Spirit of a Fighter – Chapter 1252
"क्यों रुकूँ?" उसने कहा। "तू मुझे बार-बार कहता है रुकने को। पर मेरे पास रुकने की जगह नहीं है, वीर सिंह। तूने मुझे माँ दी, और माँ ने मुझे सच दिया। और आज सुबह जब मैंने अपना सच जाना, तब मैंने ये शीशी फेंक दी थी।"
"तो फिर ये गंध—"
"गंध?" उसने कहा, और वो हँसा। एक सूखी हँसी। "तू अपनी नाक की बात कर रहा है? तू जो सबको सूंघ लेता है? तो सूंघ — मैंने आज शीशी नहीं पी। मैंने आज इस अखाड़े की मिट्टी पी है। जिस मिट्टी में तूने मुझे हराया था। सूंघ, अगर तेरी नाक में दम है।"
मैंने सूंघा। और सच में — उसके पसीने में पीली शीशी की वो कड़वाहट नहीं थी जो सुबह थी। कुछ और था। कुछ तीखा, कुछ जला हुआ।
"तूने क्या पीया?" मैंने कहा। "बलवंत, तूने क्या पीया?"
"वो जो तेरे बाप ने मेरे लिए छोड़ा था," उसने कहा। और उसकी आँखों में पानी आ गया। "माँ ने बताया। बताया कि भवानी सिंह मेरे लिए मरा। और मैंने सोचा — अगर वो मेरे लिए मरा, तो मैं कम से कम उसकी आख़िरी चीज़ तो पी लूँ।"
मैं सन्न रह गया।
"कौन सी चीज़?" मैंने कहा। "कौन सी चीज़ छोड़ी थी मेरे बाप ने?"
बलवंत ने अपनी मुट्ठी खोली। उसमें एक टूटी हुई शीशी के टुकड़े थे — नीले रंग के, और उनमें से एक लाल रंग की बूँद टपक रही थी।
मेरी नाक में गंध आई। और मैं एक कदम पीछे हट गया।
वो शीशी मेरे बाप की थी। मैं उसे पहचानता था। वही शीशी जो माँ ने मुझे दी थी — जिसमें माँ ने कहा था कि भवानी ने उन्हें दी थी, कि इससे बलवंत के ज़हर का इलाज होगा।
"तूने ये पी लिया?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ चीख में बदल गई। "तू पागल है? ये इलाज की शीशी थी, बेवकूफ़! इसे गले पर लगाना था, पीना नहीं!"
बलवंत मुस्कुराया। और उसकी मुस्कान में वो बच्चा था जो चार साल का था और जिसे किसी ने कभी नहीं बताया कि माँ क्या होती है।
"अब क्या फ़र्क़ पड़ता है, वीर भाई?" उसने कहा। "मैं बीस साल से ज़हर पी रहा हूँ। एक और शीशी क्या बदलेगी?"
"मीरा!" मैंने चीखा। "मीरा, जल्दी आ!"
मीरा दौड़कर आई। उसने बलवंत को जमीन पर बैठा दिया और उसकी कलाई पकड़ी। उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
"इसका दिल बहुत तेज़ चल रहा है," उसने कहा। "और नाड़ी… नाड़ी सिकुड़ रही है। वीर, ये शीशी ज़हर थी। तेरे बाप ने इलाज की शीशी नहीं दी थी — ये तो ज़हर वाली ही थी।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"नहीं," मैंने कहा। "माँ ने कहा था—"
"माँ ने क्या कहा था, वो बाद में देखेंगे," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो जान बचाती है। "अभी इसे उल्टी करनी है। टिंकू, गरम पानी ला। बिशन चाचा, आप जानते हैं ये क्या है?"
बिशन चाचा ने बलवंत का चेहरा देखा और उनकी आँखें भर आईं।
"ये वही शीशी है," उन्होंने धीरे से कहा, "जो तेरे बाप ने उस रात जेब में रखी थी। वो इसे नष्ट करना चाहते थे। पर मरने से पहले वो मुझे नहीं दे पाए। वो मेरी जेब में गिर गई और मैं भूल गया।"
"यानी ये इलाज नहीं, ज़हर है," मैंने कहा। "और बलवंत ने इसे पी लिया।"
"हाँ," बिशन चाचा ने कहा। "पर एक बात है। ये ज़हर मारता नहीं — ये ज़हर सिर्फ़ उन्हीं को मारता है जिनके शरीर में पहले से यही ज़हर है। और बलवंत के शरीर में यही ज़हर बीस साल से है।"
मेरी साँस रुक गई।
"तो मतलब?"
"तो मतलब," बिशन चाचा ने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी, "कि ये शीशी उसके लिए इलाज बन सकती है। ज़हर ज़हर को काटता है, वीर। यही तो तेरे बाप का आख़िरी नुस्खा था। वो इसे इसीलिए बलवंत के लिए लाए थे, पर दे नहीं पाए।"
मीरा ने बलवंत की नाड़ी फिर पकड़ी। उसके होंठ हिल रहे थे — वो गिन रही थी।
"नाड़ी रुक रही है," उसने कहा। "पर… पर धीरे-धीरे। जैसे कोई दौड़ता हुआ आदमी रुक रहा हो।"
"तो ये मर रहा है?" टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ फट गई।
"नहीं," मीरा ने कहा, और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। "ये ठीक हो रहा है। पर इसका शरीर इस वक़्त बहुत दर्द में है। इसकी नसें जल रही हैं।"
बलवंत ने अपनी आँखें खोलीं। उसकी आँखों में पानी था।
"मरने दो," उसने फुसफुसाया। "मैं थक गया हूँ, वीर भाई।"
मैं उसके पास घुटनों के बल बैठ गया। मैंने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।
"नहीं," मैंने कहा। "तू नहीं मरेगा। तू मेरा भाई है। और मेरा भाई मरने के लिए नहीं बना।"
"पर मैंने तेरे बाप को कोसा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "बीस साल तक मैंने सोचा कि भवानी सिंह ने मुझे ज़हर दिया। और सच ये है कि…"
"सच ये है," बिशन चाचा ने कहा, और वो बलवंत के पास बैठ गए, "कि भवानी सिंह ने तुझे बचाने की आख़िरी कोशिश की थी। और उस कोशिश में वो मारा गया। तू उसका बेटा है, बलवंत। भवानी सिंह का बेटा। और तेरे बाप ने तेरे लिए अपनी जान दी।"
बलवंत ने बिशन चाचा की तरफ़ देखा। और उसकी आँखों से आँसू बह निकले — वो आँसू जो बीस साल की नफ़रत से जमे हुए थे और अब पिघल रहे थे।
"मेरे बाप ने…" उसने कहा।
"हाँ," बिशन चाचा ने कहा। "तेरे बाप ने।"
और तभी बलवंत ने अपना सिर मेरी गोद में रख दिया, और रोया। उसका रोना किसी बच्चे का रोना था — जो चार साल से रुका हुआ था और अब बीस साल बाद फूट रहा था।
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। मेरी आँखों से भी पानी बह रहा था, और मैं रोक नहीं रहा था।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी हथेली ठंडी थी। और काँप रही थी।
"वीर," उसने धीरे से कहा। "उसकी नाड़ी स्थिर हो रही है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"सच?"
"हाँ," उसने कहा। "धीरे-धीरे। जैसे कोई नया आदमी अंदर से बन रहा हो।"
टिंकू ने गरम पानी लाकर रख दिया। वो चुपचाप खड़ा रहा, और उसकी डिब्बी उसके हाथ में थी।
बलवंत धीरे-धीरे शांत हुआ। उसकी साँस लंबी हो गई। उसने अपनी आँखें खोलीं और मेरी तरफ़ देखा।
"वीर भाई," उसने कहा। "मुझे माफ़ कर दे।"
"चुप," मैंने कहा। "अभी बोलने का वक़्त नहीं है।"
"नहीं, सुन," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अब वो गरज नहीं थी, बस थकान थी। "मैंने तेरे बाप को कोसा। मैंने तेरे अखाड़े को जलाया। मैंने तेरी मिट्टी को अपवित्र किया।"
"तूने मेरी मिट्टी को अपवित्र नहीं किया," मैंने कहा। "तूने अपनी मिट्टी से बदला लिया। और ये बदला तेरा नहीं था — ये जगदीश का था, जिसने तुझे भरमाया।"
"पर मैंने लड़ाई की—"
"और आज से कोई लड़ाई नहीं," मैंने कहा, और मैंने उसका हाथ पकड़ा। "आज से सिर्फ़ इलाज है। तेरा इलाज, और मेरे बाप के नाम का इलाज।"
बलवंत ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ बदल रहा था — जैसे कोई पुराना दरवाज़ा खुल रहा हो।
"भाई," उसने कहा। "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"मेरे बाप… भवानी सिंह… वो कैसे थे?"
मेरा गला भर आया। मैंने सोचा — क्या बताऊँ? कि वो मिट्टी से प्यार करते थे? कि उनकी हँसी में ढोल की आवाज़ थी? कि वो रात में चुपके से मेरे कमरे में आकर मेरे सिर पर हाथ रखते थे और मुझे पता नहीं चलता था?
"वो आदमी थे," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी। "पूरे नहीं। टूटे हुए भी। पर जब सच बोलने की बात आई, तो अपनी जान दे दी। और यही सबसे बड़ी बात है।"
बलवंत ने आँखें बंद कर लीं, और उसके होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान आई।
"तो मैं उनका बेटा हूँ," उसने कहा। "आज पहली बार लगा।"
अखाड़े में सन्नाटा था। गुर्गे दूर खड़े थे, और उनके हाथों से लाठियाँ ढीली हो गई थीं। भीड़ दरवाज़े पर जमा थी — माँ, गुड़िया, रणवीर सिंह, गंगा देवी। सब चुप।
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