Spirit of a Fighter – Chapter 1262
रेफरी ने काग़ज़ खोला। उसकी आवाज़ काँपी, पर उसने पढ़ा।
"बलवंत ने मुकाबले से पहले पीली शीशी पी। ये मैंने खुद देखा। — भैरव सिंह।"
भीड़ में हलचल मची। एक आदमी ने मिट्टी में लात मारी। एक बूढ़ी औरत ने अपना सिर पीट लिया।
मैंने हाथ उठाया। धीरे-धीरे शोर कम हुआ।
"हाँ," मैंने कहा। "बलवंत ने शीशी पी थी। ये सच है।"
पूरा अखाड़ा सन्न रह गया। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, उसकी आँखों में डर था। माँ ने मुँह पर हाथ रख लिया।
"पर सुनो पहले," मैंने आवाज़ ऊपर की। "उसने वो शीशी जीतने के लिए नहीं पी थी। उसने मरने के लिए पी थी।"
मोहन हँसा। "कैसी बातें कर रहा है?"
"अपने गुरु से पूछ," मैंने कहा। "भैरव ने उसे बचपन से यही सिखाया था — कि ताकत ही सब कुछ है, और जो ताकत नहीं रखता वो मर जाए तो बेहतर। बलवंत ने बीस साल यही सुना। और जिस दिन उसे पता चला कि उसका पूरा जीवन एक झूठ पर खड़ा था, उसने वो शीशी पी ली। मरने के लिए।"
मैंने बलवंत की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
"आ जा," मैंने कहा। "खुद बोल।"
बलवंत हिला। एक कदम आगे बढ़ा, फिर रुक गया। उसका चेहरा कालिख से भरा था, आँखें लाल थीं। उसने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।
वो भीड़ के सामने आया। उसने अपना गला साफ़ किया।
"मैंने शीशी पी थी," उसने कहा। उसकी आवाज़ सूखी थी, पर साफ़। "मुकाबले से पहले। और वो शीशी मुझे भैरव ने नहीं दी थी।"
"तो किसने दी?" किसी ने पीछे से पूछा।
"भवानी सिंह ने," बलवंत ने कहा। "वो मेरे असली गुरु थे। उन्होंने वो शीशी इलाज के लिए छोड़ी थी — ज़हर से लड़ने के लिए। पर जगदीश सिंह ने उसे बदल दिया। मुझे बचपन से यही बताया गया कि भवानी ने मुझे मारने की कोशिश की थी।"
भीड़ में एक औरत रो पड़ी। मैंने देखा — गंगा देवी खड़ी थीं, काँप रही थीं, दोनों हाथ मुँह पर।
"आज सच्चाई गिरी है," बलवंत ने कहा, और उसकी आवाज़ भर आई। "मैंने वो शीशी पी थी जो मुझे मेरे असली गुरु ने दी थी, और मैं उसे ज़हर समझकर पी गया। और आज, इस अखाड़े में, वीर सिंह ने मुझे मारा नहीं। मुझे बचाया।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"अगर आपको फ़ैसला करना है, तो करो," उसने कहा। "पर सच यही है — ये जीत ईमानदारी की है।"
भीड़ में पहले एक आवाज़ आई। फिर दूसरी। फिर सब एक साथ गरज उठे।
"वीर सिंह! वीर सिंह!"
मैंने रेफरी की तरफ़ देखा। वो बूढ़ा आदमी अपनी आँखें साफ़ कर रहा था। उसने अपनी सीटी उठाई और ज़ोर से बजाई।
"सुनो सब!" उसने कहा। "काग़ज़ में लिखा है कि बलवंत ने शीशी पी थी। पर बलवंत ने खुद कबूल किया कि वो शीशी इलाज के लिए थी, और उसने मुकाबले में उसका कोई फ़ायदा नहीं उठाया। इसलिए — इस अखाड़े का फ़ैसला है — विजेता है… वीर सिंह!"
भीड़ फट पड़ी। टिंकू दौड़कर मेरे पास आया और मेरे गले में लिपट गया। मैंने देखा — उसकी टोपी गिर गई थी और उसके कान के पीछे की पेंसिल मिट्टी में पड़ी थी। गुड़िया उछल रही थी। माँ अपनी आँखें पोंछ रही थीं।
पर मैं वहीं खड़ा रहा।
क्योंकि मेरे सामने बलवंत खड़ा था, और उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी।
"क्या कहना है तुझे?" मैंने पूछा।
"मैं हार गया," वो बोला। "और पहली बार… पहली बार हारकर अच्छा लग रहा है।"
मैं हँसा। और फिर मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
तभी भीड़ को चीरता हुआ एक पुलिस वाला आया। उसकी वर्दी पर धूल थी, और वो तेज़ साँस ले रहा था।
"वीर सिंह?" उसने कहा।
"हाँ।"
उसने मेरे हाथ में एक लिफ़ाफ़ा रखा। मुहर लगी हुई, काग़ज़ पीला, कोने फटे हुए।
"भैरव सिंह ने जेल में अपना पूरा जुर्म कबूल कर लिया है," उसने कहा। "अपनी मर्ज़ी से। और उसने एक आख़िरी इच्छा लिखवाई है।"
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक काग़ज़ था, और उस पर उसकी लिखाई थी — मोटी, टेढ़ी, जैसे किसी ने गुस्से में लिखा हो।
"क्या लिखा है?" मीरा ने पूछा, मेरे कंधे के ऊपर से झाँकती हुई।
मैंने पढ़ा। मेरे हाथ रुक गए।
"वो तुमसे आमने-सामने माफ़ी माँगना चाहता है," पुलिस वाले ने कहा। "कल सुबह। और उसने कहा है कि अगर तुम न आए, तो वो कुछ नहीं बोलेगा। कोई गवाही नहीं।"
मैंने काग़ज़ को मोड़ा।
"कल सुबह," मैंने दोहराया।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसके हाथ ठंडे थे।
"वीर," उसने धीरे से कहा। "ये आदमी बीस साल तक सबको ज़हर पिलाता रहा। तू उसके पास अकेला क्यों जाएगा?"
