Spirit of a Fighter1255 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1255

7 min read November 5, 2026

"फिर झुककर देख," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भारी थी, "कौन किसको झुकाता है।"

बलवंत का चेहरा बदला। वो फिर आया, इस बार गुस्से से, और उसका हाथ मेरी गर्दन की तरफ़ बढ़ा। मैंने अपना सिर हटाया, पर वो तेज़ था। उसकी उँगलियाँ मेरी गर्दन पर जम गईं और मुझे नीचे धकेलने लगीं।

मेरी आँखों के सामने धुंध छा गई। मुझे मिट्टी की गंध आई — उस मिट्टी की, जिसमें मैं गिर रहा था। और मुझे कुछ और भी सूंघा — पसीना, लोहा, और उसके हाथों की गरमी।

और फिर मैंने वो किया जो रणवीर सिंह ने सिखाया था।

मैंने अपनी साँस रोकी।

बलवंत की पकड़ ढीली पड़ी। एक पल के लिए — बस एक पल — वो मेरी साँस का इंतज़ार करने लगा, जैसे कुश्ती में हर पहलवान करता है। और उसी पल में मैंने अपना वज़न घुमाया, और मेरी कोहनी उसकी छाती में लगी।

वो पीछे हटा। एक कदम। दो कदम।

भीड़ चुप हो गई।

बलवंत ने अपनी छाती को हाथ लगाया, और उसकी आँखों में पहली बार कुछ और था — हैरानी।

"तू… तूने साँस कब रोकी?" उसने कहा।

"अभी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी।

बलवंत ने अपना सिर झटका, फिर दोबारा झपटा। इस बार वो पूरी ताकत से आया — वो मुझे उठाने के लिए झुका, अपनी बाँहें मेरी कमर के चारों तरफ़ डालीं, और मुझे हवा में घुमाने लगा।

मैं हवा में था। मेरे पैर ज़मीन से दूर थे। मेरी आँखों के सामने भीड़ घूम रही थी, बैनर घूम रहे थे, आसमान घूम रहा था।

और तभी, हवा में घूमते हुए, मैंने एक आवाज़ सुनी। दूर से, पर साफ़। जैसे कोई मेरे कान के पास बोल रहा हो।

"बेटा, अब आँखें बंद कर और उसकी साँस गिन।"

रणवीर सिंह की आवाज़।

मैंने आँखें बंद कर लीं।

और मैंने सुना।

बलवंत की साँस — तेज़, भारी, हर घुमाव पर एक-एक करके। एक… दो… तीन… वो तेज़ थी, जैसे कोई दौड़ रहा हो। पर फिर वो धीमी होने लगी। चार… पाँच… और फिर, छठे घुमाव पर, उसकी साँस रुकी — बस एक पल के लिए, जब उसने मुझे पटकने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी।

वो पल।

मैंने अपना शरीर हवा में मोड़ा। मेरी कोहनी उसकी बाँह के नीचे से निकली, और मैंने अपना पूरा वज़न उसकी तरफ़ झोंक दिया।

हम दोनों गिरे — पर उल्टे। मैं ऊपर, वो नीचे। मिट्टी में धमाका हुआ, और मेरे घुटने उसकी छाती पर जम गए।

भीड़ फट पड़ी।

पर मैं कुछ नहीं सुन रहा था। मैं बस उसके ऊपर झुका हुआ था, और उसकी आँखों में देख रहा था। उसकी आँखों में हैरानी थी, और उस हैरानी के नीचे कुछ और — एक पल के लिए, बस एक पल के लिए, वहाँ डर था।

रेफरी ने सीटी बजाई।

"विजेता — वीर सिंह!"

और फिर मैंने वो किया जो मैंने कभी सोचा भी नहीं था। मैंने अपना हाथ बढ़ाया, और बलवंत को उठाया।

वो मेरे हाथ से उठा, और खड़ा होकर उसने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।

"तेरी माँ को ये देखना था," मैंने धीरे से कहा। "वो आज यहाँ नहीं है। पर मेरी माँ है। और मेरी माँ को ये देखना था कि उसका बेटा किसी को मिट्टी में नहीं मिलाता।"

बलवंत की आँखें भर आईं। उसने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा, और हम दोनों मिट्टी में खड़े रहे, और भीड़ चीखती रही।

पर तभी मेरी नाक में वो गंध फिर आई — वही मीठी, हल्की, जानी-पहचानी। और इस बार मैंने सिर उठाया।

ऊपर की गैलरी में, दर्शकों की भीड़ के बीच, एक आदमी खड़ा था। उसका चेहरा छिपा था, पर उसके हाथ — वो हाथ जिनसे वो रेलिंग पकड़े हुए था — मुझे पहचाने लगे। वही हाथ जो कभी मेरे बाप की हड्डियों को छू चुके थे। वही हाथ जो कभी चाँदी की चेन पहनते थे।

और उसके पीछे, आधी छिपी, एक औरत खड़ी थी। सफ़ेद साड़ी, सिर पर आँचल — और वो मुझे घूर रही थी।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो भी ऊपर देख रही थी, और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।

