Spirit of a Fighter – Chapter 1263
"माफ़ कर दे," उसने कहा। उसकी आवाज़ फटी हुई थी, जैसे किसी ने उसका गला रेत दिया हो। "मैंने तेरे बाप को मारा। मैंने तेरी माँ को बीस साल रुलाया। मैंने उन पहलवानों को—"
"रुक," मैंने कहा।
वो रुका। वो उठा और मेरी तरफ़ देखने लगा।
"तू माफ़ी इसलिए माँग रहा है," मैंने कहा, "क्योंकि तेरी सज़ा तय हो चुकी है और तू सोचता है कि माफ़ी माँगकर हल्का हो जाऊँगा।"
उसका चेहरा बदला।
"नहीं," वो बोला। "मैं—"
"तूने बीस साल में एक बार भी नहीं सोचा कि जो तू कर रहा है वो ग़लत है। आज तू सोच रहा है क्योंकि तेरे हाथ बँधे हैं।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ टूटा। फिर वो वापस कुर्सी पर गिर गया।
"तो तू मुझे माफ़ नहीं करेगा," उसने कहा।
"माफ़ी मेरी जेब में नहीं है," मैंने कहा। "जिनकी जान गई, वो माँगेंगे। मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा — तूने जो किया, उसका हिसाब तुझे देना है। और अगर तू सच बोल रहा है, तो अदालत में सब बोल। हर नाम। हर शीशी। हर काग़ज़।"
वो मेरी तरफ़ देखता रहा।
"और एक बात," मैंने कहा। "बलवंत बाहर खड़ा है। वो तुझसे मिलना चाहता है।"
भैरव का चेहरा पहली बार बदला। असली में बदला।
"वो… वो आया?"
"हाँ।"
"मुझसे नफ़रत करता होगा।"
"पूछ उससे," मैंने कहा। और मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
दरवाज़े पर मैं रुका और पलटा।
"एक बात और," मैंने कहा। "तूने मेरे बाप को ज़हर दिया। तूने उसकी हड्डियाँ कुएँ में फेंकीं। तूने मेरी माँ को बीस साल अकेला छोड़ा। पर तू मुझे नहीं मार सका। क्यों?"
वो चुप रहा।
"क्योंकि मेरे पास वो था जो तेरे पास कभी नहीं था," मैंने कहा। "मिट्टी। और जो मिट्टी से जुड़ा है, उसे कोई ज़हर नहीं मार सकता।"
मैं बाहर आया। बलवंत दरवाज़े के पास खड़ा था, उसका चेहरा सफ़ेद।
"अंदर जा," मैंने कहा।
वो अंदर गया। दरवाज़ा बंद हुआ।
मैं बाहर आँगन में आया। माँ खड़ी थीं, उनकी आँखें लाल थीं, पर वो रो नहीं रही थीं। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
"क्या हुआ?" उसने पूछा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "जो होना था।"
थोड़ी देर बाद दरवाज़ा खुला। बलवंत बाहर आया। उसके होंठ हिल रहे थे, पर कुछ नहीं बोला।
"क्या कहा उसने?" मैंने पूछा।
"उसने कहा… उसने कहा कि वो मेरा बाप नहीं था," बलवंत ने धीरे से कहा। "वो सिर्फ़ मेरा इस्तेमाल कर रहा था। और उसने माफ़ी माँगी।"
"तूने क्या कहा?"
बलवंत ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था।
"मैंने कहा — मैं तुझे माफ़ नहीं करता। पर मैं तेरे जैसा नहीं बनूँगा।"
मैंने उसका कंधा थामा।
हम लौटने लगे। रास्ते में सूरज ऊपर आ रहा था और गाँव की छतों पर पीली रोशनी फैल रही थी। खेतों से गीली मिट्टी की गंध आ रही थी।
तभी टिंकू रुक गया। उसने अपनी जेब से वो पीली शीशी निकाली — वही जो माँ ने उसे दी थी।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"माँ ने दी थी," उसने कहा। "कहा था — जब सबसे बड़ा सच सामने आए, तब खोलना।"
उसने शीशी खोली। उसमें एक छोटा काग़ज़ था, मोड़ा हुआ।
मैंने खोला। माँ की लिखाई थी।
"वीर — तेरे बाप ने मरने से पहले मुझसे कहा था कि जो आदमी उसे मारेगा, वो उसका सबसे करीबी होगा। मैंने बीस साल सोचा कि वो भैरव है। पर आज पता चला कि वो जगदीश था। तेरे बाप ने एक बात और कही थी — जो उस दिन अखाड़े में मौजूद था, वो अब भी है। और उसे कभी नहीं पता चलेगा कि मैं जानती हूँ।"
मैंने काग़ज़ मोड़ा। मेरे हाथ ठंडे हो गए थे।
"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। पर मेरी आवाज़ मेरी नहीं लग रही थी।
हम गाँव पहुँचे। अखाड़े के बाहर पंचायत का चबूतरा खाली था। मैंने देखा — चबूतरे पर एक पोटली रखी थी। छोटी, ज़र्द कपड़े में बँधी।