"मैं अकेला नहीं जाऊँगा," मैंने कहा। और मैंने मुड़कर बलवंत की तरफ़ देखा।
बलवंत ने मेरी नज़र पकड़ी। उसने कुछ नहीं कहा, बस सिर हिलाया।
रात को हम सब अखाड़े के पास वाले कमरे में बैठे थे। बाहर हवा चल रही थी और खिड़की के काग़ज़ फड़फड़ा रहे थे। माँ ने मेरे लिए खीर भेजी थी — ठंडी हो चुकी थी, पर मैंने पूरी खा ली।
टिंकू ने अपनी मिठाई की डिब्बी खोली। उसमें चार लड्डू बचे थे।
"कल के लिए," उसने कहा। "जब तू लौटेगा।"
"अगर लौटा," मैंने कहा।
टिंकू ने मेरे सिर पर हल्का हाथ मारा। "ऐसा मत बोल। तेरे जैसे आदमी को भगवान भी नहीं छोड़ता।"
बलवंत खिड़की के पास बैठा था, अपने हाथों को देख रहा था। मैं उसके पास गया और बैठ गया।
"डर लग रहा है?" मैंने पूछा।
"नहीं," उसने कहा। "शर्म आ रही है।"
"क्यों?"
"क्योंकि जिस आदमी ने मुझे पाला, वो कल मुझसे माफ़ी माँगेगा। और मुझे नहीं पता कि मैं उसे माफ़ करूँ या नहीं।"
मैं कुछ देर चुप रहा। फिर मैंने कहा, "माफ़ी माँगने वाले का हक़ नहीं होता कि माफ़ी मिले। पर जो माफ़ करता है, उसका बोझ हल्का होता है। ये तेरा फ़ैसला है।"
बलवंत ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ बदला।
"तू अजीब आदमी है, वीर सिंह," उसने कहा। "मैंने तुझसे नफ़रत की, और तूने मुझे बचाया।"
"नफ़रत तेरी थी," मैंने कहा। "मेरी तरफ़ से कुछ नहीं था।"
सुबह जल्दी उठना था। मैं आँगन में आया और मिट्टी पर खड़ा हो गया। आसमान में तारे अभी बाकी थे। मैंने मुट्ठी में मिट्टी ली और उसे अपने माथे पर लगाया।
"आज सच का दिन है," मैंने धीरे से कहा।
माँ पीछे आईं। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"मैं साथ चलूँगी," उन्होंने कहा।
"माँ—"
"नहीं," उन्होंने कहा। "बीस साल मैंने इस आदमी को सहा है। आज मैं उसका चेहरा देखूँगी।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी नहीं था। सिर्फ़ वो चमक थी जो मैंने बचपन में देखी थी।
"ठीक है," मैंने कहा।
हम निकले — मैं, माँ, मीरा, टिंकू, बलवंत, और कालू काका। रास्ते में कालू काका ने कुछ नहीं कहा। वो बस चलते रहे, अपनी लाठी टेकते हुए। एक बार उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराए।
थाने के बाहर पुलिस वाला खड़ा था। उसने हमें अंदर ले जाने से पहले रोका।
"साहब ने कहा है," उसने कहा, "कि सिर्फ़ तुम अंदर जाओ। अकेले।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरा हाथ दबाया।
"ठीक है," मैंने कहा।
अंदर का कमरा छोटा था। एक मेज़, दो कुर्सियाँ, और सामने की दीवार पर एक छोटी खिड़की जिससे रोशनी आ रही थी। भैरव सिंह बैठा था — हाथ बँधे, बाल बिखरे, और चेहरा वो नहीं जो मैंने अखाड़े में देखा था। उसकी मूँछें अब भी बड़ी थीं, पर उनमें तेल नहीं था। सोने की चेन गायब थी।
वो उठा। उसकी आँखें मेरी आँखों से मिलीं।
और फिर वो अपनी कुर्सी से उठकर नीचे झुका — जितना हाथ बँधे होने में झुक सकता था।
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