मैंने धीरे से कहा, "वो औरत… वो कौन है?"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में थी।

"वो… वो मेरी माँ की बहन है," उसने कहा। "मेरी मौसी। जिसे मैंने दस साल से मरा हुआ समझा था।"

और तभी, गैलरी में, वो आदमी रेलिंग से हटा, और उसके हाथ में कुछ चमका — पीली शीशी। उसने उसे ऊपर उठाया, और भीड़ की तरफ़ देखकर हँसा।

हँसी ऐसी, जो अखाड़े के ढोल से भी ऊँची थी।

वो हँसी अखाड़े में फैल गई, और मेरे रोंगटे खड़े हो गए। भीड़ भी हँसी में शामिल होने लगी — जैसे किसी ने मज़ाक किया हो। पर मेरे पेट में कुछ ऐसा मुड़ा कि मैं वहीं बैठ जाता।

वो आदमी रेलिंग पर झुका, और उसने पीली शीशी को अपनी ऊँगली और अँगूठे के बीच घुमाया। शीशी में पानी था — वही सुनहरा, वही चमकीला। और उसने उसे ऐसे दिखाया जैसे कोई ईनाम दिखा रहा हो।

"वीर सिंह!" उसने ऊपर से चिल्लाया। उसकी आवाज़ अखाड़े के हर कोने तक पहुँची। "बधाई हो, बेटा। तूने आज मेरा सबसे अच्छा पहलवान गिरा दिया।"

भीड़ में फुसफुसाहट उठी। मेरे पास खड़ा बलवंत सख़्त हो गया। उसने ऊपर नहीं देखा। उसने अपनी नज़रें ज़मीन पर गड़ा दीं, और उसके जबड़े की माँसपेशियाँ उभर आईं — ऐसे कोई अपनी माँ के सामने पकड़ा गया हो।

"तो ये सारा खेल तेरा था?" मैंने बलवंत से पूछा।

वो चुप रहा।

"तेरी ताकत… वो पानी से थी?"

अब उसने आँखें उठाईं। उसकी आँखों में वो डर अभी भी था, पर उसके ऊपर एक और चीज़ चढ़ आई थी — शर्म। "मेरे पास कोई रास्ता नहीं था," उसने धीरे से कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ। "मेरी बहन का इलाज चल रहा है। उस आदमी ने कहा — लड़ेगा तो पैसा, नहीं तो दवा बंद।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा, और मेरे अंदर का गुस्सा कहीं पीछे चला गया।

ऊपर वो आदमी फिर बोला। "सुनो सब लोग! ये जो नया भारत केसरी है — इसके बाप को मैं जानता था। बड़ा पहलवान था। और उसका बाप…" उसने शीशी हिलाई, "…वो मेरी शीशी का पहला आदमी था।"

मेरा खून ठंडा हो गया।

"क्या कहा तूने?" मेरी आवाज़ फट गई।

"तेरे बाप ने मेरी शीशी पी, बेटा। और फिर…" उसने हाथ से हवा में उड़ने जैसा इशारा किया। "…उड़ गया। मरा तो नहीं, पर जो ज़िंदा बचा, वो तेरा बाप नहीं था। वो एक टूटा आदमी था — जो खाट पर पड़ा हर दिन मेरा नाम भूलता गया।"

अखाड़े में सन्नाटा। मैंने सरस्वती की तरफ़ देखा। वो मिट्टी में खड़ी थी, उसके हाथ अब भी उसके मुँह पर थे, और उसकी आँखों से पानी बह रहा था। गुड़िया ने उसका कंधा पकड़ लिया।

"तो तू ही था," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीरे से निकली, पर अब वो काँप नहीं रही थी। "तूने मेरे बाप को ज़हर दिया। तूने मेरे बाप का नाम मिटाया। और आज… तूने बलवंत को भी खरीदा।"

"खरीदा नहीं," उसने मुस्कुराकर कहा। "बस एक छोटा-सा सौदा किया। तू जानता है, हर आदमी की एक कीमत होती है। तेरे बाप की थी — नाम। तेरी माँ की थी — तेरा बचपन। बलवंत की थी — उसकी बहन। अब बता, तेरी क्या है?"

मेरी मुट्ठी भिंच गई। मैंने एक कदम आगे बढ़ाया, फिर रुक गया। क्योंकि तभी मेरी नज़र उस औरत पर पड़ी — सफ़ेद साड़ी वाली, आँचल वाली। वो आदमी के पीछे खड़ी थी, और उसकी आँखें मीरा पर टिकी थीं।

और मीरा — मीरा अब रेलिंग के पास पहुँच चुकी थी। मैंने देखा कि उसने अपना हाथ उस औरत की तरफ़ बढ़ाया, और उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।

"मौसी?" मीरा की आवाज़ बच्चों जैसी हो गई। "मौसी, तुम ज़िंदा हो? माँ ने कहा था… माँ ने कहा था तुम…"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho