Spirit of a Fighter1253 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1253

7 min read November 5, 2026

गंगा देवी आगे आईं। उन्होंने बलवंत के सिर पर हाथ रखा।

"मेरा बच्चा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो दर्द था जो सिर्फ़ माँ जानती है। "मैं तुझे छोड़कर गई थी। मैं तुझे बचाने के लिए गई थी, पर तू यहाँ अकेला जलता रहा।"

बलवंत ने अपनी आँखें खोलीं और उन्होंने गंगा देवी को देखा।

"माँ," उसने कहा। और फिर उसकी आवाज़ भर आई। "तुम मुझे छोड़कर क्यों गई थीं?"

"क्योंकि मैं तेरे बाप को बचाने गई थी," उन्होंने कहा। "और मैं उसे नहीं बचा पाई। और फिर मैं तुझे ढूँढने आई, पर जगदीश ने तुझे छुपा दिया। मैं बीस साल तुझे ढूँढती रही।"

बलवंत ने अपना सिर उनकी गोद में रख दिया। और गंगा देवी ने उन्हें अपनी बाहों में भर लिया।

मैं उठकर खड़ा हो गया। मेरे घुटने अभी भी काँप रहे थे।

मीरा मेरे पास आई।

"तू ठीक है?" उसने पूछा।

"नहीं," मैंने कहा। "पर अब ठीक होऊँगा।"

उसने मेरा हाथ पकड़ा।

"वीर, तेरी माँ ने तुझे जो शीशी दी थी — वो कहाँ है?"

मेरे पेट में एक ठंडी सी लहर दौड़ी।

"माँ ने दी थी," मैंने कहा। "कहा था कि भवानी ने उन्हें दी थी। कि इससे बलवंत का इलाज होगा।"

"तो फिर बलवंत ने जो शीशी पी," मीरा ने कहा, "वो कहाँ से आई?"

हम दोनों ने बिशन चाचा की तरफ़ देखा।

बिशन चाचा ने अपना सिर उठाया। उनके चेहरे पर वो सन्नाटा था जो सच जानने से पहले आता है।

"मैंने वो शीशी किसी को नहीं दी," उन्होंने धीरे से कहा। "वो मेरी जेब में थी। और मैं बीस साल से भट्ठे पर था।"

"तो फिर बलवंत के हाथ में कैसे आई?" मैंने कहा।

"क्योंकि किसी ने मेरी जेब से निकाली," बिशन चाचा ने कहा, और उनकी आँखें सिकुड़ गईं। "और वो कोई ऐसा था जो जानता था कि ये शीशी क्या है।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

और दोनों के मुँह से एक ही नाम निकला।

"नंदकिशोर।"

पर नंदकिशोर तो हवेली में बंद था। या शायद नहीं था।

मैंने अपनी नाक से हवा खींची। अखाड़े की मिट्टी, पसीना, लड्डू की चाशनी, गंगा देवी के हाथों की हल्दी — और कहीं दूर से एक गंध आई। वो गंध जो सिर्फ़ हवेली के पीछे वाले कमरे में थी।

नंदकिशोर की गंध।

"टिंकू," मैंने कहा। "तू यहीं रुक। बलवंत के पास।"

"कहाँ जा रहा है भाई?"

"हवेली," मैंने कहा। "कुछ गड़बड़ है।"

मीरा ने मेरा हाथ कसकर पकड़ा।

"मैं साथ चलती हूँ।"

"मीरा—"

"मैं साथ चलती हूँ, वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो बहस नहीं करती। "तुम अकेले नहीं जाओगे।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके माथे पर पसीना था, और उसके हाथ में अभी भी बलवंत की नाड़ी की गरमी थी।

"ठीक है," मैंने कहा।

हम अखाड़े के दरवाज़े से बाहर निकले। बाहर धूप तेज़ थी, और गली में बच्चे खेल रहे थे। किसी को कुछ पता नहीं था। किसी को नहीं पता था कि अभी-अभी इस दीवार के अंदर एक बेटा अपने बाप को माफ़ कर रहा था, और एक बाप की शीशी किसी ने चुरा ली थी।

हम हवेली की तरफ़ बढ़े।

पर रास्ते में, नीम के पेड़ के नीचे, एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। सफ़ेद साड़ी, हाथ में लाठी, और आँखों में वो चमक जो सिर्फ़ उन लोगों में होती है जिन्होंने सब कुछ देखा है और अब कुछ नहीं डरता।

सुक्खी बुआ।

"रुक जा, वीर," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो गंभीरता थी जो उनमें कभी नहीं थी।

"बुआ, मुझे जाना है," मैंने कहा। "बलवंत—"

"बलवंत ठीक है," सुक्खी बुआ ने कहा। "उसकी नाड़ी में ज़हर नहीं, थकान है। पर तेरे पास जो है, वो बलवंत के पास मत ले जा।"

मेरे पैर रुक गए।

"क्या मतलब?"

"तेरे बाप की बात सुनकर तू हिल गया, है ना?" उन्होंने लाठी की नोक मेरी छाती पर रखी। "सच बोल। तेरे अंदर क्या चल रहा है?"