मैंने खोली। उसमें एक चाँदी की अंगूठी थी — और एक काग़ज़। काग़ज़ पर सिर्फ़ एक लाइन थी, बिना नाम के।
"अब भी वक़्त है। पीछे मुड़ जा।"
मैंने अंगूठी उठाई और सूँघा। और मेरी नाक ने जो बताया, उससे मेरी साँस रुक गई।
वो गंध मैं जानता था। बहुत अच्छी तरह जानता था।
मैंने पलटकर अपने लोगों को देखा। माँ, मीरा, टिंकू, गुड़िया, कालू काका, बलवंत।
सब मेरी तरफ़ देख रहे थे।
और मैंने अपनी जेब में अंगूठी रख ली।
"कल से," मैंने धीरे से कहा, "हम नई कहानी लिखेंगे। पर आज के लिए… आज हमारे पास सच है।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा और कसकर दबाया।
हवा में तेल और लोहे की गंध थी। और मैं जानता था — ये गंध किसी अपने की थी।
॥
हवा में तेल और लोहे की गंध थी, और मैं जानता था — ये गंध किसी अपने की थी। पर जिस पल मैंने पलटकर देखा, चबूतरे पर कोई नहीं था। सिर्फ़ ज़र्द कपड़े की पोटली पड़ी थी, जो अब खाली हो चुकी थी।
मेरी छाती में एक ठंडी सुई चुभी।
"कौन था?" मीरा ने पूछा। उसने मेरी कलाई पकड़ ली थी, जैसे मुझे गिरने से रोक रही हो।
"पता नहीं," मैंने कहा। पर झूठ बोल रहा था। मैं जानता था। बस नाम लेना नहीं चाहता था।
तभी अखाड़े के फाटक से आवाज़ आई। टिंकू की आवाज़। वो अपनी टीन की डिब्बी उठाए खड़ा था, और उसके चेहरे पर वो हँसी थी जो मैंने बचपन से देखी थी — मुँह खुला, आँखें छोटी, गाल लाल।
"सब लोग! सब लोग सुनो!" वो चिल्लाया। "आज अखाड़े में कोई हारा नहीं है! आज मिठाई उसके मुँह में जाएगी जिसने बीस साल बाद मिट्टी को उसका हक़ लौटाया है!"
भीड़ हँस पड़ी। कोई बोला — "टिंकू, तेरी मिठाई में तो हमेशा नमक आ जाता है!"
"आज नमक कम है और शक्कर ज़्यादा," टिंकू ने डिब्बी खोलते हुए कहा। "आज दुकानदार भी जीत गया, भाई।"
वो मेरे पास आया। डिब्बी में लड्डू थे — बड़े, पीले, घी में चमकते। उसने एक लड्डू उठाया और सीधा मेरे मुँह के सामने किया।
"खा," वो बोला। "और जल्दी खा, क्योंकि कल से मैं कसरत शुरू करने वाला हूँ। आज आख़िरी दिन है जब मैं डिब्बी उठा सकता हूँ।"
मैं हँस पड़ा। पहली बार, कई दिनों में, सच में हँसा। मेरे होंठ फटे थे, हँसने में दर्द हुआ, पर मैंने लड्डू मुँह में रख लिया।
घी की गंध, गुड़ की मिठास, और उसमें इलायची का ज़रा-सा स्वाद। मेरी आँखें बंद हो गईं। ये वही स्वाद था जो टिंकू रोज़ सुबह चुपके से खीर में लाता था, और मुझे कहता था कि बाज़ार का बचा हुआ है।
"अरे!" टिंकू चिल्लाया। "ये लड्डू खराब हैं! इसमें इलायची ज़्यादा है!"
भीड़ फिर हँसी। मीरा भी हँसी। उसकी हँसी सुनकर मेरे अंदर कुछ पिघला।
और तभी, भीड़ के पीछे, मैंने एक औरत को देखा। साड़ी सस्ती, बाल गुँथे हुए, हाथ में एक छोटी-सी थैली। वो अपने होंठ दबाए खड़ी थी, और उसकी आँखों से पानी बह रहा था।
"टिंकू," मैंने धीरे से कहा। "वो देख।"
टिंकू ने पलटकर देखा। उसके हाथ से डिब्बी की ढक्कन गिर गई। धातु की खनक चारों ओर गूँजी।
वो भागा। भीड़ को चीरता हुआ, बीच में से, जैसे अखाड़े में कोई दाँव लगा रहा हो। और उस औरत के सामने पहुँचकर रुक गया। वो उसकी माँ थी।
"माँ," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ छोटी हो गई थी, जैसे वो फिर से दस साल का लड़का हो। "माँ, तू यहाँ?"
उसकी माँ ने उसका चेहरा दोनों हाथों से पकड़ा। उनके हाथ मेहनत से खुरदरे थे, छोटे-छोटे चावल के दानों की गंध उनसे आ रही थी। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस उसका मुँह चूमा, माथे पर हाथ रखा।
"मुझे पता था," वो बोलीं, आवाज़ टूटी हुई। "मुझे पता था तू सिर्फ़ मिठाई वाला नहीं है।"
"माँ, मैं तो रसोइया हूँ," टिंकू ने हँसकर कहा, पर उसकी आवाज़ में पानी था।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno