Spirit of a Fighter – Chapter 1265
"बस दो पल," मैंने कहा। "मुझे अखाड़े में कुछ देखना है।"
गुड़िया ने मुझे घूरा। उसकी नज़र में वो सवाल था जो वो नहीं पूछ रही थी। पर वो चुप रही और माँ का हाथ पकड़कर चल पड़ी।
मैं अखाड़े के अंदर गया। अँधेरा फैल रहा था। दीवारों पर टिमटिमाती लालटेनें जल रही थीं, और मिट्टी पर लड्डू के टुकड़े बिखरे पड़े थे। मैं तहखाने की सीढ़ियों तक गया और कुएँ के पास बैठ गया।
मैंने जेब से वो चाँदी की अंगूठी निकाली। वो अंगूठी जो चबूतरे की पोटली में मिली थी। मैंने उसे सूँघा।
और मेरी नाक ने जो बताया, उससे मेरी साँस रुक गई।
वो गंध मैं जानता था। बादाम का तेल। इलायची। और… कपूर। वही गंध जो माँ के आँचल से आती थी, जो ज़हर के तोड़ में थी, जो काग़ज़ पर थी।
मैंने अंगूठी को अपनी हथेली पर रखा और देर तक उसे देखता रहा।
कहीं दूर से ढोल की आवाज़ आ रही थी। किसी की हँसी। टिंकू की आवाज़, जो अपनी माँ से कह रहा था — "माँ, कल से मैं अखाड़े में जाऊँगा, कसरत करने।"
"तू तो कल से ही जाने वाला था," उसकी माँ ने कहा।
"आज मैंने अपनी बात पक्की कर ली," टिंकू ने कहा।
मैं मुस्कुराया। फिर उठा और अपने तंबू की तरफ़ चला।
तंबू में मेरी चारपाई थी, एक टूटी मेज़, और माँ की पुरानी तस्वीर — जिसमें वो पंद्रह साल की थीं और उनकी गोद में एक बच्चा था। वो तस्वीर मैंने कभी किसी को नहीं दिखाई थी।
मैं अपनी चारपाई पर बैठा ही था कि मुझे कुछ सुनाई दिया। किसी के चलने की आवाज़ नहीं। किसी के हँसने की आवाज़ नहीं। सिर्फ़ काग़ज़ की सरसराहट।
मैंने पलटकर देखा। तंबू के दरवाज़े के नीचे से एक चिट्ठी फिसलकर अंदर आई। मैंने दौड़कर दरवाज़ा खोला, पर बाहर सिर्फ़ अँधेरा था।
मैंने चिट्ठी उठाई। काग़ज़ मोटा था, जैसे किसी पुरानी किताब से फाड़ा गया हो। मैंने उसे खोला।
लिखाई झुकी हुई थी, पर साफ़। भैरव की लिखाई। मैंने उसे जेल में देखा था, जब वो अपने काग़ज़ पर दस्तख़त कर रहा था।
"वीर सिंह,
कल तू जेल में मुझसे माफ़ी माँगने आएगा। मुझे पता है। तेरे बाप की तरह तू भी दिल का नरम है, और दिल का नरम आदमी हमेशा माफ़ी माँगने आता है।
पर मैं तुझे एक और सच बताऊँगा। तेरी माँ के पास वो पीली शीशी आज भी है — वही जो तेरे बाप ने बलवंत को दी थी। उसने तुझे बताया होगा कि वो शीशी खो गई थी, या बिशन को दे दी थी। झूठ।
वो शीशी अब भी तेरी माँ की अलमारी में है, उसी जगह जहाँ भवानी की चाँदी की अंगूठी मिली थी। पूछ उससे।
और एक बात और — तेरी माँ ने वो शीशी मुझे कभी नहीं दी। उसने मुझे कहा था कि वो उसे बेच देगी और उस पैसे से तुझे शहर भेज देगी। पूछ उससे, वो पैसा कहाँ गया।
मैं तुझसे माफ़ी नहीं माँगूँगा। मैं तुझे ये सच बताकर तेरे दिल को चीरूँगा। क्योंकि जिसने मेरा सब कुछ लिया, उसका भी कुछ तो लूँ।
भैरव सिंह"
मैंने चिट्ठी को दोनों हाथों से पकड़ा। मेरे हाथ काँप रहे थे।
और मेरी नाक में अब भी वो गंध थी — बादाम का तेल, इलायची, कपूर। वही गंध जो उस अंगूठी पर थी। वही गंध जो माँ के आँचल से आती थी।
मैंने चिट्ठी को मोड़ा और चारपाई के नीचे छिपा दिया। मैं खड़ा हुआ। मेरी टाँगें ठंडी थीं।
और मैंने तंबू का दरवाज़ा खोला।
बाहर हवा चल रही थी। अखाड़े की मिट्टी से उठती धूल हवा में तैर रही थी। और दूर, माँ के घर की खिड़की से एक पीली रोशनी आ रही थी।
मैंने एक कदम बढ़ाया।
फिर रुक गया।
चिट्ठी की आख़िरी लाइन मेरे दिमाग़ में गूँज रही थी — "पूछ उससे।"
मैंने अपनी मुट्ठी कसी और उस पीली रोशनी की तरफ़ चल पड़ा।
॥
पीली रोशनी माँ के घर की खिड़की से नहीं आ रही थी। वो रोशनी उस पुरानी अलमारी के पीछे से फूट रही थी, जिसे माँ ने बीस साल से कभी खुला नहीं छोड़ा था — अलमारी के पीछे एक तिरछी दरार थी, और उस दरार में कोई दीया जल रहा था।
मैं आँगन में रुका। मेरे पैरों तले मिट्टी ठंडी थी। सामने दरवाज़ा खुला था, और अंदर माँ चौकी पर बैठी थीं, हाथ जोड़े, आँखें बंद। उनके सामने चक्की पड़ी थी, पर आटा नहीं पिस रहा था। चक्की के पास ही गुड़िया सो रही थी, सिर माँ की गोद में, मुँह पर नींद की थकान।
मैंने चिट्ठी जेब से निकाली। काग़ज़ मेरी हथेली में पसीने से गीला हो चुका था।
"माँ।"
उन्होंने आँखें खोलीं। मुझे देखा। फिर मेरे हाथ में चिट्ठी देखी, और कुछ ऐसा हुआ जो मैंने कभी नहीं देखा था — उनका चेहरा पत्थर जैसा हो गया। ना डर, ना गुस्सा। बस एक ठंडी चुप्पी, जो किसी चीज़ का इंतज़ार कर रही थी।
"बैठ," उन्होंने कहा।
"माँ, ये चिट्ठी —"
"बैठ, वीर।" आवाज़ में वो ज़ोर था जो बचपन में सिर्फ़ तब आता था जब मैंने कुआँ देखकर झूठ बोला था। मैं बैठ गया। चौकी के दूसरे सिरे पर। गुड़िया करवट बदलकर सोती रही।
माँ ने उसका सिर धीरे से उठाकर तकिये पर रखा, चादर ओढ़ाई। फिर उठीं। उनकी कमर में वो पुराना दर्द था — उन्होंने हाथ पीछे लगाकर कमर सीधी की, और मुझे ऐसा लगा जैसे किसी पुरानी दीवार पर अचानक दरार दिख गई हो।
वो अलमारी के पास गईं। चाबी उनके ब्लाउज़ के अंदर, धागे में बँधी थी। उन्होंने चाबी निकाली, ताले में लगाई। ताला खुला — एक लंबी, चरमराती आवाज़ के साथ।
अलमारी के अंदर से कपूर की गंध निकली। इतनी तेज़ कि मेरी आँखें भर आईं।
माँ ने नीचे की तरफ़ झुककर हाथ डाला, और जब हाथ बाहर आया तो उसमें एक छोटी पीली शीशी थी। काँच की। ऊपर पीतल का ढक्कन। शीशी पर धूल की मोटी परत जमी थी, पर माँ ने उसे अपनी साड़ी के कोने से पोंछा, और फिर वो मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"ले," उन्होंने कहा। "सूँघ।"
मैंने शीशी ली। हाथ काँप रहे थे। मैंने ढक्कन खोला और शीशी को नाक के पास लाया।
और मेरी साँस रुक गई।
ज़हर नहीं था। ज़हर वाली कड़वी गंध नहीं। इसमें कपूर था — हल्का, साफ़। हल्दी थी। और कुछ ऐसा जो मैंने बचपन में माँ की उँगलियों से चाटा था — गिलोय का कड़वा रस, शहद में मिला हुआ।
ये इलाज की शीशी थी।
मैंने माँ की तरफ़ देखा।
वो चौकी के पास खड़ी थीं, हाथ साड़ी में छिपाए। उनकी आँखें मुझ पर थीं, पर जैसे किसी ऐसी चीज़ पर जो वो बहुत दूर से देख रही हों।
"तेरे बाप ने मरने से पहले ये शीशी मुझे दी थी," उन्होंने कहा, धीरे से, जैसे हर शब्द को उठाकर रख रही हों। "और कहा था — 'सरस्वती, इसे संभालकर रखना। ये साबित करेगी कि मैंने कभी किसी को ज़हर नहीं दिया।'"
मेरा गला सूख गया।
"तो फिर तूने मुझसे छुपाई क्यों?"
माँ ने जवाब नहीं दिया। वो चौकी पर बैठीं, गुड़िया के पास, और उसकी चोटी की लट सीधी की जो नींद में बिखर गई थी।
"माँ!"
"डर था," उन्होंने कहा। बस इतना। फिर चुप।
"डर किसका? मैं तेरा बेटा हूँ, माँ! बीस साल से मैं ये सोच रहा था कि —"
"कि तेरा बाप ज़हर देने वाला था?" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी नहीं था। उनमें कुछ और था — थकान। बीस साल की थकान, जो अब बोलने को बेचैन थी। "हाँ, वीर। मुझे पता था तू यही सोचता रहेगा। पर अगर मैं ये शीशी तेरे हाथ में दे देती, तो तू पंचायत के सामने, गाँव के सामने, बलवंत के सामने ये साबित करने जाता। और उस दिन जगदीश तुझे ज़िंदा नहीं छोड़ता।"
"मैं डरता नहीं, माँ।"
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