Spirit of a Fighter – Chapter 1250
मैंने आँखें खोलीं।
"बलवंत," मैंने कहा, और हमारे शरीर एक-दूसरे से चिपके थे। "तू वो नहीं है जो वो बनाना चाहता था।"
उसकी पकड़ ढीली हुई। बस एक पल के लिए।
और उसी पल में मैंने उसे घुमाया। मैंने उसे कमर से पकड़ा और मिट्टी की तरफ़ झुकाया, पर मैंने उसे गिराया नहीं। मैंने उसे झुकाया, और रोका।
"मैं तुझे गिरा सकता हूँ," मैंने फुसफुसाया। "पर आज नहीं। आज तू मेरे साथ खड़ा होगा।"
मैंने उसे छोड़ दिया। वो सीधा हुआ, और उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था।
उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर भीड़ की तरफ़, फिर गंगा देवी की तरफ़। और फिर उसने वो किया जो मैंने सोचा भी नहीं था।
उसने अपनी लंगोट का छोर पकड़ा और उसे खोल दिया।
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
"बलवंत?" रणवीर सिंह ने कहा।
"मैं हार गया," बलवंत ने कहा। उसकी आवाज़ पूरे मैदान में गूँजी। "मैंने ये लंगोट पहनी थी ये सोचकर कि मैं लड़ूँगा। पर मैं लड़ नहीं रहा था। मैं बदला ले रहा था। और बदला लेने वाला पहलवान नहीं होता।"
उसने लंगोट मिट्टी पर रख दी।
"मैं आज से अखाड़े का पहलवान नहीं हूँ," उसने कहा। "मैं आज से इस अखाड़े का बेटा हूँ। और बेटा अखाड़े में लड़ता नहीं, अखाड़ा उसके लिए लड़ता है।"
वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
"वीर," उसने कहा। "तेरे पास जो है — वो ताकत नहीं है। वो मिट्टी है। और मिट्टी से मैंने आज पहली बार माफ़ी माँगी है।"
उसने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया।
मैंने थामा। भीड़ में पहली ताली बजी — किसी बच्चे ने बजाई, शायद गुड़िया ने। और फिर पूरा मैदान तालियों से गूँज उठा।
माँ मेरी तरफ़ दौड़कर आईं। उन्होंने मुझे गले लगाया और उनका शरीर काँप रहा था। गुड़िया मेरी कमर से चिपक गई और उसने अपना चेहरा मेरी बनियान में छिपा लिया।
"भैया," उसने कहा। "तुम जीत गए।"
"कैसे?"
"क्योंकि तुमने किसी को नहीं गिराया," उसने कहा। "और माँ कहती है कि असली जीत वही होती है।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो हँस रही थीं, और उनकी आँखों में पानी था।
"तूने सुना," उन्होंने कहा। "मैंने तुझे बचपन में कहा था और तू भूल गया था।"
"अब नहीं भूलूँगा, माँ," मैंने कहा।
टिंकू दौड़कर आया। उसके हाथ में लड्डू की डिब्बी थी।
"भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ भर आई थी। "आज मैंने दुकान बंद कर दी। सबको मिठाई बाँट दी।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज मेरे भाई ने किसी को नहीं हराया," उसने कहा। "आज मेरे भाई ने किसी को जिताया।"
उसने एक लड्डू मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने मुँह खोला और उसने लड्डू मेरे मुँह में रख दिया। लड्डू में उसकी माँ की गंध थी, और उसके हाथों की मिठास थी, और कहीं दूर से — रामपुर की मिट्टी की गंध आ रही थी।
मैंने चबाया। और मेरी आँखों से आँसू बह निकले। मैंने उन्हें पोंछा नहीं।
"टिंकू," मैंने कहा, मुँह भरा हुआ।
"हाँ भाई।"
"तू पहलवान कब बनेगा?"
टिंकू हँसा। उसकी हँसी पूरे मैदान में गूँजी।
"कल से," उसने कहा। "पक्का।"
मैंने अपना सिर उठाया और आसमान की तरफ़ देखा। आसमान नीला था, और उसमें बादलों के टुकड़े तैर रहे थे जैसे कोई बच्चा काग़ज़ के टुकड़े उड़ा रहा हो।
और मुझे लगा — भवानी सिंह कहीं ऊपर बैठे होंगे, और मुस्कुरा रहे होंगे। और मेरी नाक में अचानक एक गंध आई — चंदन और कपूर की, जो मेरे पिता की गंध थी, और जो अब डर की नहीं, सुकून की गंध थी।
मैंने आँखें बंद कीं और धीरे से कहा, "मिल गया, बाबा। सब मिल गया।"
पर जब मैंने आँखें खोलीं, तो सामने कोई और खड़ा था।
एक बूढ़ा आदमी। कुबड़ा, सफ़ेद दाढ़ी, और उसके हाथ में एक छोटी पोटली। उसका चेहरा जला हुआ था, और उसकी आँखें मुझे देख रही थीं — ऐसे जैसे वो मुझे बहुत पहले से जानता हो।
मैंने अपनी आँखें सिकोड़ीं। गंध पकड़ी। और मेरी साँस रुक गई।
"बिशन?" मैंने कहा। "बिशन चाचा?"
