Spirit of a Fighter1266 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1266

7 min read November 5, 2026

"मुझे पता है।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ सूखी थीं, पर उनमें गरमी थी। "डरने वाली तो मैं हूँ, बेटा। तेरा बाप डरा हुआ नहीं मरा था — वो मरते वक़्त हँस रहा था, बिशन बताता है। पर मैं डरी हुई हूँ, जब से तू इस घर में आया है। जिस दिन तेरी धोती पर पहली बार मिट्टी लगी, उस दिन से मैं हर रात यही सोचती हूँ — कहीं ये घर मेरे हाथ से निकल न जाए।"

"माँ —"

"झूठ नहीं बोला मैंने, वीर।" उनकी आवाज़ काँपी, पर उन्होंने खुद को संभाल लिया। "मैंने बस तुझे बचाया। माँ पहले बचाती है, फिर सच बोलती है। ये मेरी गलती नहीं, ये मेरी आदत है।"

कमरे में सन्नाटा छा गया। गुड़िया ने नींद में कुछ बुदबुदाया और करवट बदली। बाहर कहीं कुत्ता भौंका, फिर चुप हो गया।

मैंने शीशी को अपनी हथेली में रखा और देर तक देखता रहा। काँच पर मेरी उँगलियों के निशान छप गए थे।

"जगदीश ने ये शीशी बदली थी," माँ ने कहा। "तेरा बाप बलवंत को इलाज देने जा रहा था। रास्ते में जगदीश ने उसकी मेज़ से असली शीशी उठा ली और उसकी जगह ज़हर वाली रख दी। तेरे बाप को पता ही नहीं चला। जब तक पता चलता, बलवंत पी चुका था। और तेरे बाप —" उनका गला रुका।

"मैंने वो शीशी तेरे बाप की लाश के पास से उठाई थी," उन्होंने कहा। "उनके हाथ में थी। मुट्ठी बंद थी, जैसे कोई चीज़ छुपा रहे हों। मैंने उँगलियाँ खोलीं तो ये पीली शीशी निकली। तेरे बाप ने आख़िरी साँस में भी इसे नहीं छोड़ा।"

मेरी आँखें जलने लगीं। मैंने शीशी को माथे से लगाया। काँच ठंडा था। पर उसके अंदर कुछ था जो बीस साल से गरम था।

दरवाज़े पर खड़ी मीरा ने कब की आकर सब सुना था, मुझे पता नहीं चला। उसकी आवाज़ आई — "वो सबूत है, वीर।"

मैंने पलटकर देखा। मीरा दरवाज़े के सहारे खड़ी थी, कंधे पर बैग, हाथ में छोटी लालटेन। उसके बाल बिखरे थे, चेहरे पर थकान थी, पर आँखें वो ही तेज़।

"अगर जगदीश ने शीशी बदली थी," वो अंदर आते हुए बोली, "तो इस शीशी पर उसकी उँगलियों के निशान हो सकते हैं। और इस शीशी के अंदर का नुस्खा अगर भवानी की लिखाई वाली किताब से मिलता है, तो ये साबित हो जाएगा कि भवानी ने कभी ज़हर नहीं दिया।"

माँ ने मीरा की तरफ़ देखा। देर तक देखा। मैंने सोचा कि वो कुछ कहेंगी — कोई ताना, कोई सवाल। पर उन्होंने बस सिर हिलाया।

"तू वही लड़की है," माँ ने कहा। "अखाड़े वाली।"

"जी," मीरा ने कहा। "मीरा।"

"जानती हूँ तेरा नाम।" माँ ने उसकी तरफ़ एक और नज़र डाली, फिर मेरी तरफ़। "अब तेरे पास शीशी है। सच है। तो अब क्या करेगा?"

मैंने शीशी को जेब में रखा। फिर मैं उठा और माँ के सामने खड़ा हो गया।

"अब मैं ये सच सबके सामने लाऊँगा," मैंने कहा। "पर पहले एक काम करना है।"

"क्या?"

"भैरव से मिलना है।"

माँ का हाथ ऊपर उठा, जैसे मुझे रोकना चाहती हों। फिर वो रुक गया, हवा में ही। उन्होंने हाथ नीचे किया।

"जा," उन्होंने कहा। "पर सुन —"

उन्होंने मेरे कान के पास मुँह लाया। उनकी साँस में तुलसी की गंध थी, वही जो बचपन में सुबह-सुबह मेरे सिर पर हाथ रखते वक़्त आती थी।

"भैरव से जो भी हो, उसे अपने बाप से बड़ा मत समझना। तेरा बाप आज भी उससे बड़ा है, क्योंकि तेरा बाप मरा सच के साथ, और भैरव ज़िंदा है झूठ के साथ।"

मैंने सिर हिलाया। मेरा गला भरा हुआ था, आवाज़ नहीं निकली।

मैं पलटा।

और तभी दरवाज़े पर गुड़िया आ गई — दौड़ती हुई, चप्पल पहनना भूलकर, पैरों में धूल, मुँह लाल। वो अभी-अभी जागी थी, बाल बिखरे, आँखें डबडबाई।

"भैया!" वो हाँफ रही थी। "भैया, ठाकुर के आदमी आए थे — पीछे के दरवाज़े से — माँ को कुछ कह गए —"

