Spirit of a Fighter – Chapter 1258
"उसने दिया," वो बोलीं, और उनकी आवाज़ समतल थी। "मैं जानती हूँ। उसने दिया। पर उसने दिया इसलिए कि वो उस वक़्त टूटा हुआ था और मैं उसे बचा नहीं पाई।"
मैं जम गया।
"माँ—"
"मैं वहाँ थी," उन्होंने कहा। "उस रात। जब भैरव ने उससे कहा कि अगर तू नहीं करेगा तो तेरे दोनों बेटे मरेंगे। और उसने किया। बलवंत को पानी दिया। और फिर वो बीस साल अपने ही हाथों से डरे।" उन्होंने भवानी की तरफ़ देखा, और उनका होंठ काँपा। "अब तेरा बाप तुझे बताने आया है कि उसने क्यों किया। और मुझे तुझे बताना है कि मैंने क्यों चुप रहना चुना।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। मेरी छाती में कुछ फँस गया था।
"तू जानती थी?" मेरी आवाज़ फूट गई। "तू जानती थी कि बलवंत को ज़हर मिला और तूने मुझे नहीं बताया?"
"मैंने बताया था," उन्होंने कहा। "तुझे। जब तू नौ साल का था। और तूने मुझे नहीं सुना। क्योंकि उस रात तेरे बाप ने तेरे सिर पर हाथ रखा था और तू सो गया था। और मैंने सोचा — बेटा सो रहा है। बेटे को सच से क्या लेना।"
अखाड़े में कोई नहीं हिला।
और तभी वो बूढ़ा — भवानी — एक कदम आगे आया। उसने अपना हाथ अपनी छाती पर रखा, ठीक उस पीले निशान के ऊपर।
"वीर," उसने कहा। "मैं तेरे सामने खड़ा हूँ। मैंने तुझे बचपन में गोद में नहीं उठाया। मैंने तेरे जन्म के बाद अपना नाम बदल लिया और मैं उसी रास्ते पर चल पड़ा जिस पर भैरव चलता था। पर मैंने तुझे कभी नहीं भुलाया। और आज मैं यहाँ इसलिए आया हूँ कि मैं तेरे सामने सच बोलूँ, चाहे तू मुझे माफ़ करे या न करे।" उसने एक गहरी साँस ली और उसकी छाती का निशान फैल गया। "मैंने बलवंत को पीली शीशी दी। मैंने भैरव की शीशियाँ बनाईं। और मैंने तेरी माँ को बीस साल अकेले रहने दिया।"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
और मैंने वहाँ कुछ नहीं पाया। न कोई सफ़ाई, न कोई रोना, न कोई तमाशा। बस एक बूढ़ा आदमी, जिसकी दाढ़ी सफ़ेद थी और जिसके हाथ काँप रहे थे, और जो अपने बेटे के सामने खड़ा था और उसे अपनी पूरी ज़िंदगी का सच बोल रहा था।
मेरे पेट में कुछ घूमा। गुस्सा। वो गुस्सा जिसे मैं बीस साल से नाम नहीं दे पा रहा था, क्योंकि मुझे पता ही नहीं था कि किस पर देना है।
"तूने मेरे हाथ में खीर दी थी," मैंने कहा। ये पहली चीज़ थी जो मेरे मुँह से निकली और जो मैंने सोची नहीं थी। "जब मैं छोटा था। तूने मुझे खीर खिलाई थी। तहखाने में।"
उसका चेहरा बदला।
"तूने वो याद रखा?" वो फुसफुसाया।
"मैंने वो गंध याद रखी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँपने लगी। "मैंने तेरे हाथ की गंध याद रखी। और मुझे नहीं पता था कि वो किसकी है। और आज जब तू सीढ़ियों से उतरा, मैंने उसे फिर सूंघा।" मेरा गला भर गया। "तू मेरा बाप है न?"
उसने अपना सिर हिलाया। उसकी आँखों से पानी आ गया और उसने उसे पोंछा नहीं।
"हाँ," उसने कहा। "मैं तेरा बाप हूँ।"
मैं वहीं खड़ा रहा।
अखाड़े में हज़ारों लोग थे। मीरा थी, माँ थी, गुड़िया थी, टिंकू था, कालू काका थे, रणवीर सिंह थे, और वो औरत — मीरा की मौसी — और शीशी वाला आदमी, जिसका चेहरा अब पीला पड़ गया था।
और मेरे सामने मेरा बाप खड़ा था।
और मैं कुछ नहीं बोल पा रहा था।
क्योंकि मेरे पास बीस साल के सवाल थे और मेरे पास एक भी जवाब नहीं था।
तभी गुड़िया की आवाज़ आई। छोटी, तेज़, पूरे अखाड़े में गूँजती हुई।
"भैया! देखो!"
मैं पलटा।
गुड़िया मिट्टी में खड़ी थी और उसका हाथ ऊपर उठा हुआ था और वो सीढ़ियों की तरफ़ इशारा कर रही थी। पर वो सीढ़ियाँ खाली थीं।
फिर मैंने सुना।
ढोल। दूर से। बहुत दूर से। पर बज रहा था। और उसके साथ एक आवाज़ थी, बहुत धीमी, बहुत पुरानी, जैसे किसी कब्र के अंदर से कोई गा रहा हो।
और हवा में एक गंध आई। तेज़। बहुत तेज़।
जला हुआ काग़ज़।
मैंने भवानी की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"वो आ गया," उसने फुसफुसाया। "मैंने तुझे चेताया था, वीर। आज सच गिरेगा। पर वो सच मेरा नहीं है।"
"किसका है?" मैंने पूछा।
और तभी, अखाड़े के पिछले दरवाज़े से, जहाँ से सिर्फ़ मिट्टी और अँधेरा दिखता था, एक आवाज़ आई। मीठी। गुड़ जैसी मीठी। और उस आवाज़ में वो चीज़ थी जो मुझे रातों में जगाती थी।
"बेटा," वो बोली, "मैंने तुझे बहुत याद किया।"
मैं ठंडा हो गया।
क्योंकि वो आवाज़ मेरी माँ की थी। पर मेरी माँ मेरे पीछे खड़ी थी।
मैंने पलटकर देखा। सरस्वती वहीं थीं, मिट्टी में, अपने लाल रुमाल के साथ।
और फिर मैंने फिर से पीछे देखा, दरवाज़े की तरफ़।
अँधेरे में से एक परछाई निकली। लंबी। दुबली। सिर पर सफ़ेद चोटी और माथे पर हल्दी का टीका।
और उसके हाथ में वो पीली शीशी थी जो मैंने अपनी जेब में रखी थी।
मैंने अपनी जेब टटोली। खाली।
॥
मेरी जेब खाली थी, और मेरे सामने एक औरत खड़ी थी जिसके सिर पर सफ़ेद चोटी थी और माथे पर हल्दी का टीका था और हाथ में वो पीली शीशी थी जो अभी मेरी जेब में थी।
मेरा दिमाग़ काम नहीं कर रहा था। पैर जम गए थे। जैसे किसी ने मेरी रगों में सीसा डाल दिया हो।
मैंने पलटकर पीछे देखा। माँ वहीं खड़ी थीं। उनके हाथ में लाल रुमाल था और वो रुमाल उनकी उँगलियों में लिपटा हुआ था और उनकी आँखें सामने वाली औरत पर जमी थीं।
और मैंने देखा — माँ की आँखों में डर नहीं था। पहचान थी।
"तू," माँ ने धीरे से कहा, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो बीस साल की हो।
सामने वाली औरत मुस्कुराई। उसकी मुस्कान में दाँत साफ़ दिख रहे थे और उम्र के हिसाब से ज़्यादा सफ़ेद।
"हाँ," वो बोली। "मैं। तूने सोचा था मैं मर गई?"
मैंने गंगा देवी की तरफ़ देखा। वो अभी भी सीढ़ियों के पास खड़ी थीं और उनका चेहरा पत्थर जैसा हो गया था।
"मौसी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ कहीं दूर से आ रही थी, "ये कौन है?"
गंगा देवी ने आँखें बंद कर लीं।
"ये," उन्होंने कहा, "तेरी माँ की सौतेली बहन है। राधा।"
भीड़ में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि मुझे अपनी साँस की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
राधा ने शीशी को हवा में उठाया और उसे अपनी आँखों के सामने घुमाया। शीशी में पीला पानी था और वो पानी हल्का हिल रहा था।
"तू ये ढूँढ रहा था, बेटा?" वो बोली। "तेरे बाप की आख़िरी निशानी?"
"उसे रख नीचे," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ पहली बार अखाड़े में गूँजी। "वो तेरी नहीं है।"
"नहीं है?" उसने सिर टेढ़ा किया। "वीर, बेटा, तू अभी बहुत छोटा है ये समझने के लिए। शीशी जिसके हाथ में है, वो उसकी है। ये तेरे बाप ने खुद सिखाया था, है ना, भवानी?"
भवानी सिंह अभी भी मेरे बगल में खड़े थे। उनकी दाढ़ी सफ़ेद थी और उनके हाथ काँप रहे थे, पर जब उन्होंने मुँह खोला तो आवाज़ साफ़ थी।
"राधा," उन्होंने कहा। "तू यहाँ क्या कर रही है?"
"मैं?" वो हँसी। "मैं तो अपने बेटे का मुकाबला देखने आई थी। और मुझे क्या पता था कि मेरा बेटा हार जाएगा और मुझे वो करना पड़ेगा जो मैंने बीस साल से टाल रखा था।"
मेरा दिमाग़ अटक गया। मैंने बलवंत की तरफ़ देखा।
वो मिट्टी में घुटनों के बल था। उसकी लंगोट उतरी हुई थी और उसके हाथ मिट्टी में गड़े हुए थे और वो उठा नहीं था।
"बलवंत," मैंने कहा।
उसने सिर उठाया।
और उसकी आँखों में जो मैंने देखा, वो गुस्सा नहीं था। वो कुछ और था। कुछ टूटा हुआ।
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