Spirit of a Fighter – Chapter 1261
"मैं तुझे खोना नहीं चाहती थी," वो बोली। "मैंने तुझे अपना बेटा मान लिया। और मैंने सोचा कि अगर मैं तुझे सच बता दूँगी, तो तू मुझे छोड़ देगा।"
मोहन ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना हाथ उसके माथे से हटाया और वो उठ गया।
"मैं तेरा बेटा नहीं हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ शांत थी। "पर मैं तुझे छोड़ नहीं रहा। मैं तेरे गुनाहों का गवाह रहूँगा।"
फिर वो पलटा और वो मेरे पास आया।
"भाई," उसने कहा।
मैंने उसका हाथ पकड़ा।
"भाई," मैंने कहा।
और इंस्पेक्टर शर्मा ने राधा को उठाया और सिपाहियों के हवाले किया।
राधा जाते-जाते एक बार रुकी। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"तेरे बाप ने मुझे माफ़ कर दिया था," वो बोली। "उसने कहा था कि मैंने उसे ज़िंदा रखा। उसने कहा था कि मैं उसकी आख़िरी बहन हूँ।"
मेरा गला भर गया।
"मेरे बाप बहुत बड़े आदमी थे," मैंने कहा। "उन्होंने तुझे माफ़ कर दिया। पर मैं तुझे माफ़ नहीं करूँगा।"
वो मुस्कुराई। एक थकी हुई मुस्कान।
और फिर वो चली गई।
इंस्पेक्टर शर्मा ने मेरे पास आकर कहा, "वीर सिंह, अब तुम्हें अदालत चलना होगा। गवाही देनी होगी।"
"मैं आऊँगा," मैंने कहा।
और फिर मैं अखाड़े में खड़ा था, और मेरे चारों तरफ़ लोग थे, और मेरे पास शब्द नहीं थे।
पर माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे खींचकर अपने पास बिठाया।
"तू बैठ," उन्होंने कहा। "तू बहुत खड़ा रहा।"
और मैं उनके पास बैठ गया।
और तभी टिंकू आया। उसके हाथ में लड्डू की डिब्बी थी, और वो डिब्बी थोड़ी टेढ़ी हो गई थी क्योंकि वो भागते हुए आया था और उसने दो लड्डू गिरा दिए थे।
"भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ भारी थी, "मैंने सोचा तू मर गया। मैंने सोचा ये सब मेरी वजह से हुआ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू क्यों?" मैंने कहा।
"क्योंकि मैं चुप रहा," उसने कहा। "मुझे पता था कि भैरव तुझे नशीला पानी देने वाला है और मैंने कुछ नहीं किया। मैं डर गया था।"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"अब तू डरता नहीं," मैंने कहा। "तूने सुरंग में मेरा साथ दिया। तूने शेराज़ के सामने डंडा उठाया। तू मेरा भाई है।"
टिंकू रोया। वो मिट्टी में बैठ गया और अपनी टोपी उतार दी और उसने अपना चेहरा ढक लिया।
और फिर एक-एक करके सब आए।
कालू काका आए। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा और कहा, "मिट्टी ने अपना हिसाब रख लिया।"
रणवीर सिंह आए। वो अपनी व्हीलचेयर से खड़े हुए थे और उन्होंने मेरा कंधा थपथपाया।
"तूने वो किया जो मैं बीस साल नहीं कर पाया," उन्होंने कहा।
गुड़िया आई। उसने अपनी थैली मेरे हाथ में दी, जिसमें अखाड़े की मिट्टी थी।
"भैया," उसने कहा, "मैंने तुझे बताया था ना कि तू सबको पछाड़ देगा।"
और मीरा।
मीरा मेरे पास आई। उसने मेरे घाव पर पट्टी बाँधी — वो घाव जो मुझे बलवंत के साथ मुकाबले में लगा था। उसके हाथ काँप रहे थे।
"तू ठीक है?" उसने धीरे से पूछा।
"अब ठीक हूँ," मैंने कहा।
उसने मेरे हाथ पर हाथ रखा।
और मैंने उसकी उँगलियाँ जकड़ लीं।
तभी हवा में एक गंध आई।
तेज़। कड़वी। जली हुई लकड़ी की।
मैंने सिर उठाया।
अखाड़े के पिछले दरवाज़े पर धुआँ उठ रहा था। हल्का, धीमा, पर बढ़ता हुआ।
"आग," मैंने कहा, और मैं उठ खड़ा हुआ।
"कहाँ?" बलवंत ने कहा।
"पीछे," मैंने कहा। "तहखाने की तरफ़ से।"
और मैं दौड़ा।
मेरे पीछे बलवंत दौड़ा। और मोहन दौड़ा।
और जब हम पहुँचे, तो तहखाने का दरवाज़ा खुला था और उसके अंदर से धुआँ निकल रहा था और आग की लपटें दिख रही थीं।
"कौन?" बलवंत चीखा। "कौन करेगा ये?"
