू थी। लोहे की सलाखों के पीछे भैरव बैठा था। उसकी कलाई पर सफ़ेद पट्टी थी, और पट्टी पर खून का सूखा धब्बा। उसका भारी शरीर ढेर हो गया था, जैसे कोई पहाड़ खिसककर कोने में गिर गया हो। मूँछें अब भी बड़ी थीं, पर उनमें से तेल की चमक गई थी। आँखें… आँखें ऐसी थीं जैसे कुएँ का पानी नीचे जाकर देख रहा हो।
वो मुझे देखकर हिला नहीं। बस होंठों में कुछ आया।
"मैंने सोचा," उसने धीरे से कहा, "अगर मैं मर गया, तो तू मुझे माफ़ कर देगा।"
मैं सलाखों के पास गया। ज़मीन पर बैठ गया। उसके सामने। पहली बार उसके साथ बराबरी की ज़मीन पर।
"माफ़ी मरने से नहीं मिलती, भैरव," मैंने कहा। "माफ़ी सच बोलने से मिलती है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक देखा। और फिर वो हुआ जो मैंने कभी नहीं सोचा था। उसकी आँखों से पानी आया। पहले एक बूँद, फिर दो, फिर वो बहने लगा — बूढ़े आदमी का रोना, जिसमें न आवाज़ थी, न हिचकी। बस पानी, और वो भी चुपचाप। उसने अपनी अच्छी कलाई से मुँह ढक लिया, पर उँगलियों के बीच से आँसू टपकते रहे।
मैं कुछ नहीं बोला। मैंने ऐसा रोना एक बार पहले सुना था — अपनी माँ को, जब वो चक्की पर बैठकर रोई थी और मुझे लगा था वो गा रही है।
"मैंने सब अपने बेटे के लिए किया," वो फुसफुसाया। "करण। मैं उसे बड़ा पहलवान बनाना चाहता था। मैं खुद नहीं बन पाया, तो सोचा मेरा बेटा बनेगा। उसके लिए मैंने… उसके लिए मैंने किसी को नहीं छोड़ा।" उसकी आवाज़ टूटी। "और वो मेरे ही पानी से बीमार पड़ गया। मेरा अपना बेटा। मैं उसे देखता था, वो पीता था, और मैं कुछ नहीं बोलता था। क्योंकि मुझे लगता था — थोड़ा और, बस थोड़ा और, और वो जीत जाएगा।"
मैंने अपने घुटनों पर हाथ रखा। "और बाकी सोलह बच्चे, भैरव? उन्हें क्या तेरा बाप बनने का हक़ था?"
वो सिसक कर रुका। फिर वो मेरे पैरों की तरफ़ खिसका। मैंने उसे रोका नहीं।
"माफ़ कर दे, वीर," उसने कहा। उसकी आवाज़ ज़मीन से आ रही थी। "तू भवानी का बेटा है। उसने मुझे अपने घर में रखा, अपनी थाली में खिलाया। और मैंने उसे…" वो आगे नहीं बोल सका।
मैं झुका। मैंने उसकी भारी बाँह पकड़ी और उसे उठाया। वो उठा तो नहीं, पर मेरा हाथ बाँह पर रहा।
"माफ़ी मैं नहीं दूँगा, भैरव," मैंने कहा। "माफ़ी वो माँएँ देंगी जिनके बेटे लौटे ही नहीं। मैं तो उनमें से एक हूँ जो बच गया। मेरे पास माफ़ करने का हक़ नहीं।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "पर एक बात कहूँ — तेरे बेटे करण ने अपने बाप का नाम नहीं चुना। उसने अपने कर्म का नाम चुना। वो आज अखाड़े में मेरे साथ खड़ा था। और वो तुझसे ज़्यादा बड़ा आदमी निकला।"
भैरव सन्न रह गया। उसका मुँह खुला रह गया। मैंने देखा कि उसकी आँखों में जो पानी था, वो रुक गया। किसी चीज़ ने उसे जमा दिया।
"ये तेरी सबसे बड़ी सज़ा है," मैंने कहा। "तेरा ही बेटा तुझसे बेहतर निकला। तू जेल में बैठा है, और वो बाहर, सीना तानकर खड़ा है। और ये सज़ा कोई अदालत नहीं दे सकती थी। ये सिर्फ़ नसीब दे सकता था।"
भैरव ने अपना सिर दीवार से टिका दिया। उसकी साँस लंबी थी, भारी। फिर उसने कुछ ऐसा कहा जो मैंने सुना नहीं, महसूस किया।
"जगदीश मेरा भाई नहीं है, वीर।"
मैं रुक गया।
"वो मेरा भाई नहीं," उसने दोहराया। उसकी आवाज़ में अब वो मिठास नहीं थी, जो बीस साल से थी। सिर्फ़ थकान थी। "मैंने भी उसे भाई माना। मैंने भी उसके लिए सब किया। पर उसने मुझे भी धोखा दिया। उसने मेरा नाम आगे किया, अपना नाम कहीं नहीं रखा।"
"तो असली साज़िश करने वाला कौन है?"
भैरव ने आँखें उठाईं। और उसकी आँखों में जो था, वो डर नहीं था। वो कुछ और था — किसी पुरानी चीज़ का एहसास, जो अब भी उसके अंदर धुआँ बनकर भरा था।
"वो औरत," उसने कहा। "जो आज तक सबसे छुपी बैठी है। गंगा देवी।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"तू झूठ बोल रहा है।"
"मैं मरने की कोशिश कर चुका हूँ," भैरव ने कहा। "मरे हुए आदमी को झूठ बोलने की ज़रूरत क्या?" वो थोड़ा आगे झुका। "सुन, वीर। मैंने पैसा खाया, मैंने पानी दिया, मैंने पहलवानों को मारा — इनकार नहीं करता। पर जो बीज बोया गया, वो मेरा नहीं था। गंगा देवी ने मुझे भवानी के ख़िलाफ़ भरा। उसने कहा भवानी ने मेरे बाप को मारा था। उसने कहा भवानी मेरा सब कुछ छीन लेगा। बीस साल मैं उसकी बातों में जलता रहा। और जब मैंने भवानी को ज़हर दिया… उस रात वो मेरे साथ तहखाने में थी। वो खुद आई थी। मशाल लेकर।"
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरे पैर मुझे साथ नहीं दे रहे थे।
"तू झूठ बोल रहा है," मैंने फिर कहा। पर मेरी आवाज़ कमज़ोर थी। "गंगा देवी ने मेरी माँ को बचाया। उसने करण को बचाया। उसने—"
"उसने तुझे बचाया?" भैरव हँसा। वो हँसी शुष्क थी, जैसे सूखी लकड़ी चटके। "वीर, वो तेरी माँ को बचाने उस रात हवेली आई थी, या अपनी शीशी लेने?" वो रुका। "मैं तुझे एक बात बताता हूँ जो कोई नहीं जानता। भवानी की मौत वाली रात, तहखाने से निकलते वक़्त, गंगा देवी ने मेरे हाथ से वो पीली शीशी ली थी। और उसने कहा — 'ये मेरी है। भवानी ने इसे मेरे लिए बनाया था। उसने इसे किसी और के हाथ में देखा तो वो भी मर जाएगा।'"
मेरे कानों में सन्नाटा छा गया।
"अगर शीशी उसने तब ली," मैंने धीरे से कहा, "तो मेरे पास कैसे पहुँची?"
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। "यही तो सवाल है, वीर सिंह। यही सवाल।" वो दीवार से टिक गया। "मैं बता सकता हूँ कि उस रात क्या हुआ। पर मुझे लगता है — तू अब जानने के लिए तैयार है।"
सिपाही दरवाज़े पर आया। "सर, हुक्म से ज़्यादा वक़्त हो गया।"
मैंने उसकी तरफ़ हाथ उठाया। "एक मिनट।"
पर भैरव ने आँखें बंद कर लीं। "अब नहीं। मैं थक गया हूँ, वीर। बीस साल से कोई ऐसे नहीं बोला जैसे तू बोला। मैं अब सो जाऊँगा।" उसने आँखें खोलीं, और उनमें कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं देखा था। "अगर कल तक मैं ज़िंदा हूँ, तो तुझे वो रात दिखाऊँगा। जैसे मैंने देखी थी। हर बात। हर आवाज़। पर एक शर्त है।"
"क्या?"
"गंगा देवी को मेरे सामने लाना। मुझे उसकी आँखों में देखना है। उस आदमी की आँखों में, जिसने मुझे भवानी के ख़िलाफ़ भरा, और फिर मुझे अकेला छोड़ दिया।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। टूटा हुआ आदमी, जिसने सत्रह बच्चों के बाप छीने थे, और अब रो-रोकर यह चाह रहा था कि उसे एक औरत के सामने खड़ा किया जाए।
"मैं लाऊँगा," मैंने कहा। "पर एक बात, भैरव। अगर तू फिर झूठ बोला, अगर आज रात तूने कुछ छुपाया, तो मैं तुझे इस जेल से खींचकर पूरे गाँव के सामने ले जाऊँगा। और तब तेरी सज़ा अदालत नहीं, चबूतरा देगा।"
भैरव ने आँखें बंद कर लीं। "मेरी सज़ा तो बीस साल पहले शुरू हो गई थी, बेटा। मुझे बस अब उसका आख़िरी हिस्सा चुकाना है।"
मैं पलटा। मीरा बाहर इंतज़ार कर रही थी। उसने मेरा चेहरा देखा और कुछ नहीं पूछा। शायद मेरे चेहरे पर ही सब लिखा था।
"क्या हुआ?" उसने धीरे से पूछा।
"भैरव ने कहा," मैंने कहा, "कि सब कुछ गंगा देवी ने बोया।"
मीरा कुछ देर खड़ी रही। फिर बोली, "और तूने उस पर भरोसा किया?"
"नहीं।" मैंने अपना सिर हिलाया। "पर जब भैरव रो रहा था, तो उसकी आँखों में जो था, वो डर नहीं था। वो कुछ और था। किसी की याद।"
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