Spirit of a Fighter – Chapter 1249
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, पर उनमें वो ज़िद थी जो मैंने पहली बार अखाड़े के फाटक पर देखी थी, जब उसने मुझे मिट्टी से बाहर धकेला था।
"तू रो रही है," मैंने कहा।
"तू भी।"
"मैं नहीं रो रहा।"
"तेरी नाक से खून आ रहा है, वीर। इसे रोना नहीं कहते।"
"फिर?"
"फिर ये भी रोना ही है। बस रंग अलग है।"
मैं हँसा। हँसी में दर्द भी था, पर वो मीरा की लायी हुई थी, और मीरा की हँसी मुझे हमेशा ठीक कर देती थी।
माँ आईं। उन्होंने मेरा सिर अपनी गोद में रखा और मेरे बालों में हाथ फेरा।
"बेटा," उन्होंने कहा।
"माँ।"
"आज तूने जगदीश को बचाया।"
"वो उसके लायक़ नहीं था।"
"शायद नहीं था," माँ ने कहा। "पर तू उसके लायक़ था। तेरे पिता भी ऐसे ही थे। उन्होंने भी एक बार अपने दुश्मन को नदी से निकाला था। मैंने उस रात उनसे पूछा था — क्यों बचाया? उन्होंने कहा — मैंने उसे नहीं बचाया, मैंने खुद को बचाया। अगर मैं उसे डूबने देता, तो मैं कभी अपने बेटे की आँखों में नहीं देख पाता।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने अपना चेहरा माँ की गोद में छिपा लिया, और मैंने महसूस किया कि मैं पच्चीस साल का आदमी हूँ, पर इस पल मैं पाँच साल का था, और मेरी माँ मेरे बालों में हाथ फेर रही थी, और दुनिया में कुछ भी बुरा नहीं था।
वो पल कितनी देर चला, मुझे नहीं पता। पर जब मैंने सिर उठाया, तो सूरज आसमान पर था, और अखाड़े का मैदान खाली हो रहा था।
बलवंत दूर खड़ा था। अकेला।
मैं उठा। मेरे पैर डगमगा रहे थे, पर मैं उठा। मैं उसके पास गया।
"बलवंत।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें सूजी हुई थीं। उसके होंठ फटे हुए थे। वो उस आदमी का बेटा था जिसने मुझे मारने की क़सम खाई थी, और वो उस औरत का बेटा भी था जिसने मुझे जन्म नहीं दिया, पर जिसकी गोद में मैं बैठा था।
"तूने मुझे बचाया," उसने कहा। आवाज़ में हैरानी थी। "जब मैं गिर रहा था, तूने मेरा हाथ पकड़ा।"
"तू मेरा भाई है।"
"मैं तुझे मारने आया था।"
"तू आज भी मुझे मार सकता है," मैंने कहा। "अगर उससे तेरा दर्द कम होता है, तो मार दे।"
बलवंत हिला। उसका चेहरा ऐंठा, और फिर वो टूट गया। वो मेरे सामने घुटनों पर गिरा और उसने अपना चेहरा अपनी हथेलियों में छिपा लिया।
"मैं क्या करूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ बच्चे जैसी थी। "मैं क्या करूँ, वीर? मैंने जिसे गुरु कहा, वो मेरे बाप का कातिल निकला। मैंने जिसे बाप कहा, वो मुझे चुराकर लाया। मैं किसका बेटा हूँ?"
मैं भी उसके सामने बैठ गया। मिट्टी पर। अखाड़े की लाल मिट्टी पर, जिसमें दोनों की माँ की गंध थी।
"तू सुहानी का बेटा है," मैंने कहा। "और सुहानी मेरी माँ की बहन थी। मतलब तू मेरा भाई है। बस। इससे ज़्यादा कुछ मत सोच।"
"और जगदीश?"
"जगदीश ने तुझे पाला। उसने तुझे ज़हर दिया। वो तेरा बाप नहीं, तेरा रखवाला था। जो रखवाला जेल में बैठा है।"
बलवंत ने अपने हाथ नीचे किए। उसके चेहरे पर पसीना और आँसू एक साथ थे।
"मेरी माँ," उसने कहा। "वो कहाँ है?"
मेरा गला भर आया।
"वो नहीं है, बलवंत," मैंने कहा। "वो बहुत पहले चली गई। पर उसने तुझे छोड़ा नहीं था। उसे छीन लिया गया था।"
बलवंत ने अपनी आँखें बंद कर लीं। और फिर उसने एक ऐसी आवाज़ निकाली जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी — किसी जानवर की आवाज़ नहीं, किसी आदमी की आवाज़ नहीं। एक बच्चे की आवाज़, जिसे बहुत देर से पता चला कि उसकी माँ नहीं है।
गंगा देवी आईं और उन्होंने बलवंत का सिर अपनी गोद में रखा।
"मैं तेरी माँ नहीं हूँ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी। "पर मैं तेरी माँ की बहन हूँ। और जब तक मैं ज़िंदा हूँ, तू अनाथ नहीं है।"
बलवंत ने उनका आँचल पकड़ा। बस पकड़ा और रोता रहा।
मैं उठकर खड़ा हो गया। मेरे पैरों में जान नहीं थी, पर मैं खड़ा था। टिंकू दौड़कर आया, उसके हाथ में एक लोटा पानी था।
"भाई, पानी पी।"
मैंने पानी पिया। पानी में अखाड़े की मिट्टी की गंध थी।
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ भाई।"
"मुकाबला?"
