Spirit of a Fighter1251 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1251

7 min read November 5, 2026

बिशन चाचा की आवाज़ अचानक भर आई। वो रुके, अपनी आस्तीन से आँखें पोंछीं।

"कहा उन्होंने — बिशन, मेरे बेटे को बताना।"

"क्या बताना?" मेरी आवाज़ फुसफुसाहट में निकली।

"बोले — मेरे बेटे को बताना कि भैरव ज़हर बेचता था। सब जानते थे। पर वो पीली शीशी जो बलवंत को दी गई, वो भैरव ने नहीं दी। मेरे ही हाथ से गई थी।"

मेरा सिर घूम गया। मैं दीवार का सहारा लेकर खड़ा हो गया।

"मतलब… बाबा ने…?"

"सुन पहले," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ कड़क हुई। "तेरे बाप ने वो शीशी बलवंत को ज़हर देने के लिए नहीं दी थी। उसने वो शीशी जगदीश से छीनकर दी थी। बलवंत बच्चा था, वीर। चार साल का। जगदीश उसे मारना चाहता था — भवानी के बेटे की एक झलक भी उसे बर्दाश्त नहीं थी। तो तेरे बाप ने वो शीशी बदल दी। इलाज वाली शीशी बलवंत को पिलाई, और उस ज़हर वाली शीशी अपनी जेब में रख ली।"

"पर बलवंत को तो ज़हर मिला," मैंने कहा। "वो बीमार है। वो आज भी पीली शीशी पीता है।"

बिशन चाचा ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"हाँ," उन्होंने कहा। "क्योंकि जगदीश ने अदला-बदली कर दी। तेरे बाप जब शीशी लेकर आए, तब तक जगदीश ने बलवंत के दूध में फिर से ज़हर घोल दिया था। और तेरे बाप को लगा कि उन्होंने बच्चा बचा लिया।"

मेरे पेट में जैसे कोई गर्म लोहा डाल दिया हो।

"तो बाबा को लगा कि उन्होंने बच्चा बचा लिया, और…"

"और असल में बच्चा पहले से ज़हर पी चुका था।" बिशन चाचा ने कहा। "तेरे बाप को ये पता चला अगले दिन। और यही उनकी मौत का सबब बना। वो जगदीश के पास गए और बोले — तूने बच्चे को ज़हर दिया। मैं ये सब बाहर लाऊँगा। और जगदीश ने उसी रात उन्हें ज़हर दे दिया।"

वहाँ सन्नाटा छा गया। दीवार के उस पार से किसी के हँसने की आवाज़ आ रही थी, और यहाँ हम दो आदमी खड़े थे, और मेरे हाथ काँप रहे थे।

"यानी बलवंत को ज़हर देने में," मैंने धीरे से कहा, और मेरी आवाज़ भारी हो गई, "मेरे बाप का भी हाथ था।"

"नियत साफ़ थी, वीर," बिशन चाचा ने कहा। "पर हाथ था। और यही सच है। तेरे बाप ने मरते वक़्त मुझसे कहा — मैंने बच्चा बचाने की कोशिश की, और मेरी वजह से वो ज़िंदगी भर ज़हर पीता रहा। ये बात मैं अपने बेटे को कभी नहीं छुपाऊँगा। वो जाने, और फिर जो सज़ा मुझे मिलनी हो, मिले।"

मैं दीवार के सहारे बैठ गया। मेरे घुटने कमज़ोर हो गए थे। मैंने अपने हाथ अपने चेहरे पर रख लिए।

भवानी सिंह — जिनकी मैंने हर रात तस्वीर देखी थी। जिनके नाम पर मैंने कसम खाई थी। जो मेरे लिए सच के देवता थे।

और आज पता चला कि उनके हाथ से भी ज़हर गुज़रा था। भले बचाने के लिए — पर गुज़रा था।

"वीर," बिशन चाचा ने कहा, और उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "ये सुनकर तेरा बाप तेरे लिए छोटा नहीं होता। बड़ा होता है। क्योंकि सच बोलने वाले आदमी ही सच के साथ मरते हैं। जगदीश आज तक झूठ बोल रहा है। भवानी सिंह सच बोलकर मरे। फ़र्क़ यही है।"

मेरी आँखों से पानी बह रहा था और मैं रोक नहीं रहा था।

"चाचा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ टूट रही थी। "मैं आज तक अपने बाप को सबसे ऊपर रखता आया। माँ से भी ज़्यादा कभी-कभी। और अब…"

"अब क्या?" उन्होंने कहा। "अब तू उन्हें इंसान समझ। देवता मत समझ। देवता से कोई सीख नहीं लेता। इंसान से सीख लेता है।"

पीछे से पैरों की आहट आई। मीरा आई थी। उसके हाथ में पानी का बर्तन था, और उसके चेहरे पर वो ज़िद थी जो सिर्फ़ सच के लिए होती है।

"मैंने सब सुन लिया," उसने कहा, और उसने बर्तन मेरी तरफ़ बढ़ाया। "पी लो।"

"मीरा, मुझे नहीं—"

"पी लो, वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ नरम पड़ गई। "तुम्हारे हाथ काँप रहे हैं।"

मैंने बर्तन पकड़ा और पानी पिया। पानी में ताँबे की गंध थी। मेरी नाक में अभी भी बिशन चाचा की जली मिट्टी की गंध भरी थी।

मीरा बिशन चाचा के सामने बैठ गई।

"चाचा, आप ये बात अदालत में बोलेंगे?"

"बोलूँगा, बेटी," उन्होंने कहा। "पर एक शर्त है।"

"क्या?"

"मुझे बलवंत के सामने बोलने दो। पहले उसके सामने। अदालत बाद में।"

मेरा सिर उठ गया।

"क्यों चाचा?"

"क्योंकि वो बच्चा बीस साल से अपने बाप से नफ़रत करता आया है," बिशन चाचा ने कहा। "उसे लगता है कि भवानी सिंह ने उसे ज़हर दिया। और सच ये है कि भवानी सिंह ने उसे ज़हर से बचाने की आख़िरी कोशिश की थी। अगर मैं ये बात उसे नहीं बताऊँगा, तो वो मरते दम तक भवानी को कोसेगा।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो मुँह से नहीं पूछ रही थी।

"मीरा," मैंने कहा। "तू क्या सोच रही है?"

"मैं सोच रही हूँ," उसने धीरे से कहा, "कि बलवंत को ये बात बताने का सही वक़्त क्या है। वो अभी टूटा हुआ है। उसने अभी-अभी अपनी माँ को ज़िंदा देखा है। उसने अभी-अभी अपने गुरु को जेल जाते देखा है। अगर हम अभी उसके सामने ये बात रखेंगे, तो वो…"

"तो वो और टूटेगा," टिंकू ने कहा। वो चुपके से आ गया था, और मैंने उसे देखा। उसके हाथ में लड्डू की डिब्बी थी, और वो उसे सीने से लगाए खड़ा था। "भाई, मुझे डर लग रहा है। वो अभी हमारा भाई बना है। अगर ये बात सुनी तो कहीं वो फिर से जगदीश की तरफ़ न चला जाए।"

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।

"टिंकू, तू सच बोल रहा है। डर सच्चा है।" मैंने कहा। "पर डर के आगे झुककर अगर हम सच छुपाएँगे, तो हम और भैरव में क्या फ़र्क़ रह जाएगा?"

टिंकू ने अपना सिर नीचे कर लिया।

"पर भाई—"

"सुन," मैंने कहा, और मैंने उसका कंधा पकड़ा। "अगर बलवंत सच सुनकर भड़केगा, तो भड़के। पर वो जानता रहेगा कि हमने उससे कुछ छुपाया नहीं। और अगर हमने छुपाया, और बाद में कहीं से उसे पता चला — तो वो हमें भी उसी दीवार के उस पार खड़ा देखेगा जहाँ जगदीश खड़ा था।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, और फिर उसने धीरे से सिर हिलाया।

"ठीक है भाई," उसने कहा। "पर मैं साथ रहूँगा। अगर वो भड़के, तो मैं बीच में आ जाऊँगा। मेरी मिठाई का वादा है।"

मैं हँसा। एक छोटी सी हँसी, जो गले से निकली और वहीं अटक गई।

"तेरी मिठाई से बड़ा कोई हथियार नहीं, टिंकू," मैंने कहा। "चल।"

पर तभी अखाड़े के अंदर से ढोल की आवाज़ आई। एक, दो, तीन — जैसे कोई जंग का बिगुल बजा रहा हो। और उसके बाद एक गरज उठी, इतनी ऊँची कि दीवार काँप गई।

"वीर सिंह! देर हो रही है! मैं तेरे बाप का नाम भी आज मिट्टी में मिला दूँगा!"

बलवंत की आवाज़ थी। पर उसमें वो बात नहीं थी जो सुबह थी। इसमें कुछ और था। ज़हर की गंध तक नहीं — कुछ और। कुछ सूखा, कुछ जला हुआ।

मैं दौड़कर अखाड़े के दरवाज़े पर पहुँचा। बिशन चाचा मेरे पीछे-पीछे आए, उनकी साँस फूल रही थी।

अखाड़े के बीच में बलवंत खड़ा था। उसके हाथ में कोई हथियार नहीं था, पर उसके पीछे खड़े गुर्गों की आँखों में वो चमक थी जो सिर्फ़ लड़ाई से पहले आती है। और बलवंत के होंठ सूखे थे, और उसके हाथ की उँगलियाँ फड़क रही थीं।

मैंने गंध पकड़ी। और मेरा दिल धक् से रह गया।

उसके पसीने में पीली शीशी की गंध थी।

उसने फिर से पी ली थी।

मैंने बिशन चाचा की तरफ़ देखा। उन्होंने भी सूंघा — शायद उनकी नाक भी कुछ जानती थी — और उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"वो पी रहा है," बिशन चाचा ने फुसफुसाया। "अभी भी पी रहा है।"

"बलवंत!" मैंने आवाज़ दी। "रुक!"

वो मेरी तरफ़ मुड़ा। उसकी आँखें लाल थीं।

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