"क्या कहा?" मैंने उसके कंधे पकड़े।

"जेल से फ़ोन आया है। भैरव ने…" उसकी आवाज़ फँस गई। वो एक गहरी साँस लेकर बोली, और उसकी आवाज़ पूरे आँगन में गूँज गई। "भैरव ने जेल में अपनी कलाई काट ली है।"

कमरे में सन्नाटा उतर गया। माँ की उँगलियाँ साड़ी में जम गईं। मीरा ने लालटेन नीचे रख दी — उसका हाथ काँपा और लौ हिल गई।

"कलाई काट ली?" मैंने कहा। आवाज़ मेरी नहीं लग रही थी।

"इंस्पेक्टर शर्मा का फ़ोन था," गुड़िया ने कहा, हाँफते हुए। "वो बोले — भैरव होश में है, कुछ बोल रहा है। और वो… वो तुम्हें बुला रहा है। बोला, सिर्फ़ वीर सिंह से बात करेगा। वरना वो कुछ और कर लेगा।"

मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनका चेहरा सफ़ेद था। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मेरा हाथ पकड़ा और बहुत ज़ोर से दबाया।

"भैया," गुड़िया ने कहा, "मत जाओ।"

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।

"एक आदमी अगर मरने से पहले बात करना चाहता है," मैंने कहा, "तो उसकी बात सुननी पड़ती है। चाहे वो भैरव हो या कोई और।"

मीरा ने अपना बैग उठाया।

"मैं चलूँगी," उसने कहा।

"मीरा —"

"सबूत के बिना आरोप नहीं, और आरोप के बिना चुप्पी नहीं।" उसने बैग कंधे पर टिकाया। "मैं तुम्हारे साथ हूँ।"

माँ ने मेरा हाथ छोड़ा। फिर अलमारी से एक पुरानी चादर निकाली — वही जिस पर छोटे-छोटे फूल बने थे — और मेरे कंधों पर डाल दी।

"रात ठंडी है," उन्होंने कहा। "और मेरा बेटा जब भी किसी मुसीबत में गया है, वो खाली हाथ नहीं गया। ये चादर तेरे बाप की थी। इसे साथ रखना।"

मैंने चादर को कसकर लपेटा। उसमें कपूर और तुलसी की गंध थी — वही गंध जो अब मेरी जेब में रखी पीली शीशी से आ रही थी।

मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। फिर रुका।

"माँ," मैंने पलटकर कहा, "एक बात पूछनी है।"

"पूछ।"

"भैरव की चिट्ठी में लिखा था — तूने शीशी बेचने की बात कही थी, शहर भेजने के लिए। वो पैसा? वो कहाँ गया?"

माँ की आँखों में कुछ बदला। वो पहली बार मुस्कुराईं — बहुत हल्की, बहुत थकी हुई मुस्कान।

"वो पैसा मैंने तेरे बाप की कब्र पर खर्च किया," उन्होंने कहा। "पत्थर लगवाया — बीस साल पहले, जब गाँव वालों ने कहा था कि ज़हर देने वाले की कब्र पर पत्थर नहीं लगता। मैंने कहा — मेरे पति की कब्र पर पत्थर लगेगा, चाहे गाँव जले या बुझे।"

मेरी आँख से एक आँसू गिरा। मैंने उसे पोंछा नहीं।

"अब जा," माँ ने कहा। "और सुन — जेल में भैरव से जो भी कहे, तू उससे नरमी मत दिखाना। पर उसकी बात सुनना। क्योंकि जो आदमी मरने से पहले बोलता है, वो सच बोलता है — चाहे वो सच कितना भी कड़वा हो।"

मैं बाहर निकला। ठंडी हवा ने मेरा चेहरा थपथपाया। मीरा मेरे पीछे आई। हम दोनों गाँव की उस पगडंडी से चले जो थाने तक जाती थी, और पीछे माँ की आवाज़ आई — गुड़िया से कह रही थीं — "अब तू सो जा, बेटी। कल स्कूल जाना है।"

और गुड़िया की आवाज़ आई — "कल नहीं जाऊँगी। जब तक भैया नहीं आएंगे, मैं स्कूल नहीं जाऊँगी।"

पगडंडी पर मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।

"वीर," उसने कहा, "जेल में हमें शांत रहना होगा। भैरव तुम्हें तोड़ने की कोशिश करेगा। वो जानता है कि तुम अब उससे बड़े हो — यही उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा।"

"मुझे पता है।"

"और अगर उसने सच में आत्महत्या की कोशिश की है, तो इसका मतलब —"

"इसका मतलब वो हार गया है," मैंने कहा। "पर वो हारकर भी हार नहीं मानेगा। वो आख़िरी साँस तक खेल खेलेगा।"

थाने के बाहर इंस्पेक्टर शर्मा खड़े थे। उनके हाथ में एक कप चाय थी जो ठंडी हो चुकी थी। हमें देखकर उन्होंने चाय साइड में रख दी।

"वीर सिंह," उन्होंने कहा, "वो अंदर है। होश में है। दो बार डॉक्टर देख चुके हैं। पर वो किसी से बात नहीं कर रहा — सिर्फ़ तुम्हारा नाम ले रहा है।"

"क्या बोला उसने?"

"बोला — 'वीर सिंह को लाओ। वो आएगा। मैं जानता हूँ वो आएगा।'

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