टिंकू ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"भाई, अभी? तेरी नाक से खून—"
"मुकाबला," मैंने कहा।
"पर भाई, बलवंत—"
"बलवंत मेरा भाई है," मैंने कहा। "और भाई से लड़ाई कभी ख़त्म नहीं होती। बस उसे आज होने देना है।"
टिंकू ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर उसने अपना सिर हिलाया और उसकी आँखों में वो चमक आई जो मुझे उसके चेहरे पर सबसे ज़्यादा पसंद थी — वो चमक जो कहती थी कि वो मुझसे ज़्यादा मुझ पर भरोसा करता है।
"ठीक है," उसने कहा। "पर एक बात — अगर तू जीता, तो आज मैं पहली बार तेरे मुँह में मिठाई डालूँगा। और अगर हारा, तो भी डालूँगा। बस फर्क ये होगा कि हारने पर मैं तेरे मुँह में लड्डू डालूँगा और जीतने पर पेड़ा।"
मैं हँसा। और हँसी में वो कुछ था जो मैंने बहुत दिनों से महसूस नहीं किया था — हल्कापन।
"टिंकू," मैंने कहा। "तू पहलवान कब बनेगा?"
"कल से," उसने कहा। "पक्का।"
"ये तू रोज़ कहता है।"
"इसलिए तो पक्का है भाई। रोज़ कहने से आदत बन जाती है, और आदत से इंसान बनता है।"
मैंने उसका कंधा थपथपाया और मैदान की तरफ़ बढ़ा।
अखाड़े में ढोल बजने लगा। धीरे-धीरे, जैसे कोई दूर से आ रहा हो। लोग लौटने लगे। मैदान भरने लगा। मैंने देखा — सुक्खी बुआ सबसे आगे थीं, उनके हाथ में पान का बीड़ा था और उनकी आँखें मुझ पर टिकी थीं।
"अरे वीर," उन्होंने कहा। "मैंने तो सुना है कि आज तू बलवंत से लड़ेगा।"
"हाँ, बुआ।"
"पर बेटा, वो तो तेरा भाई है।"
"तो?"
"तो भाई से क्यों लड़ता है?"
"क्योंकि भाई से लड़कर ही पता चलता है कि भाई कितना मज़बूत है," मैंने कहा। "और बुआ, आज कोई नहीं मरेगा।"
सुक्खी बुआ ने अपना बीड़ा चबाया और मुस्कुराईं। उनकी आँखों में कुछ था — शायद वो सच जो वो बीस साल से छिपा रही थीं और आज खुल गया था।
"जा बेटा," उन्होंने कहा। "मैं तेरी माँ के पास बैठूँगी।"
मैं मैदान के बीच पहुँचा। बलवंत भी आ गया — गंगा देवी के सहारे, धीरे-धीरे, जैसे हर कदम में उसका पूरा बचपन पीछे छूट रहा हो।
हम दोनों आमने-सामने खड़े हुए। ढोल बज रहा था। भीड़ चुप थी।
रणवीर सिंह की आवाज़ आई, और वो व्हीलचेयर पर थे, पर उनकी आवाज़ में वो गरज थी जो मैदान के कोने-कोने तक पहुँची।
"आज का मुकाबला," उन्होंने कहा, "दो भाइयों का है। और मैं साफ़ कह देता हूँ — इसमें कोई हारेगा नहीं। बस एक जीतेगा और एक सीखेगा।"
भीड़ हँसी। और उस हँसी में वो सब था जो बीस साल से दबा हुआ था।
बलवंत ने अपनी लंगोट कसी। मैंने अपनी कसी।
"वीर," उसने कहा।
"हाँ।"
"मैं आज पीली शीशी नहीं छूँगा।"
"मुझे पता है।"
"पर मैं आज तुझे बख्शूँगा भी नहीं।"
"मुझे यही चाहिए।"
और फिर हम टकराए।
उसका पहला दाँव तेज़ था — सीधा, कमर के नीचे। मैं हटा, पर पूरा नहीं। उसकी उँगली मेरी पसली पर लगी और मेरी साँस एक पल के लिए रुक गई। मैंने मिट्टी में पैर जमाए। अखाड़े की लाल मिट्टी, जो मेरी माँ की चक्की से आई थी, जो गुड़िया की थैली से आई थी, जो भवानी सिंह की हड्डियों से आई थी।
मैंने आँखें बंद कीं और सूंघा।
बलवंत के पसीने में वो कड़वाहट नहीं थी जो पीली शीशी वालों के पसीने में होती है। उसके पसीने में मिट्टी थी, और थकान थी, और कहीं गहरे में — डर था। वो मुझसे नहीं डर रहा था। वो खुद से डर रहा था। कहीं वो फिर से वही न हो जाए जो जगदीश ने बनाया था।
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