तभी अंधेरे में से एक आवाज़ आई।
"मैं।"
और धुएँ में से एक आदमी निकला।
उसके हाथ में मशाल थी और उसका चेहरा कालिख से भरा था।
वो आदमी मशाल नीचे करके हमारे सामने आया। उसकी उम्र पचास के आसपास थी, आँखों में वो भूख थी जो सिर्फ़ बदले की होती है।
"भैरव का चेला हूँ," उसने कहा। "साहब ने कहा था — अगर मैं हारूँ, तो ये अखाड़ा जल जाए। किसी की न हो।"
बलवंत आगे बढ़ा। उसका चेहरा ठंडा था, पर आँखों में कुछ टूट रहा था।
"मशाल दे," उसने कहा।
"क्यों दूँ?"
"क्योंकि मैं वो आदमी हूँ जिसने तेरे साहब के लिए बीस साल ज़हर ढोया।" बलवंत की आवाज़ धीमी थी। "और आज मैं थक गया हूँ।"
उस आदमी के हाथ ढीले पड़ गए। बलवंत ने मशाल छीनी और उसे मिट्टी में दबा दिया। मोहन और मैंने पानी की बाल्टियाँ उठाईं और आग पर फेंकी। धुआँ गाढ़ा था, आँखें जल रही थीं, पर आग बुझ गई।
बलवंत मिट्टी में बैठ गया। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे।
"मैंने सोचा था," वो बोला, आवाज़ टूटी हुई, "कि जब मैं बदला ले लूँगा, तो सुख मिलेगा। पर ये क्या है? मैं जिस आदमी से नफ़रत करता था, उसी का बेटा मेरी जान बचा रहा है। और मैं… मैं अब भी खाली हूँ।"
मैं उसके सामने बैठ गया।
"तेरी ज़िंदगी अब शुरू होती है," मैंने कहा। "आज से।"
"कैसे?"
"क्योंकि अब तुझे किसी से बदला नहीं लेना।"
वो मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने अपने हाथ सामने रखे और उन्हें देखा। कालिख, छाले, कंपकंपी।
तभी माँ दौड़ती हुई आईं। उन्होंने दोनों को एक साथ गले लगा लिया। मैं और बलवंत। पहली बार। माँ का आँचल मेरे चेहरे पर था और उसकी गर्मी में वो सब था जो बीस साल से रूठा हुआ था।
सरस्वती आईं। उन्होंने बलवंत के सिर पर हाथ रखा।
"तू भी मेरा बेटा है," उन्होंने कहा। "तेरी माँ सुहानी मेरी बहन थी। मैंने तुझे जन्म से जाना है। तूने मुझे पहचाना नहीं, ये और बात है।"
बलवंत उनके पैरों में गिर गया। उसके कंधे हिल रहे थे, और वो कुछ कह नहीं रहा था। सरस्वती ने उसे उठाया और अपने सीने से लगा लिया।
पूरा अखाड़ा खड़ा हो गया। किसी ने ताली बजाई, फिर सबने। आवाज़ अखाड़े की दीवारों से टकराकर लौटी।
तभी भीड़ में से एक आवाज़ चीखी।
"रुको!"
सब रुक गए। तालियाँ थम गईं।
"ये मुकाबला नकली है! बलवंत ने शीशी पी रखी है! ये जीत किसी और की है, इसकी नहीं!"
सबकी नज़रें उस आदमी पर गईं। वो हाथ में काग़ज़ लिए खड़ा था। उसका चेहरा टेढ़ा था।
हरनाम का बेटा।
॥
"झूठ!" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अखाड़े की दीवारों से टकराई।
हरनाम का बेटा — मोहन — मेरे सामने खड़ा था, हाथ में काग़ज़, आँखों में वो चमक जो झूठ बोलते वक़्त आ जाती है। भीड़ में सन्नाटा फैल गया। किसी ने कुछ नहीं कहा, बस सबकी गर्दनें उस काग़ज़ की तरफ़ मुड़ गईं।
"पढ़ो इसे!" मोहन चीखा। "भैरव साहब ने जेल से भेजा है! लिखा है — बलवंत ने मुकाबले से पहले पीली शीशी पी ली थी, ताकि जीत सके! ये जीत नकली है!"
मेरे पीछे बलवंत खड़ा था। मैंने उसकी साँस सुनी। तेज़। घबराई हुई। पर उसने कुछ नहीं कहा।
रेफरी — एक बूढ़ा आदमी, सफ़ेद कुर्ता, गले में सीटी — काग़ज़ लेकर इधर-उधर देखने लगा। उसके हाथ काँप रहे थे।
"ये… ये तो…" वो बोला, और फिर चुप हो गया।
चारों तरफ़ से आवाज़ें उठीं। कोई बोला "नकली मुकाबला", कोई बोला "शर्म करो"। एक औरत चीखी कि उसके पति ने पैसे लगाए थे। मीरा मेरे पास आई और उसने मेरी कलाई दबाई।
"वीर," उसने धीरे से कहा। "सोचकर बोल। यहाँ सब हैं।"
मैंने एक गहरी साँस ली। मिट्टी की गंध मेरी नाक में आई — अखाड़े की लाल मिट्टी, पसीना, और उसके ऊपर धुएँ की कड़वाहट। मैं आगे बढ़ा।
"काग़ज़ दो," मैंने कहा।
मोहन ने पकड़ लिया। "क्यों? ताकि फाड़ दो?"
"नहीं," मैंने कहा। "ताकि सब पढ़ सकें। रेफरी साहब, पढ़िए — और ज़ोर से।"
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