मेरा गला सूख गया। मीरा ने मेरा हाथ छोड़ा, पर दूर नहीं गई।

"मेरे बाप ने जो शीशी दी," मैंने कहा, "वो इलाज की थी। पर उन्हीं के हाथ से वो बलवंत तक पहुँची। मेरे बाप की वजह से—"

"तेरे बाप की वजह से कुछ नहीं हुआ।" सुक्खी बुआ की आवाज़ सख़्त हो गई। "भवानी ने वो शीशी बलवंत को दी थी, पर उसका नीयत साफ़ था। जगदीश ने हाथ बदला। तेरे बाप ने बीस साल उस गलती का बोझ उठाया, और जब सच बोलने की कोशिश की, तो मार दिए गए। तू उन पर इल्ज़ाम मत डाल। वो पहले से ही अपना दंड भुगत चुके हैं।"

मेरी आँखें जलने लगीं। मैंने पलकें दबाकर बंद कर लीं।

"मुझे नहीं पता था," मैंने कहा। "मैंने हमेशा सोचा था कि मेरे बाप साफ़ थे। कि उन्होंने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया। और आज पता चला कि—"

"कि तेरे बाप भी इंसान थे," बुआ ने कहा, और उनकी आवाज़ नरम पड़ गई। "कभी ग़लत फ़ैसला लिया, कभी फँसे, कभी डरे। पर उन्होंने सच कहा। और सच कहने वाले आदमी को बुरा मत कहना, वीर।"

मैंने आँखें खोलीं। बुआ मेरे बालों में उँगलियाँ फेर रही थीं, जैसे माँ करती थी।

"तुझे बलवंत से ये बात कहनी होगी," उन्होंने कहा। "जो तेरे बाप ने कहा था। शब्द-दर-शब्द।"

"पर वो भड़क जाएगा," टिंकू ने पीछे से कहा। वो भी आ गया था, और उसका चेहरा छोटा बच्चा जैसा डरा हुआ था। "अभी-अभी तो वो शांत हुआ है।"

"सच भड़काएगा तो भड़के," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ ख़ुद मेरे कानों में अलग लगी। "झूठ से तो हम भी भैरव जैसे होंगे। और मैं अपने बाप के बेटे के नाम पर झूठ नहीं बोलूँगा।"

सुक्खी बुआ ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था। मानो वो कोई पुराना हिसाब मिला रही हों।

"जा," उन्होंने कहा। "पर एक बात याद रख। बलवंत को शीशी देने वाला कोई और था, और वो कोई आज भी हवेली में बैठा है। तेरी गंध तेरे साथ मत ले जाना। अंदर जाने से पहले अपनी नाक साफ़ कर लेना।"

वो मुड़कर चल दीं, और उनकी लाठी की ठक-ठक गली में गूँजती रही।

हम अखाड़े के दरवाज़े पर लौटे। मैं अंदर गया।

बलवंत अभी भी मिट्टी में बैठा था, गंगा देवी के पास। उसका रंग लौट आया था, पर उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो एक बार जल जाए तो बुझती नहीं।

मैं उसके सामने बैठ गया।

"बलवंत," मैंने कहा। "मुझे एक बात कहनी है। और तू मुझसे घृणा करे, तो कर। पर मैं झूठ नहीं बोलूँगा।"

उसने मेरी तरफ़ देखा।

"मेरे बाप ने तुझे इलाज की शीशी दी थी," मैंने कहा। "वो चाहते थे कि तू ठीक हो जाए। पर जगदीश ने हाथ बदल दिया, और तेरे हाथ में ज़हर पहुँच गया। मेरे बाप ने सच बोलने की कोशिश की, और इसीलिए उन्हें मार दिया गया।"

मेरी आवाज़ रुक गई। मैंने उसकी आँखों में देखा।

"मेरे बाप की नीयत साफ़ थी," मैंने कहा, "पर उनके हाथों से वो शीशी निकली थी। और मुझे ये कहने में शर्म आ रही है।"

बलवंत कुछ देर चुप रहा। उसकी नाड़ी उसकी गर्दन पर धड़क रही थी।

"तेरे बाप ने मुझे बचाया था," उसने धीरे से कहा। "और मैंने उन्हें गाली दी।"

"तू नहीं जानता था।"

"अब जानता हूँ।" उसने अपनी मुट्ठी मिट्टी में गाड़ दी। "और मैं जगदीश को नहीं छोड़ूँगा। पर आज मैं तेरे बाप के नाम पर—"

तभी अखाड़े के बाहर से ढोल की आवाज़ आई। गहरी, भारी, जैसे किसी ने ज़मीन को पीट दिया हो।

और भीतर से बलवंत की गरज फूटी, जो उसी के मुँह से नहीं, किसी और की छाती से आ रही थी—

"वीर सिंह! देर हो रही है! मैं तेरे बाप का नाम भी आज मिट्टी में मिला दूँगा!"

॥

ढोल की आवाज़ अभी भी मेरी छाती में गूँज रही थी जब मैंने मिट्टी में गड़ी अपनी मुट्ठी खोली। बलवंत मेरे सामने खड़ा था, उसके होंठ काँप रहे थे, और उसकी आँखों में वो आग अब लपटों में बदल रही थी।

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