वो मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में वो सब था जो जले हुए चेहरे के पीछे छिपा था।
"मैं बिशन हूँ, बेटा," उसने कहा। "जिसे तुमने भट्ठे पर ज़िंदा जलाया समझा था। भवानी ने मुझे ज़िंदा रखा था। और आज मैं तुम्हें वो बताने आया हूँ जो मरते वक़्त उसने मुझसे कहा था।"
मेरे हाथ से लड्डू की डिब्बी छूट गई, और वो मिट्टी पर गिरी, और लड्डू चारों तरफ़ बिखर गए, और भीड़ में कोई हिला नहीं।
॥
लड्डू मिट्टी पर बिखरे पड़े थे, और भीड़ में कोई हिला नहीं। बिशन चाचा मेरे सामने खड़े थे, उनका जला हुआ चेहरा धूप में और भी गहरा लग रहा था। मैंने अपनी आँखें मलीं — कहीं ये भ्रम तो नहीं। पर गंध झूठ नहीं बोलती। भट्ठे की जली मिट्टी, हल्दी, और वो पुरानी दालचीनी जो सिर्फ़ भवानी सिंह के कपड़ों में थी — सब उन्हीं से आ रही थी।
"चाचा," मेरी आवाज़ फट गई। "आप… आप ज़िंदा?"
"ज़िंदा तो हूँ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो घर्घराहट थी जो सिर्फ़ जले गले में आती है। "पर ज़िंदगी कहाँ है, बेटा। बीस साल से मैं एक मुर्दे की तरह भट्ठे की राख में दबा हुआ था।"
मीरा मेरे पास आई और उसने बिशन चाचा की कलाई पकड़कर नाड़ी देखी। उसके चेहरे पर शक था — वो बिना जाँचे किसी को नहीं मानती।
"चोट कहाँ है?" उसने पूछा।
"पुरानी है, बेटी," बिशन चाचा ने कहा। "अब तो भर गई। पर ये बात भरने वाली नहीं है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"वीर, मुझे अकेले में बात करनी है। तेरे बाप की आख़िरी बात है। भीड़ के बीच नहीं कह सकता।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रही थीं, और उनके होंठ हिल रहे थे — जैसे वो भी कुछ कहना चाहती हों, पर रुक गईं। उन्होंने मुझे हल्का सा सिर हिलाया। जाने की इजाज़त।
टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा।
"भाई, मैं साथ चलता हूँ।"
"नहीं टिंकू," बिशन चाचा ने कहा। "ये बात दो आदमियों के बीच की है। तू यहीं रुक।"
टिंकू का चेहरा उतर गया, पर उसने मेरी तरफ़ देखा और मैंने कहा, "रुक जा। मैं आ रहा हूँ।"
हम अखाड़े के पीछे की तरफ़ चले। वहाँ पुरानी मिट्टी की दीवार थी और उसके सहारे एक टूटी चारपाई पड़ी थी। बिशन चाचा उस पर धँस गए, और उनकी साँस फूल रही थी।
"चाचा, पानी लाऊँ?"
"नहीं," उन्होंने कहा। "पानी मत ला। मैंने बीस साल पानी पीते वक़्त हर बार सोचा है कि कहीं ये ज़हर तो नहीं। अब भी लाता है तो डर लगता है।"
मेरा दिल धक् से रह गया।
"अब सुन," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "जिस रात तेरे बाप मरे, मैं वहाँ था। भवानी सिंह ने मुझे बुलाया था। कहा था — बिशन, आज रात कुछ होने वाला है। मेरे पास सबूत हैं। अगर मैं न बचूँ, तो ये सब तेरे पास रहेगा।"
मैंने साँस रोक ली।
"मैं उस रात उनके कमरे में था। ज़मीन पर पड़े थे। उनके होंठ काले पड़ गए थे, और उनकी आँखों से पानी बह रहा था। ज़हर था, वीर। भाई का दिया हुआ ज़हर।"
"नंदकिशोर?" मैंने कहा।
"नहीं," बिशन चाचा ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो बीस साल से जमी थी। "भैरव। पर हुक्म ऊपर से आया था। हुक्म जगदीश का था। पागल की तरह बैठे थे वो, और भैरव घोल रहा था। पहले तेरे बाप को पिलाया। फिर मुझे। पर मैंने सिर्फ़ एक घूँट लिया था — बाक़ी ज़मीन पर गिरा दिया। इसीलिए ज़िंदा बचा।"
उन्होंने अपनी जली हुई गर्दन को सहलाया।
"उस रात तेरे बाप ने मेरी कलाई पकड़ी, वीर। इतनी ज़ोर से पकड़ी कि उनके नाखून मेरीचमड़ी में घँसे। और उन्होंने कहा —"
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