Spirit of a Fighter – Chapter 1259
"हाँ," उसने कहा। "मुझे बिशन काका ने सब बता दिया। तेरे बाप ने मुझे ज़हर दिया था। बीस साल पहले। जब मैं छोटा था। और मैंने वो पिया। और मैं ज़िंदा बच गया।"
मेरे पेट में ठंडक फैल गई।
"मेरे बाप ने तुझे इलाज की शीशी दी थी," मैंने कहा। "जगदीश ने उसे बदल दिया था। भवानी ने तुझे मारने की नीयत से नहीं दिया था। वो तुझे बचाने आया था।"
बलवंत हँसा।
पहले धीरे, फिर ज़ोर से। और फिर उसकी हँसी टूट गई और वो रोने लगा। वो रोया जैसे बच्चा रोता है — बिना शर्म, बिना रोक।
"तो मेरी पूरी ज़िंदगी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ फटी हुई थी, "एक बदले की आग पर बनी थी जो किसी और ने जलाई? मैंने बीस साल तेरे खिलाफ़ सीना तानकर रखा? मैंने बीस साल सोचा कि तेरा बाप मेरा दुश्मन है? और सच ये है कि मैं एक औरत की बातों में आ गया?"
वो अपने हाथों को देखने लगा। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"मेरे हाथ," उसने फुसफुसाया। "मैंने इन हाथों से क्या-क्या नहीं किया। इन हाथों से मैंने कितनों को गिराया। इन हाथों से मैंने तेरे अखाड़े की मिट्टी जलाई। और मुझे पता ही नहीं था कि मैं किसकी आग में जल रहा हूँ।"
मैं उसके पास गया। मैंने घुटने टेके और मिट्टी में बैठ गया, उसके सामने।
"बलवंत," मैंने कहा। "तेरी ज़िंदगी अभी खत्म नहीं हुई।"
"क्या?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कड़वाहट थी। "मैंने सब कुछ खो दिया।"
"नहीं," मैंने कहा। "तेरी ज़िंदगी अब शुरू होती है। आज से।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगा। उसकी आँखों में पानी था और मिट्टी थी और कुछ ऐसा था जो पहले कभी नहीं था। कुछ जो पूछ रहा था।
"क्यों?" उसने कहा। "मैंने तेरे साथ क्या किया, और तू मुझे क्या दे रहा है?"
"मैं तुझे वो दे रहा हूँ जो मुझे किसी ने नहीं दिया," मैंने कहा। "मौका।"
तभी गंगा देवी दौड़ीं। बूढ़ी औरत दौड़ी, जो शायद सालों से नहीं दौड़ी थी, और वो मिट्टी में फिसलीं और गिरते-गिरते बचीं और वो बलवंत के पास पहुँचीं और उसे अपनी बाहों में भर लिया।
"मेरा बच्चा," वो रोई। "मेरा बच्चा। मैंने तुझे जन्म दिया और मैं तुझे गोद में नहीं ले पाई। मैंने तेरे लिए कपड़े सिले और तुझे पहना नहीं पाई। मुझे बताया गया कि तू मर गया। मुझे बीस साल ये झूठ जीना पड़ा।"
बलवंत उनके गले लगकर रोया। मिट्टी में बैठे, दोनों।
और फिर माँ आईं।
वो धीरे चलीं। उनके कदम भारी थे और उनकी आँखें भरी हुई थीं और उन्होंने अपना लाल रुमाल अपनी कलाई पर लपेट लिया, जैसे वो कुछ रोक रही हों।
वो बलवंत के पास खड़ी हुईं और उन्होंने अपना हाथ उसके सिर पर रखा।
"तू भी मेरा बेटा है, बलवंत," उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ में वो नरमी थी जो उन्होंने मेरे लिए रखी थी। "तेरी माँ सुहानी मेरी बहन थी। मेरी सगी बहन। और जब तू इस दुनिया में आया, तो मैंने तुझे सबसे पहले गोद में लिया था। उस रात मैंने तेरे लिए एक झुन्ना बनाया था और उसे तेरी गोद में रख दिया था।"
बलवंत ने सिर उठाया।
"झुन्ना?" उसने कहा।
"हाँ," माँ ने कहा। "नीला। तेरी माँ ने उसे तेरे साथ रखा था। जब वो तुझे ले गए, तो झुन्ना भी चला गया।"
बलवंत की आँखें खुल गईं।
"मैंने वो झुन्ना अपनी जेब में रखा था," उसने फुसफुसाया। "बीस साल। जब भी मैं लड़ता था, मैं उसे अपनी कमर पर बाँध लेता था। मुझे पता नहीं था कि वो किसका है। मुझे लगा वो भैरव ने दिया था।"
माँ रोई। उन्होंने बलवंत का सिर अपनी छाती से लगा लिया और उसके बालों में उँगलियाँ फेरने लगीं।
और बलवंत उनके पैरों में गिर गया।
"माफ़ कर दो," वो रोया। "माफ़ कर दो माँ। मैंने तुम्हारे बेटे से कुश्ती लड़ी। मैंने तुम्हारे अखाड़े में आग लगाई। मैंने तुम्हारे सामने…"
"चुप हो जा," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ कड़क थी, पर उनके हाथ नरम थे। "चुप हो जा, बेटा। जब बच्चा गिरता है, तो माँ पहले उसे उठाती है, फिर पूछती है कि कैसे गिरा। तू गिरा। मैं तुझे उठा रही हूँ। बाद में पूछूँगी।"
अखाड़ा खड़ा हो गया।
मुझे नहीं पता कि किसने शुरू किया। शायद कालू काका ने। या शायद टिंकू ने। या शायद वो लड़का जो सबसे पीछे खड़ा था और जिसकी आँखें भरी हुई थीं। पर पूरा अखाड़ा खड़ा हो गया और तालियाँ बजने लगीं। पहले धीरे, फिर ज़ोर से, फिर इतनी ज़ोर से कि मिट्टी हिलने लगी।
मैं खड़ा था, और मेरे आँसू बह रहे थे, और मैं उन्हें पोंछ नहीं रहा था।
क्योंकि आज मेरे पास एक बाप नहीं था। आज मेरे पास एक भाई था। और एक माँ, जो सिर्फ़ मेरी नहीं थी, और फिर भी मेरी थी।
मीरा मेरे पास आई। उसने कुछ नहीं कहा। उसने बस मेरा हाथ पकड़ा और उसे ज़ोर से दबाया।
और मैंने उसकी ऊँगलियाँ जकड़ लीं।
तभी भीड़ में से एक आवाज़ आई।
"रुको!"
तालियाँ रुक गईं।
आवाज़ ऊँची थी और फटी हुई थी और उसमें वो चीज़ थी जो किसी के डर से आती है।
"ये मुकाबला नकली है!"
सबकी नज़रें घूमीं।
मैंने भीड़ में देखा और मैंने उसे पहचाना। वो कोई और नहीं था। वो हरनाम का बेटा था — पतला, चश्मे वाला लड़का, जो अक्सर अपने बाप की फ़ाइलें उठाया करता था। वो अपने हाथ में काग़ज़ पकड़े हुआ था और उसके हाथ काँप रहे थे और उसके माथे पर पसीना था।
वो आगे आया और मिट्टी में खड़ा हो गया।
"बलवंत ने शीशी पी रखी है!" वो चीखा। "ये मैंने खुद देखा है! मेरे बाप के काग़ज़ों में लिखा है! उसने सुबह शीशी पी थी और फिर अखाड़े में उतरा! ये जीत किसी और की है, वीर सिंह की नहीं!"
अखाड़े में सन्नाटा छा गया।
मैंने बलवंत की तरफ़ देखा।
वो अभी भी माँ के पैरों के पास बैठा था, और उसका चेहरा अब सफ़ेद नहीं था — वो लाल हो गया था, गुस्से से।
"हरनाम का बेटा," बलवंत ने धीरे से कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़हर था जो अब सिर्फ़ शब्दों में था। "तेरे बाप ने मुझे बेच दिया, और अब तू आया है उसका काम पूरा करने?"
"मैं सच बोल रहा हूँ!" लड़का चीखा। "मेरे पास काग़ज़ है!"
मैंने एक कदम आगे रखा।
"अपना काग़ज़ दिखा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ शांत थी। "और मैं तुझे बताता हूँ कि सच क्या है।"
लड़का रुका। उसने काग़ज़ अपनी छाती से लगाया हुआ था, और उसकी उँगलियाँ काग़ज़ को दबा रही थीं।
"मैं तुझे नहीं दूँगा," वो बोला। "तू सबको अपनी तरफ़ कर लेगा। तेरे पास मिट्टी है, लोग हैं, माँ है। मेरे पास सिर्फ़ ये काग़ज़ है।"
"तो इसे पढ़," मैंने कहा। "जोर से पढ़। सब सुनें।"
लड़के ने आँखें झपकीं। वो हिचका।
और उसी हिचकिचाहट में मैंने उसकी गंध पकड़ी।
काग़ज़ की गंध नहीं। उसके हाथों की गंध। कलई की गंध मेरी नाक में घुसी, तेज़, धातु जैसी। और उसके नीचे, बहुत नीचे, कुछ और था।
चूना।
वही चूना जो शहर के अखाड़े की मिट्टी में मिला था।
मेरे पेट में ठंडी लहर दौड़ी।
"वो काग़ज़ तेरे बाप ने लिखा है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ें अब तेज़ थी। "लेकिन वो सच नहीं है। तेरे बाप बीस साल से काग़ज़ों में झूठ लिखते आए हैं। तू जानता है ना? तूने खुद देखा है।"
लड़के का हाथ काँपा।
"मैं…" वो बोला, और उसकी आवाज़ टूट गई। "मैं सिर्फ़ अपने बाप को बचाना चाहता था। पुलिस उसे ले गई है। और मेरे पास कुछ नहीं बचा।"
उसकी आँखों से पानी आ गया। वो लड़का रो रहा था, और उसके हाथ में काग़ज़ था और वो काग़ज़ उसकी छाती से चिपका हुआ था, और वो अकेला खड़ा था — बीच मिट्टी में, हज़ार लोगों के सामने, अपने बाप के झूठ का आख़िरी टुकड़ा लेकर।
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